शनिवार, 29 नवंबर 2014

863-भटकाव"

भटकाव"

आख़िर मैं 
पहुँच ही गया 
जहाँ पर 
राह ख़त्म हो ज़ाती है 
यहाँ पर 
न शहर है न गाँव है 
आकाश का धरती की ओर 
बस कुछ झुकाव है
यहाँ से 
एक नदी शुरू होती है
उसकी सतह पर एक नाव तैरती है
उस पार घना जंगल है
वहाँ पर
कहीं धूप है
वहाँ पर
कहीं छाँव है
फिर से
नये पथ को खोजूँगा
बिना मंज़िल को
जाने चलूँगा
जीवन बस
एक भटकाव है


किशोर कुमार खोरेंद्र

862-चाँद दिखा नही ...

चाँद दिखा नही ...

चाँद दिखा नही बहुत अंधेरा हैं 
गम के अमावाश ने आ घेरा है

तारों की तरह बिखरा है मेरा दर्द 
याद में चाँदनी सा तेरा चेहरा है

तू बहती नदी मै स्थिर सागर हूँ 
तेरे प्रति प्रेम मेरा अति गहरा हैं

मुँह मोड़ कर क्यों चल देते हो
जीवन मेरा तेरे लिए ही ठहरा है

निगाहें सबकी मुझे देख रही हैं
लगता है हर तरफ जैसे पहरा है

किशोर कुमार खोरेंद्रा

861-"चुभन "

"चुभन "

झरते हैं तो क्या हुआ 
रोज तो खिलते है सुमन 
काँटों को देखकर 
महसूस न करों चुभन 
मन बहता ही रहता है 
गति ही है जीवन 
हालाँ की यह सच नहीं है 
फिर भी मान लो 
क्षितिज पर
ज़मीं से मिल रहा है गगन
आती हुई लहर
जाती हुई लहर के क्र्म सा
है जनम और मरण
सपन सा लगता है जागरण
नींद में वही
जागरण बन जाता है सपन

किशोर कुमार खोरेंद्र

860-यादों में तुम्हारे ....

यादों में तुम्हारे ....

यादों में तुम्हारे हरदम मैं खोया रहता हूँ 
तेरे सपनो के आगोश में मैं सोया रहता हूँ

तुम कोहरे सा आकर रोज ओझल हो जाते हो 
वियोग सूत्र में अश्रु मोतियों सा पिरोया रहता हूँ

शबनम से नम रहती हैं फूलों की आँखों सी पंखुरियाँ 
हृदय सरोवर में कमल बीज सा तुम्हें बोया रहता हूँ

पतझड़ के अमावाश के तम सा एकाकी रहता हूँ
तुम्हारी स्मृति को ज्योत्सना सा संजोया रहता हूँ

मेरे प्रेम का तुम्हें अहसास होगा कभी न कभी
तेरे प्रति निरंतर चराग़ ए इश्क़ जलाया रहता हूँ

किशोर कुमार खोरेंद्र

मंगलवार, 25 नवंबर 2014

859-मकहने लगता हैं...

मकहने लगता हैं...
मकहने लगता हैं मेरा घर तेरे आने के बाद 
महकने लगती हैं मेरी साँसें तेरे जाने के बाद

अब न कोई गम है ना कोई सितमगर हैं 
मेरे इश्क़ को तेरे ज़रिए आज़माने के बाद

चाँद तारों को भी मुझसे रश्क़ होने लगा है 
संग तेरे इस मोहब्बत के अफ़साने के बाद

तुझमें जुनून ए उलफत और बढ़ गया हैं
मिलकर मुझ जैसे इक दीवाने के बाद

बुत परस्त तंग गलियों से मैं लौट आया हूँ
तेरे कदमों में रस्म ए सजदा निभाने के बाद

पहले से तुम और ज़्यादा खूबसूरत लगने लगे हो
अपने अक्स का मेरी निगहों में मुआयने के बाद

किशोर कुमार खोरेंद्र

( ,सितमगर=अत्याचारी ,आजमाना=परीक्षा लेना ,रश्क=ईर्ष्या
अफ़साना =कहानी ,जुनून ए उलफत =प्यार का उन्माद , बुत परस्त=
मूर्ति पूजने वाले ,
रस्म ए सजदा =शीश झुकाने की रस्म ,मुआयना =निरीक्षण )

858-हर घड़ी तेरा...

