शनिवार, 7 अगस्त 2010
शब्दों की भीड़
कलम ..नयन ..स्मरण ..निर्जन ..मन ...संग
मन ..सुमन ..ह्रदय ..नमन ..अवचेतन ..फल ..सध ..पल ..क्षण ..दर्शन
रब ..सब ..सबब ..अब ..तलब ..कब ॥
जिया .पीया ..किया ..दिया ..लिया ॥
धार ..वार ..कतार ...कटार
शनिवार, 17 जुलाई 2010
मुझे नहीं हैं पसंद
मुझे सभी लेते हैं पढ़
लेकिन तुम हो एक
सजिल्द किताब सी बंद
मेरे विषय में तो
हर किसी कों हैं खबर
लेकिन तुम बर्फ से ढकी
हुई हो -शिखर पर ....
मन्दिर की -एक स्वर्ण कलश
इसलिए
तुम्हारी प्रतिभाओं से हो कर
अनभिग्य -
मैंने भी अपनी कल्पना में
तुम्हारे बारे में -अनेकों kahaniyaan
ली हैं गढ़
मैं हर चबूतरे या चौराहे पर
लोगों से जात्ता हूँ मिल
सुनता हूँ -सब का दुःख
इसी लिये -तुम्हारे संग संग
पाया नहीं अब तक चल
तुम कहती हों मुझसे -
मुझे चलते रहना हैं संभल
अपनी देह की गगरी तक ही
रहती हूँ मैं -छलक
पर मैं कहता हूँ -
ठीक हैं हर कोई
अपनी देह की कमीज कों
पहन कर -
भीड़ के समुद्र की लहरों सा
अपनी अपनी राह में
रहा हैं मचल
लेकिन ..सामाजिक जीवन
पर्वत तो नही हैं .....जड़
की उसकी समस्याओं के दुर्ग
पर विजय की पताका फहराए
हर कोई अलग अलग
इसलिए
लोगों से मिलने से पूर्व
अपने चेहेरे पर -
और एक चेहरा लेती हो कयों मद
तुम्हारी यह aadat
मुझे नहीं हैं पसंद
किशोर
शुक्रवार, 9 जुलाई 2010
सौन्दर्य का सृजन

जल कहता हैं
मुझे मत छूना
सिहर कर मैं जाउंगा हिल
परछाई कहती
मत करना मेरा स्पर्श
भावावेश में हो उत्तेजित
मैं जाउंगी मिट
लगता हैं मैं हूँ मानों -
मनुज ..एक सीप
जो अपने सीने में -
पंखुरियों के सदृश्य
ह्रदय की भावनाओं से निर्मित
कल्पनाओं के रंगीन मोती कों -छिपाए हुए
रह जाता हैं -आखिर तक गरीब
मेरी कल्पना तुम नहीं हो कमीज
की -
जिसे मैं उतार कर
खूंटी पर टांग कर -कर जाऊ विस्मृत
तुमने तो मेरे -तन ,मन ,और आत्मा तक कों
रंगीन चूनरी सा ओढ़ रखा हैं
हे मेरी कल्पनातीत
इसलिए चाहता हूँ मैं -
कभी तुम जाओ मुझे
इस स्वप्न रूपी जग में
साकार रूप में मिल
लेकिन तुम कहती हों -मुझसे ...
मैं आईने के भीतर हूँ समाहित
मुझे बिम्ब समझो या ...
प्रतिबिम्ब
मतलब एक ही हैं -
ध्यान -मग्न यदी ..विचारोगे
होकर तल्लीन
मेरी सुन्दरता हैं ...
अनुपम और रमणीक
जिस दर्पण में मैं हुई हूँ -परावर्तीत
वह दर्पण भी हैं
असीम और अपरमीत
इसलिए हे कवि -
मैं कल्पना हूँ
चिर यौवना और शून्य में --कोहेरे सी विलीन
मैं स्वप्ना सी तुम्हें होते रहती हूँ
जागरण हो या नींद -
दोनों ही अवस्थाओं में आभासित
इसलिए मुझे यदी चाहोगे
अपने बाहूपाश में यदि भीचना
तो
चूर चूर हो जायेंगा संग
उसी क्षण -
दर्पण का भी अस्तित्व
फिर कैसे रचोगे
कल्पना में ...सौन्दर्य के उतुंग शिखर कों
हे कवि .......!
सृजनशील
kishor
शुक्रवार, 4 जून 2010
हम प्रभु के संग तल्लीन
उस पार जहां ...
न तन की
न मन की
कामनाये होती हैं अधीर
वहां ........
पर हैं शुभ्र रश्मियों से बना
एक श्वेत मन्दिर
रेत के कण कण होते हैं स्वर्णिम
लहरों के शीतल जल से भींगी ...
