शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

807-"प्रीत की डोरी "

"प्रीत की डोरी "

तुम्हारे और मेरे बीच
उदगम से सागर जितनी
यह कैसी है दूरी

रास्ते कहते है
चलते रहो
नदियाँ कहती है
संग मेरे
बहते रहो
बिना पंख कैसे उडू
तुमसे मिलवाने की
हवा की साध
रह गयी है अधूरी

एक दूसरे के मन में
हम है समाए
दोनों की नज़रों ने
की है
एक दूसरे की छवि
की चोरी

मौन के धागों से
गुँथी हुई है
अद्र्श्य सी
तुम्हारे ह्रदय से
मेरे हृदय तक
प्रीत की डोरी

किशोर कुमार खोरेंद्र

806-"एकाकी "

"एकाकी "

घाटी के
मील के पत्थर पर
बैठा हूँ मैं एकाकी

लौट न आने वाला
सूना पथ
है मेरा साथी

उड़ कर मुझ तक
पहुँच रहे
सतरंगी पत्ते
लगते हैं मुझे
जैसे हो
वे प्रेम के पाती

लगता मानो कोइ
आ रहा है समीप
जब जब
वृक्षों से छनकर
सुनहरी किरणों की बौछारें
मुझ तक हैं आती

आकाश से
हो रही है बूंदा बाँदी
यहाँ कोई नहीं
सिवा खामोशी के
जितना रो लूँ
कौन
देखने वाला है
यहाँ
मेरी आँखो से
बहता पानीी

घाटी के
मील के पत्थर पर
बैठा हूँ मैं एकाकी

किशोर कुमार खोरेंद्र

805-"साँसों की लय पर "

"साँसों की लय पर "

इस पृथ्वी से
इस आकाश से
इस अंतरिक्ष से
बड़ा और व्यापक है
ब्रम्‍हांड का सूनापन

इस सुनेपन से
ज़्यादा विशाल है
मेरी अंतरात्मा
का अकेलापन

जिसकी खामोशी से
घिरा रहता है
मेरा तन्हा मन

ऐकांत के इस महासागर
की लहरों के बीच
बिना पतवार के
शब्दों से बनी नाव में
कर रहा है
मेरा मैं भ्रमण

चाँदनी सा
स्निग्ध है वातावरण

साथ में मेरे
न परछाई है न दर्पण

न गंतव्य का पता है
न कोई
देने वाला है मार्गदर्शन

खुद का करता हूँ
अकेले में अध्यन

मन के कोरे पन्नों में
फिर
करता हूँ उसका लेखन

हिचकोले खाती है नाव
आती जाती
लहरों के कारण

तरंगों के अनुरूप
गूँजती है
मेरे भीतर
मेरे हृदय की धड़कन

मेरा पीठ थपथपाती है
यही स्पंदन
जिसका मै
किया करता हूँ अनुगमन

साँसों की लय पर
आधारित है
मेरा यह जीवन

किशोर कुमार खोरेंद्र

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

804-परख "

परख "

तुम हो सब्जी में डली
तीखी मिरच
मैं हूँ सादे दाल का
फिका नमक

तुममे सुहागन की
रंगीन चूड़ियों सी
हैं खनख
मुझमे है
खाली सुराही
सी ठनक

तुम बहुमूल्य जैसे
हो कनक
मेरे वयक्तित्व में
उतनी नहीं है दमक

तुम्हारे चेहरे पर
है रौनक
मैं हूँ
एक दयनीय सा
आवारा सड़क

तुम्हारे आसपास है
जहाँ की तड़क भड़क
मैं हूँ जंगल के मौन का
एक उपासक

तुम्हारे पायल में
क्यों हैं इतनी झनक
मुझे उसके आशय की
किंचित भी
नहीं है परख

किशोर

803-'आत्मसात'

'आत्मसात'
मेरे अभिमंत्रित अक्षरों को
क्यों नहीं
पाते हो जोड़

मेरे सजीव शब्दों को
लिखते लिखते
आधे में ही
देते हो छोड़

तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम
निश्छल हैं और निर्दोष

तुम्हारे इंतज़ार में
ऊँचें सागौन के
एक वृक्ष सा
खड़ा रहता हैं
मेरे निष्कलंक
जीवन का हर मोड़

कभी कभी
कोरे पन्नों पर
अनलिखे छंदों सा
रह जाती हूँ
हो जाते हो
जब मुझसे विमुख
और कठोर