हर घड़ी तेरा...

हर घड़ी तेरा मैं बेसब्री से इंतजार करता हूँ 
तू आये न आये पर तुझपे ऐतबार करता हूँ

तू कौन हैं तेरा नाम है क्या मुझे मालूम नही 
इब्तिदा से तुझसे मैं बेइंतहा प्यार करता हूँ

साहिले वस्ल इस जहाँ में कहीं पर तो होगा 
सागरे हिज्र को तन्हा कश्ती सा पार करता हूँ

कोहरे के आँचल सा मेरे हाथों से फिसल जाते हो
खत या नज़्म लिखकर प्रेम का इज़हार करता हूँ

उदगम से नदी सी उतरती हुई लगती हो तुम
मैं तेरा पीछा तेरे प्रवाह के अनुसार करता हूँ

मन में ख्ववाहिशों की भीषण लहरे उठती हैं
एहतिजार पर तेरे शालीन व्यवहार करता हूँ

बर्फ से ढकें पर्वत के शिखर पर है एक मंदिर
परचम ,स्वर्ण कलश ,सा तेरा दीदार करता हूँ

अहले जुनूँ की लहर सी तुझे भी मेरी तलाश होगी
ख्वाबो ख्याल में इसलिए तुझे स्वीकार करता हूँ

किशोर कुमार खोरेंद्र

(इब्तिदा=शुरू से ,साहिले वस्ल=मिलन का किनारा ,सागरे हिज्र =विरह का सागर
एहतिजार= सामने आना ,अहले जुनूँ=जुनून रखने वाला )

857-"तेरी जुदाई को......"

"तेरी जुदाई को......"

तेरी जुदाई को सहना अब आसान नहीं है 
मेरी आपबीती का तुझे अनुमान नहीं है

साये की तरह तेरे संग मैं चलता आया हूँ 
मेरे खुलूश का और कोई अरमान नही है

जबसे तुम गये हो मुझे तन्हा छोड़कर 
मेरे लबों पर पहले जैसी मुस्कान नहीं है

जश्ने बहार आया नही ,पतझड़ गया नहीं
इंद्रधनुष से सजा रंगीन आसमान नही है

तेरी याद में मैं चराग़ सा रोज जल रहा हूँ
उसकी लौ में तेरे न होने का गुमान नही है

परिंदा ए सूकूत़ सा झील के किनारे बैठा हूँ
मेरे परों के ख्वाब में पर वो उड़ान नहीं है

लफ़्ज़ों में अपने दर्द को कैसे बयाँ करूँ
ऐसी दास्ताँ हूँ जिसका उनवान नहीं है

तूने भी तो मुझसे बेहद मोहब्बत की है
मेरी हालत से तू भी तो अंजान नहीं है

किशोर कुमार खोरेंद्र

(जुदाई =वियोग ,खुलूश =निष्कपटता, अरमान = इच्‍छा ,तन्हा =अकेला , जश्ने बहार =बसंत उत्सव , गुमान =भर्म
सूकूत़= मौन ,लफ़्ज =शब्द ,बयाँ=इज़हार ,दास्तान=कहानी ,उनवान = शीर्षक )

856-न कभी हाँ कहा....

न कभी हाँ कहा....

