शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

बुधवार, 10 जून 2015

944-kshanikaaye

kshanikaaye

1-वार्तालाप
तुम ही मेरा सुर हो
तुम ही हो मेरा आलाप
मन ही मन तुमसे
करता रहता हूँ
मैं निरंतर वार्तालाप

२- स्मृति
मेरे मन के भीतर
बहती है
स्मृति की एक अंतहीन नदी
जिसके जल दर्पण में
उभर आयी है
तुम्हारी सुन्दर छवि

३-परवाह
नदी पर्वत हो या राह
सभी करते हैं
मेरी तरह तेरी परवाह

४-कथा
मेरी व्यथा
बन गयी एक अमर कथा

५-दर्द
दर्द बहुत है सीने में
तुमसे बिछड़ कर
मज़ा नहीं आ रहा जीने में

६-उल्फत
रहे उल्फत में आता है
एक न एक दिन वह मोड़
अलग अलग हो जाते है रास्ते
चल पड़ते है फिर हम
विपरीत दिशा की ओर

७-खत
आज भी तुम्हारा
नहीं आया खत
कह रहा दरवाज़ा
इंतज़ार करना
छोड़ना मत

८-वीरान
तुमसे कुछ कह पाना
अब आसान कहाँ है
तुम बिन लगता
वीरान यह जहां है

९-अक्फर
अक्फर हूँ तो क्या हुआ
अकीब रहा हूँ
मैं तेरा अक्सर

अक्फर =बड़ा नास्तिक ,अकीब =अनुगामी
१०-शुक्रिया
बरकरार ए हौसला अफजाई
के लिए शुक्रिया
तुमने तो मुझे
अपना दिल दे दिया

११-चितवन
तेरी मस्त निगाहों के हैं हम कायल
तेरी चितवन ने किया है हमें घायल

१२- असर
तेरे सिवा मुझे
कुछ आता नहीं नज़र
मोहब्बत का आँखों पर
इतना ज्यादा होता है असर

किशोर कुमार खोरेन्द्र

943-तेरा ख्याल मुझे...

तेरा ख्याल मुझे...
तेरा ख्याल मुझे ,तराश रहा है
मेरे ह्रदय में ,तेरा निवास रहा है

परछाई बिना नहीं रह सकता जल
तेरा साया सदा मेरे आसपास रहा है

बून्द में सागर का ख़्वाब तो होगा ही
तेरा ,मुझे वैसा ही ,अहसास रहा है

मालूम नहीं कितने बार जन्मा हूँ मैं
तबसे मेरा वजूद ,तुझे तलाश रहा है

दर्दे तन्हाई का कारवां साथ है मेरे
तुझपे ,मुझे अटूट विशवास रहा है

किशोर कुमार खोरेन्द्र

शनिवार, 23 मई 2015

942-kshanikaayen

kshanikaayen
1-तुम लौ हो मैं हूँ बाती
एक दीया प्यार का
यूँ ही सदा जलता रहे
२-दिन
किसी न किसी दिन तो
तुम अपने दिल की बात मुझसे कहोगे
उस दिन के इंतज़ार में जिए जा रहा हूँ
३-ख़ामोशी
तेरी ख़ामोशी के सहारे ही जी लेंगे
यह सोच कर की तुमने
बहुत कुछ मन ही मन
मुझसे कहा होगा
४-बेवज़ह
इस जहां में ऐसी है कोई जगह
जहाँ पर हम दोनों मिले बेवज़ह
५-फर्क
तुझमे और मुझमे बस है फर्क इतना
तुम मुझे भूल जाते हो
मैं तुम्हारी यादो के जल से
भरा रहता हूँ सागर जितना
६-लफ्ज़
मेरे शब्द तेरे ही तो लफ्ज़ होते हैं
अक्षरों में तेरी बोलती आँखे
तेरे मुस्कुराते लब
उपलब्ध होते हैं
७-पत्थर
दिल तोड़ना न तुझे आता है न मुझे
हर मोड़ पर इसलिए मील की जगह
लम्बी इंतज़ार के पत्थर होते है
८-परिचय
शब्दों के द्वारा होता है
जब एक दूसरे से परिचय
भींग जाता है तब
स्निग्ध स्नेह से ह्रदय
९-गुरुर
तुम्हें अपने हुस्न पर है गुरुर
मेरे इश्क़ में भी पर है शुरुर
kishor kumar khorendra

942-जबसे तेरे मेरे दरम्यां.....

जबसे तेरे मेरे दरम्यां.....
जबसे तेरे मेरे दरम्यां और फ़ासिला बढ़ गया
तबसे तुझसे मिलने के लिए हौसला बढ़ गया
मेरे लिये तेरे बगैर जीना अब आसान नहीं है
रहे तन्हाई में मेरे दर्द का काफिला बढ़ गया
जुदा न कर पायेगा सारा जहां तुझे मुझसे
मन में प्यार का अटूट सिलसिला बढ़ गया
एक चिंगारी सी उड़ी जब आँखें टकरायी
शोलों की लपटों से घिरा हूँ मामला बढ़ गया
किशोर कुमार खोरेन्द्र

941-.प्यार के बदले में....

प्यार के बदले में....
प्यार के बदले में नहीं कुछ पाना चाहता हूँ
दूर से ही सही तेरा रूप निहारना चाहता हूँ
वो घडी भी आ गयी की तुझे अब जाना है
तेरी पलकों के भीतर छुप जाना चाहता हूँ
यादों की भी एक अलग सी दुनियाँ होती है
वहीँ पर मैं सदा के लिए रुक जाना चाहता हूँ
तेरी मोहब्बत के सिवाय पास मेरे क्या है
सरे राह तेरे कदमों तले लुट जाना चाहता हूँ
रोज रोज लिखता रहूँगा तुझे मैं प्रेम के खत
तेरी रूह से इस तरह मैं जुड़ जाना चाहता हूँ
किशोर कुमार खोरेन्द्र
सरे राह =राह में चलते हुऐ

940-मुझसे किसी बात पर....

