शनिवार, 31 जनवरी 2015

899-तेरे पास तो....

तेरे पास तो....
तेरे पास तो मुहब्बत बेपनाह है मेरे लिए
तेरा सुन्दर चेहरा जैसे माह है मेरे लिए
इश्क़ कुर्बत नहीं है वह एहतिराम इबादत है
फासिले में रहूँ तुझे छूना गुनाह है मेरे लिए
कभी कोहरे सा कभी बादलों सा आ जाते हो
तेरी बेकरार सी परछाई हमराह है मेरे लिए
मुझे भोर तक तारे सा निहारते से लगते हो
मोतबर सी तेरी खूबसूरत निगाह है मेरे लिए
तेरे आते ही हर तरफ नूर सा पसर जाता है
तेरे बिना शबे माह भी सियाह है मेरे लिए
इब्दिता से तुझसे बेखबर नहीं रहा हूँ मैं कभी
जो अंजाम तक ले जाए तू वो प्रवाह है मेरे लिए
किशोर कुमार खोरेन्द्र
{बेपनाह = बेहिसाब ,माह =चाँद ,कुर्बत =निकटता ,
एहतिराम=आदर , इबादत=उपासना ,हमराह =रास्ते का साथी
मोतबर=भरोसेमंद ,सियाह =काली ,इब्दिता=आरंभ
अंजाम =अंत}

898-वृक्षों तले छाँव भी...

वृक्षों तले छाँव भी...
वृक्षों तले छाँव भी रह रहे किराये से, लगने लगे हैं
शहर में लोग कुछ ज्यादा ही पराये से ,लगने लगे है

मनुष्य होने के अलावा लोग न जाने क्या हो गए हैं
आडम्बर वे कुछ ज्यादा ही अपनाये से,लगने लगे हैं
बरसों पुराने मील के पत्थरों से अब कौन मिले
तन्हाई से घिरे रस्ते भी घबराये से ,लगने लगे हैं
जहाँ में सच कहने पर सजा ए मौत मिलती है
आईने के भीतर हम सुरक्षित साये से रहने लगे हैं
ढके चेहरों के भीतर कितना आतंक छुपा है कौन जाने
प्यार की जगह मानव, बम लगाए से ,लगने लगे हैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

897-तुम मुझे विस्मृत........

तुम मुझे विस्मृत........
तुम मुझे विस्मृत करने की कोशिश में हो
सरापा भींगें हुए मेरी यादों की बारिश में हो

छोड़कर इस जहाँ में तन्हा मुझे ,चल दोगे
सितमगर बनने की तुम पूरी साजिस में हो

आखिर क्यों होता है हश्र यही उल्फत का
घिरे जैसे हम दोनों आज आतिश में हो
गुलाब का फूल भेजा था ,कांटें मेरे पास हैं
ऐसा क्यों लगता है पर ,तुम खलिश में हो
रेल की तरह दूर निकल जाओगे तब तुम्हें
अहसास होगा मेरी निगाहों की कशिश में हो
किशोर कुमार खोरेन्द्र
{सरापा =सर से पांव तक ,सितमगर =अत्याचारी
हश्र =परिणाम ,उल्फ़त =प्रेम ,आतिश =अग्नि
खलिश =चुभन ,कशिश =आकर्षण }

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

896-पसंद मुझे तेरी तस्वीर..

पसंद मुझे तेरी तस्वीर..
पसंद मुझे तेरी तस्वीर ,तुझे मेरी तहरीर आ गए
आते आते इतने करीब हमारी रूहों के शरीर आ गए

रस्ता न मंजिल ,साहिल न कारवां ने साथ दिया
हमें मिलाने हमारे सौभाग्य के लकीर आ गए

आकाश और जमीं जहाँ पर मिलते हैं वहाँ से कहने
अपनी दुनियाँ बसा लो क्षितिज से समीर आ गए
झील में चाँद और चांदनी सा हमें इतराते देख कर
हया का चिलमन बनने लुके छुपे तिमिर आ गए
जहाँ की तीखी नज़रों से भला कौन बच पाया है
ख्वाबों ख्याल को जीने के हमें तरकीब आ गए
किशोर कुमार खोरेन्द्र
(तहरीर =लेखन ,साहिल =किनारा ,समीर =पवन , चिलमन=पर्दा
तिमिर =अँधेरा ,तरकीब =तरीका )

रविवार, 25 जनवरी 2015

895-जुनूने इश्क़ में....

जुनूने इश्क़ में....