न कभी हाँ कहा न कभी ना कहा उसने 
मेरे सवालों के जवाब में कुछ ना कहा उसने

उसकी खामोशी की गहनता भी बोलती है 
मेरे मन के दर्द को ,दर्द अपना कहा उसने

मेरी निगाहों की किताब को पढ़ चुकी है वो 
चीर कर सीना मुझे मत दिखाना कहा उसने

रात भर उसे भी नींद नहीं आती होगी
मुझसे रोज जल्दी सो जाना कहा उसने

मैं उसकी ओर खींचा चला ज़ा रहा हूँ
मुझसे करीब मत आना कहा उसने

किशोर कुमार खोरेंद्र

मंगलवार, 11 नवंबर 2014

855-"वुसअत ए मुहब्बत "

"वुसअत ए मुहब्बत "

चुभते हुऐ इंतज़ार के काँटों में गुलाब सा तुम खिले हो 
छिटकी हुई यादों की चाँदनी में माहताब सा तुम खिले हो

मेरे गम ए हिज्र का तुम्हें ज़रा भी अनुमान नहीं है 
मुझमे ,रेत में जज़्ब लहरों के आब सा तुम मिले हो

हमारी वुसअत ए मुहब्बत तेरी रूह से मेरी रुह तक फैली है 
आसमाँ में सितारों सा मेरे ख्यालों ख्वाब का तुम सिलसिले हो

तेरी आँखों के आईने से मेरे अक्स ने यह मुझे बतलाया है 
इब्तिदा से अंजाम तक मेरे वजूद मे सबब सा तुम घुले हो

नूर सा जगमगाता हैं दूर दूर तलक मेरी निगाहों में तेरा तसव्वूर 
मेरे गमगीन अंधेरों के तप को सुबह के आफताब सा तुम मिले हो

किशोर कुमार खोरेंद्र

(माहताब =चाँद ,गम ए हिज्र=विरह का दुख ,जज़्ब =सोखना ,आब =जल ,वुसअत ए मुहब्बत=प्रेम का विस्तार ,अक्स =परछाई , इब्तिदा=आरंभ ,अंजाम =अंत ,वजूद =अस्तित्व ,सबब = मूल कारण 
तसव्वूर=ध्यान ,विचार , गमगीन =दुखी ,आफताब =सूरज )

854-"फूल"

"फूल"

तुम कहते हो सारे फूल अच्छे लगते हैं
तेरे जुड़े में गुलाब के फूल अच्छे लगते हैं

तुम्हारी नीयत पर मुझे कोई गुमान नही है
तुम्हे मुझसे हुऐ शरारती भूल अच्छे लगते हैं

उस पार कोहरे से घिरे तुम, जब नज़र आते हो
बीच में गहरी नदी और उँचे पुल अच्छे लगते हैं

गमले में रोप कर जिन जिन पौधों को तुम गये हो
उन पौधों की शाखों में खिले गुल अच्छे लगते हैं

जिस राह पर तुम्हारे पैरों के निशान अंकित हैं
उस पगडंडी के मुलायम धूल अच्छे लगते हैं

किशोर कुमार खोरेंद्र

853-"खत "

"खत "

क्या मेरे दिल में ही बस प्यार प्यार भरा है 
लोग कहते है हमारा दिल भी सोने सा खरा है

शब्दों ने मेरी उंगली पकड़ कर मुझसे लिखवाया 
वरना मेरी ज़ुबाँ पर भी तो जड़े ताले का पहरा है

वो भोली है नादां हैं दुनियानदरी से वो दूर है 
मेरे प्रति उसके हृदय का प्रेम पर बहुत गहरा है

रोज लिखने को कहता है मन उसे प्रेम के खत 
साथ मेरे खजाँ का हर कोंपल हो गया हरा है

जिस शै को देखता हूँ उसमे तुम ही नज़र आते हो 
जैसे बहार को ताकता हर तरफ परेशान सहरा है

किशोर कुमार खोरेंद्र

852-"गंगा जल "

"गंगा जल "

मैने कहा तुम ही तो मेरी नयी ग़ज़ल हो 
उसने कहा तुम मेरे प्यार में पागल हो 

मैने कहा मैं ज़मीं हूँ और तुम नीला आसमाँ हो 
उसने कहा तुम मेरे मन की आँखों के काजल हो 

वियोग की लंबी तन्हाई मेरी हमसफ़र है 
जो तुम्हे छूना चाहे तुम वो मेरा आँचल हो 

भटकता फिर रहा हूँ तन्हा इस जहाँ में मैं 
कभी भी आ जाए बरसने तुम ऐसे बादल हो 

अचेतन के पन्नों में अंकित रह गया है कोई 
अंत में जिसे पीना चाहूं तुम वो गंगा जल हो 