मुझसे किसी बात पर....
मुझसे किसी बात पर तू नाराज़ न हो
नदी सी साथ चल मुझसे नासाज़ न हो
यूँ तो हर समय तुझे मैं याद रखता हूँ
मेरे किसी व्यवहार से तू नाशाद न हो
तेरी इबादत करता रहूंगा मैं आजीवन
मेरी नियत मेरे इरादे कभी नापाक न हो
मैं सदा से तुम पर मुग्ध हूँ निसार हूँ
मेरी पूजा मेरी उपासना नाकाम न हो
तेरी निगाहों को पढता रहूँ सुनता रहूँ
एक दूसरे से अलग हो ऐसे हालात न हो
किशोर कुमार खोरेन्द्र
{नासाज =प्रतिकूल ,नाशाद =अप्रसन्न ,इबादत =उपासना
नापाक =अपवित्र ,निसार =कुर्बान ,नाकाम=असफल
हालात =दशा }

939-क्षणिकायें

क्षणिकायें
१-निशाने पर
उसी शहर उसी गली उसी मोड़ उसी ठिकाने पर हूँ मैं
तेरी घायल कर देने वाली निगाहों के निशाने पर हूँ मैं

२-हुस्न
तेरे प्यार की ख़ुश्बू से महकने लगा हूँ
तेरे हुस्न की आंच से दहकने लगा हूँ

३-तन्हाई
नहीं है तेरे सिवा मेरा कोई
तू ही तो है मेरी तन्हाई

४-इज़हार
तुम करो न करो मुझसे प्यार
मैं तो
करता रहूँगा प्रेम का इजहार

५-कश्ती
साहिल तक पहुँच पायी कश्ती
लगा जैसे
मंझधार में वो कर रही हो मस्ती

६-परवाह
तेरे मन में
मेरे प्रति भले न हो चाह
पर मैं तो हर पल
करता हूँ तेरी परवाह

७-अपमान
जब तक तेरे इश्क़ में
मैं न होऊं बदनाम
तब तक
इश्क़ का होगा अपमान

८-
मैं चाहता हूँ
रोज तुझसे मिलना
तेरे मन उपवन में
हर दिन फूलों सा खिलना

९-संग मेरे
संग मेरे
अतीत के संयोग के हैं पल
और
भविष्य के वियोग के हैं पल

किशोर कुमार खोरेन्द्र

938-खुश था ,हूँ....

खुश था ,हूँ....
खुश था ,हूँ
तुम्हें पाकर
खालीपन के नमकीन जल से
भरा लगता है
तुम बिन अब यह महासागर
बतलाओ मिलोगे तुम कब
मुझसे आकर

हम दोनों के बीच
उमड़ कर नहीं आयेंगें अब
कभी क्या सावन के रसीले बादर
बहार रह जायेगी
क्या सदा के लिए
पतझड़ के बाहर

खुश था ,हूँ
तुम्हें पाकर
खालीपन के नमकीन जल से
भरा लगता है
तुम बिन अब यह महासागर
बतलाओ मिलोगे तुम कब
मुझसे आकर

मेरी उंगलियाँ
तुम्हारी नरम उँगलियों को
छू न पायेगी
तुम्हारी आँखों को मेरी आँखें
न पाएंगी निहार
दूर हो गए हम दोनों
केवल
प्यार की कसमों को खाकर
बस एक बार
गीत मिलन के गाकर

खुश था ,हूँ
तुम्हें पाकर
खालीपन के नमकीन जल से
भरा लगता है
तुम बिन अब यह महासागर
बतलाओ मिलोगे तुम कब
मुझसे आकर

किशोर कुमार खोरेन्द्र

937-तुमसे मेरी....

तुमसे मेरी....
तुमसे मेरी जब कभी बात होगी
अमावश तब चांदनी रात होगी

मुझे अपने दिल में बसा लिए हो
न जाने तुमसे कब मुलाक़ात होगी

खिजाँ और बहार तो आते ही रहेगें
भींगी घटाओं से कब बरसात होगी

ख्वाहिशे वस्ल लिए जन्म लूंगा
जब तक ये सारी कायनात होगी

मिलते ही बिछड़ गए हम तुम
याद रहूँ यह बड़ी करामात होगी

किशोर कुमार खोरेन्द्र

936-kshanikaayen

kshanikaayen
१-सागर
मैं सागर हूँ
तुम हो भरा हुआ मय
कहूँ तो
यही सच हय
(सागर =प्याला )

२-कविता
जब तक तुम हो
तब तक मैं हूँ
और
तब तक है कविता

३-प्रेम
जीवन खत्म हो जाता है
प्रेम नहीं

४-खत
संभाल कर रखा हूँ सारे खत
पढ़ लिया करता हूँ जब जब
सूना होता है जीवन का पथ

५-प्रभाव
जब हो जाता है किसी से लगाव
तब उसकी ख़ामोशी का
मन पर
कुछ ज्यादा ही पड़ता है प्रभाव
अनुत्तरित सवाल की तरह
आ जाता है समय में ठहराव

६-आशिक़
तुझ पर कितना भी लिखूं वो कम है
तेरे सच्चे आशिक तो हम हैं

७- पत्तें
उनके पास पढने के लिए समय नहीं है
फिर भी हम लिखते रहते हैं
उनके मौन के आँगन में
पत्तों सा
टप टप झरते रहते हैं

किशोर कुमार खोरेन्द्र

935-प्यार इसे ही तो कहते हैं....

प्यार इसे ही तो कहते हैं....
तुमने मुझे देखा
जैसे देखा ही न हो
तुम्हारी आँखों में मेरी परछाई थी
तुमने मुझे सुना
जैसे सुना ही न हो
तुम्हारे कानों में मेरी आवाज गूंज रही थी
तुम मुझसे मिले
जैसे मिले ही न हो
मैं सरापा तुम्हारे मन में था
तुमने मुझे याद किया
जैसे याद किया ही न हो
तुम्हारी हर धड़कन मेरा नाम पुकार रही थी
तुमने मुझे चाहा
जैसे चाहा ही न हो
फूलों को ,पत्तों को ,
तितलियों को पर यह मालूम था
प्यार इसे ही तो कहते हैं
हम तो तेरे दीवाने है
सब सहते रहते हैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र

934-हुस्न और इश्क़

हुस्न और इश्क़
हुस्न और इश्क़ की जोड़ी सदा सलामत रहे
दोनों एक दूसरे की करते सदा इबादत रहे

ये जिस्म तो सिर्फ रूह का खूबसूरत लिबास है
हम दोनों के मन का पाक रिश्ता ता क़यामत रहे

बहुत पास आकर भी मलिन हुआ नहीं हमारा मन
दोनों के बीच कभी न कोई शिकवा न शिकायत रहे

प्रेम की पराकाष्ठा को हमारे द्वारा छू लिया जाए
हृदय की पवित्र भावनाओं में ऐसी ऊँची चाहत रहे

मैं केवल तुम्हारे बाह्य सौंदर्य का उपासक नहीं हूँ
तेरे हर रूप के प्रति मेरे जोशे जुनूँ में शबाहत रहे

किशोर कुमार खोरेन्द्र
(शबाहत -एक रूपता)

गुरुवार, 7 मई 2015

933-रहनुमा...