जुनूने इश्क़ में गुफ्तगू सख्त मना है 
हर्फ़े सुकूत को बस पढ़ना समझना है 

रूपोश हो भी तो हम दोनों कहाँ जाये 
फलक में सितारें दीवारों में आईना है 

अपने साये से भी तुम सहम जाते हो 
कह दूँ निगाहों से ,जो तुमसे कहना है 

आज तक तेरी तस्वीर ही देख पाया हूँ
वस्ले जानां तो केवल एक कल्पना है

खुदा की तरह तुम अप्राप्य अदृश्य हो
तन्हां आये है आफाक में तन्हा रहना है

किशोर कुमार खोरेन्द्र

(जुनूने इश्क =प्रेम उन्माद ,गुफ्तगू =बातचीत
हर्फ़े सुकूत =ख़ामोशी के अक्षर
रूपोश =मुंह छुपाना ,भाग जाना ,फलक =आकाश
वस्ले जानां =प्रिय से मिलन ,तन्हा =अकेले ,
आफाक =संसार ),

शनिवार, 24 जनवरी 2015

"894-लो फिर से आ गया बसंत "

"लो फिर से आ गया बसंत "

विरह की वेदना हुई ज्वलंत
मन को भटकाने
लो फिर से आ गया बसंत

मौसम का राजा कहो
या उसे रसों का महंत
प्रकृति और चेतना को
सरस करने
लो फिर से आ गया बसंत
भूले बिसरे प्रणय के क्षणों का
स्मृति पटल पर वह
नहीं होने देता अंत
उमंग को जगाने
लो फिर से आ गया बसंत
मन ने सोचा था
बन कर रहूँगा संत
अब नहीं दुहराऊंगा
मिलन के प्रयास को
रहूँगा
वियोगी सा जीवनपर्यन्त
तन के
अंग अंग को उकसाने
लो फिर से आ गया बसंत
धरती में
बिखरे हैं टेसू के फूलों के रंग
आसमान उडता सा लगता है
मानों हो वह नीला पतंग
ओस से भींगी धूल लगती
जैसे हो वह चन्दन
मीठे स्वर से गूंज उठा जंगल
जब गाने लगा
कोयल का मधुर कंठ
लो फिर से आ गया बसंत
इस बरस खत आया है
बतलाने आया डाकिया संग
दौड़कर सूना एकाकी पंथ
गढ़ने नए अफ़साने
लो फिर से आ गया बसंत

किशोर कुमार खोरेन्द्र
(ज्वलन्त =चमकदार ,स्पष्ट
महंत =, मुखिया ,प्रमुख )

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

893-केवल तुम और मैं ...

केवल तुम और मैं ...

घर में झरोखे ,खिड़कियां 
निगरानी करते होंगें 
दरवाजे रोकते होंगें 
एक आदमकद आईने में 
उभर आया साया 
कफ़स में कैद पक्षी सा 
सहमता होगा 

शहर के चौराहे की घडी
कहती होगी -दुनियां की भीड़ में खो न जाना
एक दिन इस जहाँ से भी तुम्हें होगा लौटना
सड़कें कहती होंगी - चलों कहीं दूर भाग जाएँ
बरगद के तले स्थित मंदिर के भीतर
प्रज्वलित अखंड ज्योत से
लगता होगा मानों सदियों पुराना नाता है

गांव के तालाब में खिले कमल
मन्त्र मुग्ध कर लेते होंगें
कुंए के भीतर डर छुपा हुआ सा
लगता होगा
खेतों के मेढ़ संभल कर
चलना सिखलाते होंगें
पगडंडियाँ भी
गोधूली बेला में
पशुओं के गले में बंधी घंटियों के स्वरों के संग
लौट आती होंगी
पीपल की जड़ों के आसपास बना चबूतरा
अपने ही फैसलों के बारे में सोचता रहता होगा
सही था निर्णय या गलत

शरीर में उजले कपडे होंगें
पांव में पुरानी चप्पलें होंगी
हाथ में एक रुमाल होगा
शरीर तो वस्त्र की तरह है
बदलता रहता है
ऐसा लगता होगा

मन में एक ही समय पर
किसी के लिए गुस्सा ,किसी के लिए प्यार होगा
मन में नफरत और स्नेह के मध्य
खुद के लिए
स्वतंत्र एक संकरी गली होगी

रूह में करुणा होगी
रूह में दिव्य प्रकाश होगा
वैराग्य होगा
जन्म -मृत्यु से परे शाश्वत चेतना का
चिर आभास होगा

घर ,शहर ,गांव ,शरीर ,मन ,रूह ,से भी
अलग
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे मैं के
निस्तब्ध मौन के वीरान जंगल में
मैं तुमसे मिलने आ रहा हूँ
जहाँ पर केवल तुम और मैं होंगें

किशोर कुमार खोरेन्द्र

d

892-न जाने क्यों....