किशोर कुमार खोरेंद्र

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

852-चिंगारी"

चिंगारी"

प्यार की राह के अंतिम छोर तक हम आ गये हैं
पर्वत की चोटियों सा आकाश तक हम आ गये हैं

तन से मन ,मन से रूह तक का यह सफ़र अच्छा रहा
हमारे साथ रहने कहीं कोहरा कही शबनम आ गये हैं

राख के ढेर में छुपी रहती है इश्क की जलती चिंगारी
उन्हें फिर से सुलगाने बहारों के कई मौसम आ गये हैं

हर अहसास को मिल ही जाता है उसका आशिक
रूठे प्रेमी को मनाने देखो उनके सनम आ गये हैं

बिना परीक्षा दिए होता नही कुछ भी हासिल
प्रेम पर ज़ुल्म ढाने देखो सितम आ गये हैं

किशोर कुमार खोरेंद्र

851-"उड़ान "

"उड़ान "

अजनबी हो फिर भी मुझसे एक रिश्ता है 
तेरे मेरे बीच अनाम सा एक रिश्ता है

मुहब्बत ,प्यार ,वफ़ा ए इश्क हो यदि 
तो कतरे में सागर भी आ बसता है

इस जहाँ का मकसद मैने जान लिया 
कुर्वत के लिए इर्फान भी तरसता है

वो एक शख़्स क्यों रोज रोज लिखता है
चाहत की झील मे आब ए हर्फ रीसता है

जंगल में खामोशी की चिड़ियाँ चुपचाप बैठी है
उड़ान भी आकाश सी तन्हाई को समझता है

किशोर कुमार खोरेंद्र

(कुर्वत= सामीप्य ,इर्फान=विवेक ,ज्ञान ,मकसद =उद्देश्य ,आब =जल हरफ़ =अक्षर ,कतरा =बूँद
वफ़ा=वफ़ादारी )

850-"मुक़द्दर "

"मुक़द्दर "

मुनासिब नहीं है की पहुँच जाउँ अब तेरे दर पर 
गुलाब की जगह काँटों का पहरा है तेरे दर पर

ख्यालों में ही तुझे बुनता रहा हूँ जीवन भर 
बुलाया नहीं तूने कभी मुझे अपने घर पर

टिमटिमाते तारो और अंधेरों के बीच चाँद सा रहा बेदार 
तेरी यादों के उजलों के सिवा कोई न मिला इस सफ़र पर

रेल सा गुज़रते हुए दूर से देखा तूने मेरा शहर
पल भर को कहाँ ठहरी मुझपे तेरी नज़र पर

कश्ती के दर्द को कौन महसूस कर पाया है
ध्यान रहता है साहिल का आती जाती लहर पर

गंगा के तट के मुकद्दस मंदिर सा मैने माना तुम्हें
मालूम नही मेरी दुआ का तुझपे कितना हुआ असर पर

तूने अपनी पाक रूह को मुझे सौप दिया है
खुशनसीब हूँ मुझे गर्व है अपने मुक़द्दर पर

किशोर कुमार खोरेंद्र

(मुनासिब =संभव ,बेदार =जागृत,साहिल =किनारा ,मुकद्दस =पवित्र ,}

"849-आकाश "

"आकाश "

सीने में दर्द का अहसास होने लगा है 
दिल को इश्क़ का आभास होने लगा है

तेरी प्रत्येक करवट मुझे तलाशने लगी है 
अपने वज़ूद पर मुझे विश्वास होने लगा है

सूरज डूब गया चाँद निकल आया 
इंतज़ार थक कर उदास होने लगा है

तेरी यादों की इक शमा मेरे भीतर जल उठी है
गम का अंधेरा छट गया प्रकाश होने लगा है

मेरी सोच मेरी कल्पना मेरे सपने साकार हो गये
तू इंद्रधनुष है मेरा मन आज आकाश होने लगा है

किशोर कुमार खोरेंद्र