रहनुमा...
तुम मेरे रहनुमा हो
साथ तेरे
अंजाम तक का सफर
खुशनुमा हो
सितारों के नूर से जगमगायें फलक
जमीं पर गुल ही गुल बिछे हो दूर तलक
मेरे संग तेरी यदि दुआ हो
तेरी महक से घिरा रहूँ
मेरे आसपास
चन्दन की खुश्बू से तर
जैसे तू यदि धुँआ हो
इबादत करते करते
हो जाऊं जिसके लिए फ़ना
तुम ऐसी मेरी महबूबा हो
मेरे किसी सवाल का जवाब तूने दिया नहीं
प्यार की भाषा मौन है
इसलिए तुम बेजुबाँ हो
तुमने सिर्फ मेरी उल्फत को जाना है
मैंने बताया नहीं कभी
कि
तुम तो मेरे खुदा हो

जहाँ में लोग मिले बहुत
पर तुम सबसे ज्यादा हसीं और
आदत से जुदा हो
वो दिन मेरे जीवन का अंतिम होगा
जब तुम
मुझे अपने आगोश में लेकर कहोगे
तुम मुझपे फ़िदा हो
किशोर कुमार खोरेन्द्र

बुधवार, 6 मई 2015

932-क्षणिकायें

क्षणिकायें
१-बात
तुमसे मेरी बात हुई थी
जब मैं और तुम चुप हो गए थे
२-दरकिनार
कही तुझसे दरकिनार न हो जाऊँ
सिर्फ मैं तेरा इंतज़ार न हो जाऊँ
३-मित्र
हर महफ़िल में मैं तेरा ही जिक्र करता हूँ
बस तुझ एक को ही अपना मित्र कहता हूँ
४-तस्वीर
तेरी तस्वीर को देखते हुये गया समय बीत
बरसों हो गए मैं तुमसे नहीं पाया मिल
५-सुरूर
जामे मय सी है तेरी निगाहें
तेरी आँखों से सुरूर छलक आये
६-भ्रमण
तुमसे पल भर को भी
जुदा होना चाहता नहीं मन
तेरे आसपास ही भंवरे सा
करता रहता भ्रमण
७-जुबाँ
लब खामोश हैं तो क्या हुआ
रोम रोम तेरे
मेरे लिए जुबान बने हुये हैं

kishor kumar khorendra

रविवार, 3 मई 2015

931-क्षणिकायें...

क्षणिकायें...
१-प्यार की कहानी
रूबरू मिलना होता नहीं ज़रूरी
बिना मिले ही
प्यार की कहानी हो जाती है पूरी

२-व्यथा
पढ़ते रहे एक दूसरी की कथा
पर
एक जैसी होती है सबकी व्यथा

३-अश्क़
तेरी आँखों से भी मेरे लिए कभी कभी आंसूं बहते होंगे
यह सोचकर मेरे अश्क भी तेरे दर्द को और सहते होंगें

४-याद
तेरी यादों के सहारे ये जिंदगी गुजर जायेगी
तेरी तस्वीर जब तब आँखों में उभर आयेगी

५-दीदार
उनकी दृष्टि से हम
गुनाह कर बैठे
बिना पूछे उनसे हम
चुपके से
उनकी तस्वीर का
दीदार कर बैठे

6-फासला
बहुत फासला तय करना पड़ा मुझे
जीत कर तेरा दिल
रस्मों रिवाज के हाथो
तुझे ......
हारना पड़ा मुझे

किशोर कुमार खोरेन्द्र

930-अंजाम ....

अंजाम ....

अब पूछूंगा नहीं तुमसे
किस रंग के है तुम्हारे परिधान
आँखों में अश्रु है तेरे
या अधरों पर मधुर मुस्कान
न खत होंगे
प्रेम अभिव्यक्ति के प्रमाण
न मेरे सपने करेंगें अपनी दुनियाँ में
तुम्हारा आव्हान
अब मेरे ख्याल तुम्हारे ख्यालों को
कर देंगे दरकिनार
तुम्हारी जुल्फों के ख़म में
न उलझा करेंगे मेरे विचार
वो पुल ,वो नदी ,वो किनारे
वो नीम का वृक्ष
नहीं करेंगें संग मेरे
तुम्हारा इंतज़ार
अब तेरी ख़ामोशी से मेरी ख़ामोशी की होगी
तन्हाई में सिर्फ
औपचारिक जान पहचान
मुझसे मुंह फेर लेने का
यही तो होगा न अंजाम
किशोर कुमार खोरेन्द्र

शनिवार, 2 मई 2015

929-अब मैं खुद को...

अब मैं खुद को...
अब मैं खुद को भूलाकर आप हो गया हूँ
राहे इश्क़ में चलकर निष्पाप हो गया हूँ
तेरी तस्वीर से ज्यादा सुन्दर कुछ नहीं
कभी रूबरू मिला था वो मिलाप हो गया हूँ
याद आते है मुझे वस्ल के सारे वे हसीन पल
जुदाई में तेरे अश्कों सहित विलाप हो गया हूँ
तेरे भी दिल में होंगे मेरी खातिर कुछ अरमान
दूर आकर तुमसे मैं एकाकी आलाप हो गया हूँ
दीवारों के कान , खिड़कियों की जुबान होती है
अंधी गलियों गुमराह सड़को के खिलाफ हो गया हूँ
किशोर कुमार खोरेन्द्र

928-"क्षणिकायें"

"क्षणिकायें"


१-
ख्याल
बीत गए सालो साल
गया नहीं मन से
तेरा ख्याल
२- रूप
छाँव हो या धूप
हर जगह दिखलाई
देता है मुझे
तेरा ही रूप
३-करीब
नहीं रहेगा जब यह शरीर
तब भी तुम रहोगे
मेरे मन के करीब
४-रास्ता
मंजिल नहीं थी ज्यादा दूर
तभी अचानक
उनका रास्ता गया मुड
५-चित्र
मेरा चित्र आते ही
वे आगे बढ़ जाते हैं
जैसे मुझे जानते ही न हो
ऐसा जतलाते हैं
६-अंत
बातचीत है बंद
दोस्ती का लेकिन
नहीं हुआ अंत
किशोर कुमार खोरेन्द्र

गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

927-क्षणिकायें..