भूल कर मेरे उदगार
तुक मिलाने के लिए
व्यर्थ ही करते हो जोड़ -तोड़

मुझमे जो करुणा हैं
प्रेम ,स्नेह ,ममता हैं
उन भावो को आत्मसात कर
लिखो काव्य
और सभी के ह्रदय को
करो कवि भाव -विभोर

मेरी गरिमा का
रखना ख्याल
मैं तुम्हारी ही अंतरात्मा
की प्रतिछाया हूँ
नहीं हूँ कोई और

सूरज मेरे माथे पर
बिंदी सा ऊग आता हैं
स्वर्णीम वस्त्र
पहनाता हैं मुझे भोर

देखकर गरीब की कृष काया
लोग कहते हैं
यह है प्रकृति की माया
लेकिन इसका मूल कारण हैं
मनुष्य के मन में निहित लोभ

करो कवि
अपनी लेखनी से तोड़ फोड़
और शब्दों के द्वारा नूतन विस्फोट
और मानव की सुप्त चेतना को
दो तुम झकझोर

किशोर

802-"अकेलापन मेरा मित्र हैं"

"अकेलापन मेरा मित्र हैं"

कुछ किताबें
एक डायरी
एक कलम
एक कंप्यूटर
और मेरे कमरे की खामोशी
जहाँ एक पंखा घूमता रहता हैं
एक घड़ी बिना रुके
चलते रहती हैं
नए पुराने अखबारों के पन्ने
फड़फड़ाते रहते हैं
ये सब मेरे अकेलेपन के मित्र हैं
और अकेलापन मेरा मित्र हैं

कभी कभी हवा के तेज झोंको के साथ
आँगन में उगे हुए आम की
सूखी पत्तिया
रोशन दान से मेरा हालचाल पूछने
मुझ तक आ जाती हैं
कभी कभी
वर्षा की कुछ बूँदें रास्ता भटक कर
मेरी मेहमान नवाजी स्वीकार लेती हैं

खिड़की के उस पार -
जहां तक मेरी दृष्टी जाती हैं
उन दिखायी देने वाले दृश्यों को मैं
अपनी कविताओ में लिखता ही रहता हूँ

मेरे अकेलेपन के घर में
जहाँ मैं मूल रूप से निवास करता हूँ

मेरी साँसे हैं
मेरा मन हैं
मेरी आत्मा हैं
मेरी परछाई हैं
मैं रक्त सा -
अपनी नसों में बहता हुआ
इन सबसे रूबरू
मिलता ही रहता हूँ

मेरे अकेलेपन के घर में
यादो का एक गुप्त कोना भी हैं
जहां बैठ कर मैं तुम्हे
याद कर लिया करता हूँ
कभी कभी रो भी लिया करता हूँ

तुम्हारे पास वक्त नहीं था
इसलिए मैं पीछे छूटता गया
और तुम बहुत आगे निकल गयी
मेरी पहुँच से बाहर

मैं अपने अकेलेपन के साथ
खुश हूँ ,संतुष्ट हूँ
क्योंकि वह मेरी बातों को
ध्यान से सुनता हैं
मेरे दर्द को महसूस करता हैं
कम से कम मैं
इतना तो जानता हूँ की
मेरी तन्हाई मुझे तन्हा छोड़कर
कभी नहीं जायेगी
किशोर

801-फ़ासिला

फ़ासिला

मन के तार
झंकृत होते है
तो वे
पुकारते हैं
तुम्हारा ही नाम सदा
तुम्हारे और मेरे बीच हैं
फ़ासिला और
छाया हैं कोहरा घना
तुम्हारी धूमिल सी
परछाई को
अपने सीने से लगा रखा है
मेरी निगाहों का आईना
प्यार में सिर्फ जुदाई हैं
और है
बेकरारी की यंत्रणा
वफाए इश्क़ मे
मोम की तरह
धीरे धीरे गलकर
होना पड़ता है फ़ना
तुम्हारे बगैर बहार भी
लगती है ख़ज़ाँ
खतागार नहीं हूँ
मिल रही है मुझे
पर खुशनुमा सजा
तुम्हारे दर तक
कभी पहुँच न सका
छोड़ चुका हूँ पर
तुमसे मिलने की आश में
मै कबसे अपना कदा
तुमसे मोहब्बत करता हूँ
इसलिए
हो गया हूँ गर्दिश जदा
जानता हूँ
एक दिन वह भी आयेगा
जब मान मर्यादा के
नाम पर
मुझे तुम
अपने शहर तक से
रेल की तरह
गुजरने से भी कर दोगी मना