हवा बहती हैं मद्धीम मद्धीम ...
रंग बिरंगे फूल खिले होते हैं ....
सुगंध सहित अनगिन
वहां -
सत्य की चेतना से
कण कण होते हैं हर्षित
सारे बिम्ब नहीं होते
कांच में समाये
प्रतिबिम्बों के अधीन
वहां -
तांडव नृत्य में सभी होते हैं प्रवीन
ओम नाद के संग
गूंजता मधुर संगीत
अमृत पान के लिये
सभी रहते हैं आतुर
उस लोक से
कोई लौटना नहीं चाहता
पर आते हैं हम सभी
करने श्रेष्ठ कार्य
ताकि -
हो सके .....
आनंदित सत्य के चरणों में
पुष्पों के सदृश्य हम ...अर्पित
मन्दिर के भीतर विराजती माता पार्वती
संग रहते हैं सदा शिव
नागराज .......
सखानंद ..नृत्य प्रशिक्षक
और
तृष्णा ....प्रसाद के वितरक
शंख ...करताल ...डमरू
की ध्वनियों के बीच
ओम नम: शिवाय
के होते हैं मन्त्र उच्चरित
वत्सला -पहन लाल वस्त्र
पाती
पीता महादेव और मां अम्बा का
सस्नेह आशीष
नन्हे ननकू कों लगती हैं प्यास
तब
वह पीता हैं
मांगकर अमृत की बुँदे -अतिरिक्त
उस पार जहां -
हैं शिवलोक
कनक पुर से होते हुए
आकाश में छाये बादलों कों पार करते हुए
जाना पड़ता हैं
लेकिन
प्रकाश पुंज के भीतर
किरणों सा -होकर प्रवाहित
उस पार जहां
न तन की
न मन की
होती हैं कामनाये अधीर
बस रहते
हम प्रभु के संग तल्लीन
बरखा ग्यानी
सोमवार, 17 मई 2010
समर्थन अनुकूल
शहर के बीच
थी बहुत भीड़
लेकिन किसी व्यक्ति से
नही हो पायी मेरी बातचीत
अब मैं
बहुत दूर ...
नदी के साथ साथ चल रहा हूँ
लेकिन मेरे मन में भी हैं
एक गहरा समुद्र
जिसके लहरों के प्रश्नों के घाट -प्रतिघात से
निरुत्तर तट अब तक हैं अटूट
शहर हो ,जंगल हो , या ग्राम
हर जगह वृक्ष ,पर्वत
और जल ...सब हैं चुप
केवल जीविका उपार्जन के
लिये ही
बनता हैं सामाजिक -मनुष्य
शेष समय वह होता हैं
अकेला और मूक
लेकिन अंतत:
संसार के रेगिस्तान से छनकर
उड़ रहा बालू कण सा हैं महीन
मेरा रूप
या
मौन के जल का निथरा हुआ
हूँ एक बूंद
raajniti और आर्थिक निति
के अंतर्गत हैं मानव समूह
लेकिन
व्यक्तिगत परिप्रेक्ष्य में अपनी
निजता के अवबोध से हैं
हर मनुज व्याकुल
क्या ज्ञान के लिये जरुरी हैं
की
मैं जान लू व्यापक सिन्धु सम्पूर्ण
या
खंगालू अपने भीतर के
व्यक्तित्व में अकेले ही
आनंद का स्वरूप
लेकिन
इस उपलब्धि के लिये
आवाश्यक हैं
स्त्री मन और पुरुष मन में
परस्पर ..सौहाद्र पूर्ण ...
समर्थन अनुकूल
किशोर
रविवार, 2 मई 2010
प्रतिबिम्बों का झूठा समर्थन
एक अक्स
उस चेहेरे सा ही मेरा चेहेरा हैं
क्या सच ...?
कांच के भीतर परछाईयों से मुलाक़ात होती हैं
अकसर
और रिश्तों में गहराई का मुझे होता हैं
भरम
तोड़कर शीशे की दीवार बाहर नही पाता
उतर
खुद कों पहचानने के लिये जब भी खड़े होता हूँ
सबके समक्ष
निगाहों के शीशे मुंह फेर लेते हैं
उधर
हरेक के पास अपनी हैं
एक चमक
मुझे कौन पहचानेगा मैं तो हूँ अंधेरो से बना
एक तमस
लेकिन उन्हें पता नहीं काली पृष्ट -भूमी पर ही उभर कर आते हैं
श्वेत ॥दुधिया ..धवल रंग
लेकिन मेरे लापता इस व्यक्तित्व कों कैसे समझाऊ कि
सत्य कों जीने के लिये नही चाहिए
दर्पण में समाये
प्रतिरूपों कों अपनाए
प्रतिबिम्बों का -झूठा समर्थन
किशोर