क्षणिकायें..
१-
"कौन सोचता है"

तेरे प्यार में जीने लगा हूँ
जान देने की
कौन सोचता है
तेरे प्यार की झील में
तैरने लगा हूँ
डूबने की कौन सोचता है
२-
"उन्हें"

उन्हें आता नहीं है
प्यार जताना
आता है तो
चुप रह कर
सिर्फ तड़फ़ाना

३-
'मुलाकात"

हर मुलाकात को
आखरी मान कर
मिला करो
क्योंकि जिंदगी का
कोई भरोसा नहीं होता
४-
"पैगाम"

कई दिन कई माह कई बरस
बीतने के बाद
आई है वो शाम
जिसके लिए बरसो पहले
दिया था मैंने
उन्हें पैगाम
५-
"लब"

खामोश रहते है तेरे लब
समझ लेता हूँ मैं
उनकी ख़ामोशी का मतलब
६-
खबर

अब तेरी निगाहों में
मैं आने लगा हूँ नज़र
पर तुझे इस बात की
जरा सी भी नहीं है खबर
किशोर कुमार खोरेन्द्र

926-लाज़वाब '

लाज़वाब '
मैं मानता हूँ तुम्हारे घर के आँगन के गमले में
जैसे मैं हूँ
एक खिला हुआ गुलाब

पर तुम कहती हो तुम्हारे मन के आकाश में सूर्योदय का हूँ मैं सुनहरा आफताब
तुम्हें मैं निरंतर पढ़ रहा हूँ लेकिन जिसका अंत न हो ऐसी हो तुम एक किताब सीने में रखकर तुम्हें सो जाया करता हूँ ताकि नींद में संग लेकर आये तुम्हें ख़्वाब
तुमसे मैं प्रतिदिन करता आ रहा हूँ अपने प्रेम का इजहार पर नहीं मिला है मुझे तुमसे आज तक कोई जवाब
फिर भी मेरी दृष्टी में तुम खूबसूरत हो और हो लाज़वाब
किशोर कुमार खोरेन्द्र

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

925-मुझे मिल गयी..

मुझे मिल गयी..
मुझे मिल गयी तेरी रफ़ाक़त अच्छा है मुझे मिल गयी तेरी मुहब्बत अच्छा है
मुझे भी सभी लोग बुतपरस्त समझ लेते करने लगा हूँ अब मैं तेरी इबादत अच्छा है
पूछ कर कोई किसी से इश्क़ करता नहीं है पर मिल गयी मुझे तेरी इज़ाज़त अच्छा है
जल कर एक दिन मुझे भी राख होना ही है अभी हुस्न को इश्क़ की है जरुरत अच्छा है
मेरी उल्फत को तूने अभी जाना ही नहीं है मांग लो मुझसे और और मोहलत अच्छा है
किशोर कुमार खोरेन्द्र {रफ़ाक़त =मैत्री ,बुतपरस्त =मूर्ति पूजक ,इबादत =उपासना,मोहलत =निश्चित समय }

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

924-आते आते मुझसे...

आते आते मुझसे...
आते आते मुझसे दूर चले जाते हो
रह रह कर मुझे क्यों तरसाते हो

मैं तुझ पर मर मिटा दीवाना हूँ
फिर मुझे ही क्यों भरमाते हो

तुम तक पहुँच पाना संभव नहीं
क्या इसलिए गुस्सा जतलाते हो

प्रेम का अर्थ ही शाश्वत वियोग है
तुम ही तो मुझे यह समझाते हो

एक टीस ठहरी रहती है सीने में
क्या तुम भी ऐसे ही घबराते हो

किशोर कुमार खोरेन्द्र

923-लोगों के डर से.........

लोगों के डर से.........
लोगों के डर से मुझ से तुम चले, दूर जाते हो
पास आने के लिए फिर हो,मजबूर जाते हो

यूँ तो तेरे ख्वाब में ,तेरे ख्यालों में ही रहता हूँ
जहाँ मिले थे पहली बार, वहाँ जरूर जाते हो

नरम बालू सा धूल सा बिछा रहा तेरे कदमों तले
न जाने क्यों फिर भी तुम मुझसे रूठ जाते हो

प्यार को आजीवन निभाने का वादा किया हूँ मैं
बार बार क्यों आईने के शीशे सा तुम टूट जाते हो

बादल की छाँह सा तुम साथ रहते हो मेरे हरदम
अचानक तन्हा कर किसी मोड़ से क्यों मुड जाते हो

किशोर कुमार खोरेन्द्र

922-क्षणिकायें...

क्षणिकायें...
1-क्या तुम....
क्या तुम मृगतृष्णा हो या माया हो
या
आईने के भीतर की
कभी न पकड़ आनेवाली छाया हो

2-खलिश.....
जाते जाते
छोड़ जाते हो
सीने में खलिश
तब
घेर लेता है मुझे
इश्क़ का आतिश
(खलिश =चुभन ,आतिश =अग्नि )
3-लब...
होता होगा
कुछ तो मतलब
जिसे कह नहीं पाये
आज तक तेरे लब

4-हिलमिल...
तेरी कविता और मेरे काव्य के दिल
एक दूसरे से गये हैं हिलमिल

5-रात..
बीच में ये आती है क्यों रात
तुमसे
हो नहीं पाती है मुलाकात

किशोर कुमार खोरेन्द्र

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

921- तुम्हारे ह्रदय में....



 तुम्हारे ह्रदय में....
मैं तो सिर्फ
किताब का एक पन्ना हूँ
जिसे तुमने चुपके से फाड़कर
अपने पास रख लिया है
जब अकेले होते हो
तो उसे पढ़ लेते हो
प्यार कोई किससे कितना करता है
आखिर तक कोई नहीं जान पाता
जैसे तुमने मुझे यह मालूम ही नहीं होने दिया
की
तुम्हारे दिल में मेरे लिए
कितनी जगह है
मैं तुम्हारे सौंदर्य से अभिभूत ही रहूँगा
तुम अक्सर कह देते हो
मुझे महान
और मैं आज भी तलाश रहा हूँ
तुम्हारे ह्रदय में
अपने लिए स्थान
किशोर कुमार खोरेन्द्र

919-तेरा मैं इंतज़ार .....



तेरा मैं इंतज़ार .....
 
तेरा मैं इंतज़ार करता रहता हूँ
असहनीय दर्द सहता रहता हूँ 

मेरा मन लगता नहीं कहीं भी
बस तुझे ही पुकारता रहता हूँ

तुम्हें वियोग का अहसास है नहीं
आवारा दरिया सा बहता रहता हूँ

 मुझे मन से अपने अपना लो
यही तो तुमसे कहता रहता हूँ 

आते आते तुम्हें देर हो जायेगी
तेरी झलक पाने तरसता रहता हूँ

तेरे लिए प्यार   मुझमे असीम है
आजकल खुद को परखता रहता हूँ

किशोर कुमार खोरेन्द्र

918-क्षणिकायें...