न जाने क्यों....

न जाने क्यों तुम हरदम रहते बेजुबान से हो 
अब तक न सुनी न कही गयी दास्तान से हो 

अफ़सोस तेरे बारे में जान न पाया कुछ भी 
पर तुम तो मेरे प्रणय गीत के उन्वान से हो 

टूटे तारे सा जमीं पर बिखर गया हूँ तो क्या 
तुम लगते मुझे , इंद्रधनुषी आसमान से हो 

ताउम्र जीकर भी समझ में नहीं आई जिंदगी
मेरे लिए तुम भी तो सवाल कहाँ आसान से हो

न कुछ खोया न कुछ पाया इस जहाँ में आकर
जाते जाते बचे हुए मेरे अंतिम अरमान से हो

किशोर कुमार खोरेन्द्र

(दास्तान =कहानी ,उन्वान =शीर्षक ,अरमान =इच्छा )

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

891-बसंत ऋतु

बसंत ऋतु
क्यों तुम चुपचाप हो
मौन और अनमन
बसंत ऋतु का प्रिये 
हो चूका है आगमन
कलियाँ खिल गयी
भंवरे कर रहे
पंखुरियों पर गुंजन
मंथर हैं सरिता प्रवाह
स्थिर से जल में
स्वर्णिम किरणे
कर रही हैं नर्तन
आम के पत्तों के झुरमुठ से
घिरे हुये घोसलों का
सूनापन
कर रहा अभी से
काल्पनिक प्रणय का सृजन
नयनों से नयन मिलकर
कर रहे
एक दूसरे का चयन
जिन्हें
करना है पाणिग्रहण
सरसों की कमनीय शाखों में
पीली धुप जैसे खिल आई हो
सुहावना लग रहा है वातावरण
गुबार सा उड़ते हुए
आया हूँ मैं भी
तुम्हारे द्वार तक
तुम्हारे पद चिन्हों से
भरा भरा
लग रहा है प्रांगण
चिड़ियों का कलरव
सुन कर ही आ जाओ बाहर
दुर्लभ लग रहा
मुझे तो तुम्हारा सुदर्शन
बीत गए कई बसंत
इस बार तो अपनी
जुबाँ से बोल दो प्रिये
प्यार के मधुर वचन
क्यों तुम चुपचाप हो
मौन और अनमन
बसंत ऋतु का प्रिये
हो चूका है आगमन
किशोर कुमार खोरेन्द्र

890-कभी तेरे सवाल...

कभी तेरे सवाल...
कभी तेरे सवाल तो, कभी तेरे जवाब आये
कभी तेरे ख्याल तो ,कभी तेरे ख़्वाब आये
चाहा तैरकर नदियां पहुँच जाऊं पास तेरे
पर मुझे डुबाने तेरे हुस्न के सैलाब आये
तू खुश्बू सी हर जगह हर तरफ व्याप्त है
तेरे खतों के जरिये मुझ तक गुलाब आये
कभी पर्दें के बाहर देखा नहीं तुझे ए पर्दानशीं
अक्सर मेरे तसव्वुर में तेरे अक्स लाजवाब आये
तुझसे मिलने ,सात समुन्दर पार कर आया हूँ
रोकने मुझे पर , कोहरा लिए मौसम ख़राब आये
तेरी इबादत करने का मुझे भी कोई तो फल मिलेगा
नहीं मिलता ,समझाने ,मस्लहत लेकर किताब आये
तुझसे जुड़ी ख्वाहिशों ने मुझे बरदार होने न दिया
मुसल्सल लुभाने मुझे सच से लगते सराब आये
किशोर कुमार खोरेन्द्र
(सैलाब=नदी का बाढ़ ,पर्दानशीं =परदे में रहने वाली स्त्री ,
तसव्वुर =ध्यान ,अक्स =छाया ,मस्लहत=नीति ,बरदार =विरक्त
मुसल्सल=लगातार ,सराब= मृगतृष्णा )

889-तू यदि नज़र आये..

तू यदि नज़र आये..
तू यदि नज़र आये तो मुझे फरहत मिल जाये
मेरे बेक़रार दिल को तुमसे उलफत मिल जाये
मुझे हर तरफ तेरी ही तो परछाई दिखाई देती है
साया नहीं ,तुम आ जाओ तो मुहब्बत मिल जाये
मुझे अब तुम्हें याद करते हुऐ जीना आ गया है
दो कदम चल के तुम आओ तो जन्नत मिल जाये
खिल गए है बाग़ में गुल ,आ गयी है फसलें बहार
इतने करीब आओ की दोनों के हसरत मिल जाये
तेरी तस्वीर को ,तेरे अक्स को ,बहुत चाह लिया मैंने
मेरे मन की आरजू है ,रूबरू तेरी सोहबत मिल जाये
किशोर कुमार खोरेन्द्र

888-तुम्हें अब...