क्षणिकायें...
1-खुशी
रास्ते में मिले पेड़ नदी और सागर
लेकिन
खुश हुआ एक दिन मैं तुम्हें पाकर
2-रास्ता
मेरा सिर्फ
तुझसे है वास्ता
तेरी और ही जाता है
मेरा हर रास्ता

3-हीरा
तेरे नूर से
रहता हूँ सदा घिरा
मैं सोना हूँ तू है हीरा

4- "फेसबुक
आपके आते ही आ जाती है जान
फेसबुक लगने लगता है महान

5-सरसार
देख कर जमाले यार
हो गया हूँ मैं तो सरसार
उन्हें इस बात की खबर नहीं है
क्या पता हो जाता उन्हें ऐतराज
{सरसार =मस्त
जमाले यार =महबूब का हुस्न }
6- करीब
बोलती है उनकी आँखें
मिलो कभी करीब आके
7- तन्हाई
तुम्हारे बगैर मैं अब ऊब जाता हूँ
तन्हाई के सागर में डूब जाता हूँ

8- चुप
क्या अब चुप रहना है
कुछ नहीं कहना है
9-जुगनू
रात के अंधेरों में
जुगनू सा चमकते हो
मैं तुम्हें नहीं भूला हूँ
किशोर कुमार खोरेन्द्र

917-मंजिल.....

मंजिल.....
लौट रहा हूँ
उन्ही पगडंडियों से
उन्ही रास्तों से
उन्ही सुरंगों से
उसी जंगल से होकर
गांव के सरोवर में खिले कमल
को निहारते हुए
गगनचुम्बी चिमनियों के शहर में
फिर से.....
मैं व्यर्थ ही क्षितिज तक चला गया था
सागर में इतराती लहरों ने कहा -
हमारे पास न सीप है न मोती
तब मैंने जाना
मंजिल मैं खुद था
रास्तों पर गुबार के समूह सा
भटक रहा था
किशोर कुमार खोरेन्द्र

916-क्षणिकायें...

क्षणिकायें...


1-मुझे छेड़ो
मैं साज हूँ
सुनो एकांत में
मैं तुम्हारे ही
दिल की आवाज हूँ


2-मन रोज लिखता है अपनी आत्म कथा
लिख लिख कर
मिटाना चाहता हैं अपनी कहानी से वह
अपना दर्द अपनी व्यथा


3- बंदगी
एक दूसरे की कविताओं को
पढ़ते हुऐ
बीत रही है जिंदगी
तुम कहती हो इसे
सिलसिला ए मुहब्बत
मैं कहता हूँ इसे
तेरी बंदगी

4- नज़र
तेरी मुस्कराहट को देखूं
या
तेरे गेसूओं को
तेरी नशीली आँखों से
नजर हटती ही नहीं है

5- खुश्बू...
मन ने
पहले की तेरी आरजू
फिर शुरू हुई तेरी जुस्तजू

तू कही न कही
इस जहाँ में है जरूर
तभी तो
मेरे आसपास है तेरी खुश्बू


6- सपना...
किसे कहूँ मैं अपना
लोग ही कह देते हैं
यह जीवन है एक सपना

किशोर कुमार खोरेन्द्र

915-गुलमोहर के खिले हुए फूल

गुलमोहर के खिले हुए फूल

गुलमोहर के खिले हुए फूल मुरझाने से पहले तुम्हें देखना चाहते है गिरती हुई पंखुरियाँ तुम्हारे बालों में
उलझन चाहती हैं
शाखों की आड़ी तिरछी परछाईयाँ
मिलकर
हूबहू तुम्हारी तस्वीर बनाना चाहती हैं
जड़ें तुम्हे बिठाना चाहती हैं अपने करीब
ताकि तुम तने की पीठ पर
लिख सको फिर से मेरा नाम
सुन सको
मुझे छूकर तुम तक पहुंची
पुरवाई का कहना
अपने अपने अकेलेपन में
कुछ भी तो नहीं ना मना
आकार सहित मैं रहूँ या न रहूँ
असली बात तो यह है
यादों में, ख्यालों में ,सपनों में
एक दूसरे के रहना ही होता है
वास्तव में जीना

किशोर कुमार खोरेन्द्र
कवि किशोर कुमार खोरेंद्र's photo.

बुधवार, 15 अप्रैल 2015

914-मेरी रूह हो गयी है

मेरी रूह हो गयी है
जबसे तुझ पर आ गया है मेरा मन
वियोग में
मेरी रूह हो गयी है आवारा
मेरा मन हो गया है बदचलन

तेरे बगैर मेरे शेष जीवन में
मेरे इरादों का यही होगा प्रचलन
तेरी ओर जाती राह से
मेरे क़दमों का कभी न होगा विचलन
तेरी सांसों की खुशबू करेगी
मेरा मार्गदर्शन

तेरा और मेरा
इस कायनात में ज़रूर होगा
एक दिन मिलन
चाहता हूँ
तेरे तन से मेरे तन का
तेरे अंतर्मन से मेरे अंतर्मन का
तेरी आत्मा से मेरी आत्मा का
हो तब प्रगाढ़ आलिंगन
तेरे मेरे प्रेम का
हो जाए इस तरह
तब अमृत मंथन

मेरा काव्य तुम्हारी कविता का
करता रहेगा सम्मान

तुम्हारी कविता भी मेरे काव्य को
सप्रेम करेगी वरण
ऐसे तो मेरी चेतना के मस्तिष्क में
शाश्वत है तुम्हारा स्मरण

जबसे तुझ पर आ गया है मेरा मन
वियोग में
मेरी रूह हो गयी है आवारा
मेरा मन हो गया है बदचलन

किशोर कुमार खोरेन्द्र

913-तेरे प्यार में....

तेरे प्यार में....


तेरे प्यार में निरंतर यादों के दीये सा जल रहा हूँ
तेरे प्यार में सदा इंतज़ार के मोम सा पिघल रहा हूँ

पहली ही मुलाकात में कह देना था तुमसे सब कुछ
इजहारे इश्क़ के अभाव में हाथ अपने मल रहा हूँ

प्रत्येक आईने में अब तेरी ही सूरत नज़र आती है
तुम्हारे मौन इशारों के मुताबिक अब मैं ढल रहा हूँ

तेरे ख्यालों में डूबा हुआ क्षितिज तक आ गया हूँ
तुम्हें पता ही नहीं कि प्रेम में कितना बदल रहा हूँ

जगमगाते चाँद सितारें हों ,या सुनहरी धूप हो
तेरे ही रुख का नूर समझ संग उनके चल रहा हूँ

किशोर कुमार खोरेन्द्र

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

912-दूर तुमसे.....

दूर तुमसे.....
दूर तुमसे मैं तो रह नहीं पाता
बात तुमसे यह कह नहीं पाता
बिखरा बिखरा सा अब रहता हूँ
जुदाई तुम्हारी सह नहीं पाता
विरह की ईटों से बना मीनार हूँ
तेरी दुआ साथ हैं ढह नहीं पाता
तेरी याद में बर्फ सा जम गया हूँ
तेरे विपरीत मैं बह नहीं पाता
किशोर कुमार खोरेन्द्र

911-तुम इतने पास.......

तुम इतने पास.......
तुम इतने पास से गुजर गये
नज़ाकत से तेरी हम सिहर गये

महक तेरी सांसों में समा गयी
हम उन्हीं पलों में अब ठहर गये

तुम्हें इल्म ही नहीं की क्या हुआ
चाहत में तेरी हद से गुजर गये

बुलाये नहीं तुम मुझे अपने घर
फिर भी हम तो तेरे शहर गये

वियोग का दर्द तुम क्या जानो
हिज्र का हम पी कटु जहर गये

किशोर कुमार खोरेन्द्र
(najaakat =sukumaartaa ,sihar =kaampna, ilm =jaankaari ,hijr =judaaii }

910-क्षणिकायें

क्षणिकायें
१-इंतज़ार
हम रुके रहे तेरे इंतज़ार में
सदियाँ बीत गयी
पता ही नहीं चला

२-हुस्न
हुस्न पर इतना भी न किया करो ऐतबार
बिना खता किये बन जाओगे गुनाहगार

3-तुम"
तुम्हें देखने से मुझे अब कौन रोक पायेगा
मेरे ख्याल में मेरे ख़्वाब में तुम जो आते हो

4-सौंदर्य का वर्णन...
तराशा हुआ है तेरा बदन
मुखरित से हैं तेरे नयन
तीखे नाक नक्श में है
तीव्र आकर्षण
एक कवि तेरे रूप पर मुग्ध हो
करना चाहे
तेर अनुपम सौंदर्य का वर्णन
5-पाठक..
कुछ लोग होते हैं
इस जहां में सच्चे पाठक
जिनकी सकारात्मक प्रतिक्रिआओं
के फलस्वरूप
एक लेखक बन पाता है
शब्दों का अच्छा साधक
6-बहार.
तेरे आते ही
महफ़िल में आ गयी बहार
इस बज्म को तेरा ही था इंतज़ार
7-"टीस"
मेरी आँखों में है उनकी तस्वीर
ह्रदय में है उनसे
कभी न मिल पाने की टीस
8-सैयाद...
रखता हूँ तुम्हें मैं याद
मन के पिंजरे में कैद हो
मैं हूँ सैयाद
9-वक्त...
उसने कहा -
अभी नहीं
आज नहीं
कल नहीं
परसों भी नहीं
मुझसे मिलने के लिए
मैंने सोचा
इस जन्म में
उसके पास वक्त है ही नहीं
kishor kumar khorendra

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

909-बेगाने कभी कभी ....

बेगाने कभी कभी ....
बेगाने कभी कभी हो अपने जाते हैं
अपने कभी कभी हो बेगाने जाते हैं
इस दुनियां का दस्तूर समझ न पाया मैं
ख्वाब सच ,सच कभी हो अफ़साने जाते हैं
पूरी शिद्दत से चाहता हूँ मैं उन्हें आरंभ से
कह नहीं पाता जब वो आ सामने जाते हैं
आजकल मुझे देखते ही वो छुपने से लगे हैं
प्यार करने वाले इसी तरह अजमाये जाते हैं
कई जन्मों तक साथ जीने की तमन्ना थी मेरी
पर तोड़ने के लिए नाता गढ़े कई बहाने जाते हैं
परछाइयों से मोहब्बत करने से क्या होगा
एक न एक दिन चूर हो सारे आईने जाते हैं
धीरे धीरे हम हाशिये तक पहुँच ही जाते है
जब जहाँ में रिश्तों के बदल मायने जाते है
किशोर कुमार खोरेन्द्र

908-कभी नहीं मिलते...

कभी नहीं मिलते...
कभी नहीं मिलते ,कभी कभी मिलते रहे हो
पर जुबाँ तुम अपनी, हरदम सिलके रहे हो

प्यार के लिए जानता हूँ अल्फाज नहीं होते
फूल सा ह्रदय में पर , सदा खिल के रहे हो

तुम बिन यह जीवन ,अधूरा सा लगता है
नजरों में प्राय: मेरे ,साये सा हिलते रहे हो

तुम्हारी आवाज सुनने के लिए बेताब हूँ
मौन रह कर मगर, तुम पास दिल के रहे हो

अंतिम घडी तक मैं पुकारता रहूँगा तुम्हें
कायदा ए इश्क़ सा ,तुम बन फासिले रहे हो

तेरी तलाश में मैं तो दरिया सा बहता रहा हूँ
तुम सागर सा धीर गंभीर, सलीके से रहे हो

जहां में मेरी सिर्फ तुझसे ही क्यों हुई मोहब्बत
जन्मों से तुम मेरे प्रेम के, सिलसिले रहे हो

किशोर कुमार खोरेन्द्र

907-क्षणिकायें

क्षणिकायें
१-दोस्ती "
धीरे धीरे
गहरी होती है दोस्ती
सीप के भीतर
बरसों रहने के बाद ही
एक बून्द
बनती है मोती

२-चेहरा
एक चेहरा तेरा मुझे याद रहता है हमेशा सलोना
जिसे मेरी स्मृति नहीं चाहती है कभी भी खोना

३-ख्याल
रूबरू मिलने से होता नहीं फायदा
एक दूसरे के ख्याल यदि मिल जाएँ
तो जीने में मजा आता है ज्यादा

४--हक़
मुझ पर तेरा है हक़
इसीलिए तो मेरा मन
तेरी और जाता है बहक

५-याद
जागते हुऐ वो हमें हमेशा भूल जाते हैं
ख्वाब में जिन्हे हम याद खूब आते हैं

किशोर कुमार खोरेन्द्र

बुधवार, 11 मार्च 2015

906-न तेरे पास जवाब है

न तेरे पास जवाब है
न तेरे पास जवाब है ,न मेरे पास सवाल है 
मेरे पास तेरा ख्वाब है तेरे पास मेरा ख्याल है
एक किनारा तू है और एक किनारा मैं हूँ 
नदी सी खामोश दरमियान हमारे हयात है

अंजुम की पहुँच तो बस तेरे हुस्न तक ही है 
जो तेरे दिल को छूले मुझमे ऐसी कोई बात है