तुम्हें अब...
तुम्हें अब साकार जीने लगा हूँ
मय ए हुश्न जैसे पीने लगा हूँ
लोग मुझसे पूछते हैं वो कौन है
आजकल बेजुबां सा रहने लगा हूँ
जरा सी अवहेलना सह नहीं पाता
न जाने क्यों खुद से मैं डरने लगा हूँ
कहीं तू भी तो संग दिल नहीं है
ख़ामोशी से यह कहने लगा हूँ
तेरे मेरे बीच कोहरे की दीवार है
तहे बर्फ सा अब पिघलने लगा हूँ
किशोर कुमार खोरेन्द्र

887-तुम न ज्यादा दूर....

तुम न ज्यादा दूर....
तुम न ज्यादा दूर ,न ज्यादा पास ,रहा करो मेरे
बस तुम घने कोहरे सा आस पास रहा करो मेरे

तस्वीर में ,प्रतिबिम्ब में ,निहारा करता हूँ मैं तुम्हें
अधर कहता है ,साथ बन चिर प्यास रहा करो मेरे
सूरज ,चाँद ,तारे ,बादल ,पर्वत करते हैं मेरा पीछा
तुम भी साथ ,बनकर व्यापक आकाश रहा करो मेरे
इन्द्रधनुष ,मृगतृष्णा ,और क्षितिज तीनों ही माया है
मन के भीतर बनकर चेतना का विकास रहा करो मेरे
साकार हो या निराकार सब ,तुममें ही तो समाहित है
साथ बन मेरे काव्य के अंतरिक्ष का ब्यास रहा करो मेरे
किशोर कुमार खोरेन्द्र

886-मेरी खामोश जुबां...

मेरी खामोश जुबां...
मेरी खामोश जुबां पर तुम्हारा कभी नाम न होगा
मेरा ऐतबार करो तुझ पर कभी इल्जाम न हो
गा
तेरे शहर के किनारे नदी सा चुपचाप बहता रहूँगा
मेरे तनहा इश्क का ,और कभी अंजाम न होगा
एक दिन लहरों संग कश्ती सा दूर चला जाऊँगा
तेरे लिए आखिर तक पर ,कोई पयाम न होगा
मेरी इस पाक मोहब्बत में न शब्द है न कलाम है
कोहरे सा अग्रसर दबे पांवों में पर विराम न होगा
तेरे रूह की देह,तेरे रूह के मन से अटूट नाता है मेरा
इस शाश्वत प्रेम के लिए ,कहीं कोई मकाम न होगा
मेरा शरीर जन्मा है तो मृत्यु भी तो निश्चित ही है
पर मेरा प्यार तेरे ह्रदय में रहकर .गुमनाम न होगा
किशोर कुमार खोरेन्द्र
(ऐतबार =भरोसा ,इल्जाम =दोष ,अंजाम =अंत ,पयाम =सन्देश
कलाम=वार्तालाप ,मकाम =ठहरने का स्थान ,गुमनाम =अज्ञात
)

बुधवार, 14 जनवरी 2015

885-हममे ऐसी....

हममे ऐसी....

हममे ऐसी सोहबत हो जाए 
की दोनों में क़ुरबत हो जाए

एक दूसरे में तलाशे खुद को 
दोनों की ऐसी हसरत हो जाए

जर्रे जर्रे में बस तू ही नजर आये 
निगाहों की ऐसी फितरत हो जाए

मन ही मन जो कहूँ तू सुन ले
खुदा से ऐसी इनायत हो जाए

मुझे भी तुम याद करते रहो
तेरी मुझ पर रहमत हो जाये

किशोर कुमार खोरेन्द्र

{सोहबत =संगत ,क़ुरबत =निकटता ,फितरत= आदत,
इनायत =कृपा ,रहमत =कृपा }

884-लिए अपनी सांसों में ....

लिए अपनी सांसों में ....