मैं पागल सा ,और दीवाना सा हो चुका हूँ 
तेरे नूर ए रुख से रोशन मेरी तो हर रात है

उस जहाँ इस जहाँ से अलग एक और जहाँ है 
जहां पर होती रोज तुमसे मेरी मुलाकात है

किशोर कुमार खोरेन्द्र
अंजुम =नज्म का बहुवचन,हयात=jivan

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

905-तुम मेरे बेताब मन का


तुम मेरे बेताब मन का

तुम मेरे बेताब मन का दूसरा हिस्सा बन गये  हो 
जिसे सुनता रहूँ  प्रेम का  वही किस्सा बन गये हो 

हर तरफ तेरे सिवाय  मुझे अब कुछ नजर आता नहीं  
दो जिस्म पर एक जान सा अटूट रिश्ता बन गये  हो 

माह ओ अंजुम  से घिर कर भी खुद को भुला न था 
सिवाय तेरे  कुछ याद नहीं ऐसा करिश्मा बन गये हो 

रेत  कणों  सा चूर चूर होकर तन्हा सहरा बन  गया  हूँ 
तेरी बाट जोहती मेरी  आँखों की प्रतीक्षा बन गये  हो 

जिसके प्यार में मैं अब जीना  और मरना  चाहता हूँ 
होम होने के लिए तुम मेरी  वही निष्ठा बन गये हो 

इब्दिता से अंजाम तक तुमसे भेंट होगी नहीं कभी 
मेरी रूह के लिए तुम आदिम मृगतृष्णा  बन गये हो 

दांव पर लगा दिया हूँ अपने वजूद को मैं तेरी खातिर 
अब हारुँ या जीतूं  तुम तो मेरी प्रतिष्ठा बन गये  हो 

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

904-डाल डाल फूल महके

डाल डाल फूल महके
सरसों का पीला रंग देखकर
मन बहके
टेसू के पुष्पों सा

उमंग दहके
फुनगियों पर चिड़िया चहके
बिना बादलों के
नीले आसमान से
कुछ कहना चाहूँ
मौन रहके
मधुप सुनते नहीं
अपनी धुन में ही
बस रहते
सारे रंग झर रहे
उड़ती हुई
तितलियों के पर से
जिसे तुमने
छुवा था वह सागौन का 
भूरा पत्ता आया है
मुझ तक उड़के 
शायद तुमने भेजा हो 
कोई अनलिखा सन्देश 
उसकी नसों में लिख के 
बंद हथेलियों में आओगे तुम 
प्यार के सातों रंग लेके 
मुस्कुराओगे फिर 
अचानक
मेरे गालोँ पर
गुलाल मल के

किशोर कुमार खोरेन्द्र

रविवार, 15 फ़रवरी 2015

903-न जाने कितने जन्मों जन्म से

न जाने कितने जन्मों जन्म से....


न जाने कितने जन्मों जन्म से फुरकत में जी रहा हूँ मैं 
न जाने कबसे तेरी जुदाई के  वुसअत में  जी रहा  हूँ  मैं 


तुम  ही खड़े हुऐ से नजर आते हो हर जगह हर मोड़ पर 
निगाहों में बसी तेरी तस्वीर की सोहबत में जी रहा हूँ मैं 


मरकर  भी  न खत्म होगा अहसास का यह सिलसिला 
तेरे बगैर इबादत ए उल्फ़त के  अजमत में जी रहा हूँ मैं  


मानता था  यह जहां रंगमंच है  और हम सभी किरदार हैं  
लेकिन  अब तो तेरे वजूद की सदाक़त में जी रहा हूँ  मैं 


जान लो मेरी जुबाँ पर तो तेरा नाम आयेगा ही  नहीं कभी 
सिवा तेरे कोई नहीं जानता की तेरी क़ुरबत में जी रहा हूँ मैं 


आजकल लोगों की क्या अपनी नज़रों से  छुपकर रहता हूँ 
वस्ल ए ख्वाबो ख्याल को    ऐसी फितरत में जी रहा हूँ मैं 


किशोर कुमार खोरेन्द्र 

(फ़ुरकत - जुदाई ,वुसअत -विस्तार ,सोहबत -संसर्ग 
इबादत ए उल्फत -प्रेम उपासना ,
अज़मत -ऊंचाई ,प्रतिष्ठा बड़प्पन 
वजूद -अस्तित्व ,सदाक़त -सच्चाई ,क़ुरबत -समीपता 
वस्ल ए ख्वाबो ख्याल -ख्वाब और ख्याल के मिलन 

फितरत -आदत )

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

902-तेरे हुस्न से...

तेरे हुस्न से...
तेरे हुस्न से पिरोया अशआर हूँ मैं
तेरी ही चाहत का हूबहू इजहार हूँ मैं

मुझे यूँ ही भूला देना आसान नहीं हैं
तुझ पर इतना ज्यादा निसार हूँ मैं
दीदह ओ दिल में तुम्ही समाये रहते हो
इश्क़ में जिस्म ओ जाँ से सरशार हूँ मैं
तुम लौट कर ज़रूर आओगे एक दिन
बेकरारॆ हिज्र सा दर ओ दीवार हूँ मैं
जिसे तुम याद करके सिसकते हो
वो गलियाँ वो सड़कें वह दयार हूँ मैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र
(अशआर =छंद ,इजहार =प्रगट होना ,निसार =कुर्बान
दीदह ओ दिल=, आँख और दिल ,सरशार =मस्त
बेकरार हिज्र =वियोग की बेचैनी ,दयार =शहर )

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

901-मैंने किया था ...

मैंने किया था ...
मैंने किया था तुम्हें फोन मगर तुमने सुना नहीं
अपने ख्यालों में मुझे तुमने आज बुना नहीं

तुझे भेजा था जो खत वो उदास हो लौट आया है
मेरे मन की तरह किसी का मन आज सूना नहीं

उल्फ़त में तुमने अजीब सी एक शर्त रखी है
देखना जीभर मगर कहा कभी मुझे छूना नहीं

रोज रोज एक तारे सा टूट्कर मैं गिरता रहा हूँ
तेरे मन के आकाश में मेरे लिए कोई कोना नहीं

न जाने क्यों तुम मुझे देखकर मुस्कुराते रहे हो
मुझे मालूम न था निगाहों में मैं तेरी खिलौना नहीं

मेरी जिंदगी की नदी तेरी ओर ही बहती रहेगी
मैं जानता हूँ तुझसे पर कभी संगम होना नहीं

किशोर कुमार खोरेन्द्र

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

900-तेरे इश्क़ में....

तेरे इश्क़ में....
तेरे इश्क़ में हसरत ए परवाज अभी बाकी है
गमे हिज्र में हूँ ,वस्ल का आगाज़ अभी बाकी है

तेरी ख़ामोशी ने जो कहा उसे मैंने सुन लिया है
मेरे सीने में दफ़न वो एक राज अभी बाकी है
मेरे बिना न तुम रह सकते हो न तेरे बिना मैं
मेरे ख्याल में तेरे जीने का अंदाज़ अभी बाकी है
अभी तक निगाहों से निगाहें ही टकराई हैं बस
दोनों की रूह के निकाह का रिवाज़ अभी बाकी है
तन्हाई में तुझे ही याद करके तो मैं जी रहा हूँ
विसाल का तेरा असहनीय लिहाज़ अभी बाकी है
ख़्वाब में अक्सर यूँ तो हम दोनों रोज मिलते हैं
रूबरू होने पर सिलसिला ए नियाज़ अभी बाकी है
किशोर कुमार खोरेन्द्र
{हसरत ए परवाज़ = उड़ने की अभिलाषा ,आगाज़ =प्रारंभ
अंदाज़ =ढंग ,विसाल =दो प्रेमियों का मिलन
लिहाज -लाज ,संकोच ,नियाज़ =परिचय}

शनिवार, 31 जनवरी 2015

899-तेरे पास तो....

तेरे पास तो....
तेरे पास तो मुहब्बत बेपनाह है मेरे लिए
तेरा सुन्दर चेहरा जैसे माह है मेरे लिए
इश्क़ कुर्बत नहीं है वह एहतिराम इबादत है
फासिले में रहूँ तुझे छूना गुनाह है मेरे लिए
कभी कोहरे सा कभी बादलों सा आ जाते हो
तेरी बेकरार सी परछाई हमराह है मेरे लिए
मुझे भोर तक तारे सा निहारते से लगते हो
मोतबर सी तेरी खूबसूरत निगाह है मेरे लिए
तेरे आते ही हर तरफ नूर सा पसर जाता है
तेरे बिना शबे माह भी सियाह है मेरे लिए
इब्दिता से तुझसे बेखबर नहीं रहा हूँ मैं कभी
जो अंजाम तक ले जाए तू वो प्रवाह है मेरे लिए
किशोर कुमार खोरेन्द्र
{बेपनाह = बेहिसाब ,माह =चाँद ,कुर्बत =निकटता ,
एहतिराम=आदर , इबादत=उपासना ,हमराह =रास्ते का साथी
मोतबर=भरोसेमंद ,सियाह =काली ,इब्दिता=आरंभ
अंजाम =अंत}

898-वृक्षों तले छाँव भी...

वृक्षों तले छाँव भी...
वृक्षों तले छाँव भी रह रहे किराये से, लगने लगे हैं
शहर में लोग कुछ ज्यादा ही पराये से ,लगने लगे है

मनुष्य होने के अलावा लोग न जाने क्या हो गए हैं
आडम्बर वे कुछ ज्यादा ही अपनाये से,लगने लगे हैं
बरसों पुराने मील के पत्थरों से अब कौन मिले
तन्हाई से घिरे रस्ते भी घबराये से ,लगने लगे हैं
जहाँ में सच कहने पर सजा ए मौत मिलती है
आईने के भीतर हम सुरक्षित साये से रहने लगे हैं
ढके चेहरों के भीतर कितना आतंक छुपा है कौन जाने
प्यार की जगह मानव, बम लगाए से ,लगने लगे हैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

897-तुम मुझे विस्मृत........

तुम मुझे विस्मृत........
तुम मुझे विस्मृत करने की कोशिश में हो
सरापा भींगें हुए मेरी यादों की बारिश में हो

छोड़कर इस जहाँ में तन्हा मुझे ,चल दोगे
सितमगर बनने की तुम पूरी साजिस में हो

आखिर क्यों होता है हश्र यही उल्फत का
घिरे जैसे हम दोनों आज आतिश में हो
गुलाब का फूल भेजा था ,कांटें मेरे पास हैं
ऐसा क्यों लगता है पर ,तुम खलिश में हो
रेल की तरह दूर निकल जाओगे तब तुम्हें
अहसास होगा मेरी निगाहों की कशिश में हो
किशोर कुमार खोरेन्द्र
{सरापा =सर से पांव तक ,सितमगर =अत्याचारी
हश्र =परिणाम ,उल्फ़त =प्रेम ,आतिश =अग्नि
खलिश =चुभन ,कशिश =आकर्षण }

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

896-पसंद मुझे तेरी तस्वीर..

पसंद मुझे तेरी तस्वीर..
पसंद मुझे तेरी तस्वीर ,तुझे मेरी तहरीर आ गए
आते आते इतने करीब हमारी रूहों के शरीर आ गए

रस्ता न मंजिल ,साहिल न कारवां ने साथ दिया
हमें मिलाने हमारे सौभाग्य के लकीर आ गए

आकाश और जमीं जहाँ पर मिलते हैं वहाँ से कहने
अपनी दुनियाँ बसा लो क्षितिज से समीर आ गए
झील में चाँद और चांदनी सा हमें इतराते देख कर
हया का चिलमन बनने लुके छुपे तिमिर आ गए
जहाँ की तीखी नज़रों से भला कौन बच पाया है
ख्वाबों ख्याल को जीने के हमें तरकीब आ गए
किशोर कुमार खोरेन्द्र
(तहरीर =लेखन ,साहिल =किनारा ,समीर =पवन , चिलमन=पर्दा
तिमिर =अँधेरा ,तरकीब =तरीका )

रविवार, 25 जनवरी 2015

895-जुनूने इश्क़ में....

जुनूने इश्क़ में....

जुनूने इश्क़ में गुफ्तगू सख्त मना है 
हर्फ़े सुकूत को बस पढ़ना समझना है 

रूपोश हो भी तो हम दोनों कहाँ जाये 
फलक में सितारें दीवारों में आईना है 

अपने साये से भी तुम सहम जाते हो 
कह दूँ निगाहों से ,जो तुमसे कहना है 

आज तक तेरी तस्वीर ही देख पाया हूँ
वस्ले जानां तो केवल एक कल्पना है

खुदा की तरह तुम अप्राप्य अदृश्य हो
तन्हां आये है आफाक में तन्हा रहना है

किशोर कुमार खोरेन्द्र

(जुनूने इश्क =प्रेम उन्माद ,गुफ्तगू =बातचीत
हर्फ़े सुकूत =ख़ामोशी के अक्षर
रूपोश =मुंह छुपाना ,भाग जाना ,फलक =आकाश
वस्ले जानां =प्रिय से मिलन ,तन्हा =अकेले ,
आफाक =संसार ),