लिए अपनी सांसों में मोंगरे सी महक आ जाया करो
तुम यूँ ही कभी कभार इधर अचानक आ जाया करो

न जाने कितने अरमान जगने लगे है मन के भीतर मेरे
तुम लिए सतरंगी चूड़ियों की मधुर खनक आ जाया करो

खिलने लगे है पलाश दूर दूर तक अब तो जंगल में
तुम लिए मौसम ए बहार सी रौनक आ जाया करो

न कोई सुर न कोई ताल अब अच्छा लगता है मुझे
तुम लिए अपने पायल की मीठी झनक आ जाय करो

तुम्हारे ध्यान में मैं ,रहता आ रहा हूँ सतत निमग्न
लगा कर मेरे दुनियाँ में होने की भनक आ जाय करो

पृथ्वी ,जल अग्नि वायु आकाश सब बेजान से लग रहे हैं
फागुनी बयार सी जगाने उनमे उमंग बेशक आ जाय करो

किशोर कुमार खोरेन्द्र

रविवार, 11 जनवरी 2015

883-तेरा पीछा करते करते

तेरा पीछा करते करते ,...

तेरा पीछा करते करते ,तेरा साया बन गया हूँ 
तेरे द्वारा अघोषित तेरा ,सरमाया बन गया हूँ

तेरी मुहब्बत ने मुझपे ,जादू सा असर किया है 
पहले आदमी था अब ,इंसान नया बन गया हूँ

तू कभी न कभी तो गुजरेगी मेरे गांव के राह से 
कहीं पीपल की कहीं बरगद की, छाया बन गया हूँ

ये जहाँ तुझ पर उंगलियाँ न उठाये कभी भी
यह सोच कर मैं ,दानिश्ता पराया बन गया हूँ

न जाने किस मोड़ पर तुम मिल जाओ मुझसे
तेरी जुस्तुजू में मैं आवारा दरिया बन गया हूँ

तेरे जाते ही अमावश का गहन तम , घिर आया है
तेरी यादों की बाती को जला ,दीया बन गया हूँ

अपने ख्यालों में तुझे ही बुनता रहता हूँ मैं हरदम
तसव्वुरों के तिनकों से निर्मित आशियाँ बन गया हूँ

कोई खता हुई होगी मुझसे कई जन्मों पहले शायद
चलो अब करीब आकर तेरा हमसाया बन गया हूँ

किशोर कुमार खोरेन्द्र

सरमाया -संपत्ति ,दौलत ,दानिश्ता =जानबूझकर
जुस्तुजू =तलाश ,तसव्वुर =कल्पना ,आशियाँ =घोंसला
हमसाया =पड़ोसी

882-तुम अदीम हो

तुम अदीम हो

तुम अदीम हो फिर भी मेरे लिए प्रिय आश्ना हो 

क्या कहूँगा मैं उस खुदा से जब तुम्हें मांगना हो 


मैंने तसव्वुर में तेरी सुन्दर तस्वीर बनायी है 

चेहरा उससे मिले चाहूंगा तेरी यही कामना हो 


कांच के टुकड़ों सी आपस में सारी यादें जुड़ जाएं

अंतिम साँस लूँ तब प्रगट तुम जैसा आईना हो


तेरी इबादत करता हूँ इस बात से खुदा वाक़िफ़ है

तेरी बंदगी में मेरा सर झुके जब तुझसे सामना हो


तुम पावन बहती गंगा हो और मैं उसका किनारा हूँ

निष्पाप रहे सदा मेरा मन मुझमें न कोई वासना हो


कभी तुमसे मुलाकात हो मेरी यह मुमकिन नहीं है

दीदार करता हूँ हरदम तेरा पर तुम तो मृगतृष्णा हो


किशोर कुमार खोरेन्द्र

(अदीम =अप्राप्य ,आश्ना =मित्र ,)

881-एक न एक दिन...

एक न एक दिन...
एक न एक दिन मैं तुम तक पहुँच जाऊंगा 
गुबार हूँ तो क्या फलक तक पहुँच जाऊंगा


इस जहाँ में यह मुहब्बत एक तसव्वुर है 
प्यार में तेरे मैं उफ़ुक तक पहुँच जाऊंगा


माना की मुझे बहुत रुसवा किया है जमाने ने 
तेरे खातिर रूहानी सबक तक पहुँच जाऊंगा


रहे उल्फत ने तेरे शहर तक ला दिया है मुझे 
तेरे घर ले जाए उस सड़क तक पहुँच जाऊंगा


तेरे आँगन में खूबसूरत गुल ही गुल खिले हैं 
अब मैं तेरे जुड़े की महक तक पहुँच जाऊंगा


किशोर कुमार खोरेन्द्र


(गुबार=धूल , फलक=,आकाश ,उफ़ुक =क्षितिज ,रुसवा =बदनाम ,सबक =अनुभव
रहे उल्फत =प्रेम का रास्ता ,)