kishor 

800-दोस्ती

दोस्ती
मेरे मन के
कोरे कागज़ पर
उभर आया हैं
तुम्हारा अक्स

ह्रदय में जाग उठे
सुकुमार भाव को व्यक्त
करने के लिए नहीं
मिल रहे हैं शब्द

इस जहां के महासागर में
तिनके की तरह
बहते बहते
मिल गयी हैं
तुमसे मेरी किस्मत

एक दूजे से
हम दोनों है अनुरक्त
बन गए है
आपस में सच्चे दोस्त

अजनबी और अनाम से
इस रिश्ते को
परिभाषित नहीं
कर पा
रहा है रक्त

इस जग में
दो अपरिचित व्यक्ति
इस तरह से
एक हो सकते हैं
अपने इस अडिग फैसले पर
खुद वक्त है स्तब्ध

उसकी अंतरात्मा मेरे लिए
मेरी अंतरात्मा उसके लिए
असीम स्नेह से
आखिर क्यों है युक्त

शब्दों के बिना भी
हमारी खामोशियाँ
कर लेते हैं
आपस में बातचीत समस्त

लगाव के इस अनुपम ,सरस
और अद्भुत
स्वरूप का
मनुष्य ही
हो सकता हैं अभ्यस्त

मेरी साँस पर
तुम्हारा अधिकार है
तुम्हारे हर धड़कन के जरिये
मैं ही
होता हूँ अभिव्यक्त

किशोर

799-अपहरण

अपहरण

वही आनन
वही नयन
सुराहीदार गर्दन
अधरों पर
वही मनमोहक
मुस्कान का आकर्षण

जिसका मेरे सपनो में
अक्सर किया करता हैं
मेरा अचेतन प्रदर्शन

बांहों में भरकर
वही गर्मजोशी से भरा आलिंगन
गालों पर
वही मधुर मृदु चुम्बन
ख्यालों ने
जिसका किया है
प्राय; मुझसे वर्णन

तुम मेरे सपनो में हो
तुम मेरे ख्यालों में हो
जब से तुमने
मेरी नज़रों के द्वार से
मेरे जीवन के चौखट पर
किया हैं
अपना आत्मीय समर्पण

बिना सपनो के
बिना खयालों के भी
मुझे होने लगा हैं
तुम्हारे सुन्दर रुप का दर्शन

मेरे वजूद का
तुम्हारे अंत:करण ने
कर लिया हैअपहरण

किशोर कुमार खोरेन्द्र

798-प्रतीक्षा



प्रतीक्षा



मेरे मन के मृदु शब्द
जो
टूट कर बिखर गय
जैसे
गर्दिश के आकाश के
लुप्त हुए
तारे हो असंख्य

वे तुमसे कुछ
कहना चाहते थे
उनके एकजुट होने का
यही था मंतव्य
उन अनलिखे ,अनपढ़े ,अनसुने
शब्दों ने किया था
अपने अक्षरों में
तुम्हारे लिए
इंद्रधनुषी कामनाओं के
रंगों का संचय

तुम्हारे मन के
प्यार के सागर में
होना था उन
शब्दों का विलय

अब उन
समाधिस्थ शब्दों को
पुनर्जीवित करने के लिए
मेरी उम्र के पास
नहीं हैं समुचित समय

पर जिस मनन में
इन शब्दों का जन्म हुआ था
वह खूबसूरत चिंतन
रहेगा सदा अक्षय

उन शब्दों को खोकर
मेरे अनुभव ने
कुछ पाया ही है
नहीं हुआ हैं
सारगर्भित
भावों का अपव्यय
कुछ शब्दों में
मेरे ह्रदय की
अतल गहराई से
अभिव्यक्त हुए थे
तुम्हारे प्रति
प्रिय सम्बोधन मधुमय
कुछ शब्दों ने जुड़कर
सृजित किया था
ऐसा वाक्य
जिसमे था तुमसे
भेंट करने हेतु अनुनय

कुछ शब्दों का था
यही अभिप्राय
तुम्हारे आगोश में
मनुहार युक्त आश्रय

कुछ शब्दों कथन का
सीधे सीधे था
यही आशय
नैसर्गिक प्रांगण में
भ्रमर और कली सा
आओ करे
उन्मुक्त प्रणय

मेरे अचेतन के क्षितिज को
लांघकर
जो मेरी चेतना के
बने थे अवयय
वे कुछ शब्द थे
प्रकृति और पुरुष के
शाशवत सम्बंधों सा
गूढ़ और रहस्यमय

कुछ शब्द
इसलिए प्रयासरत थे
ताकि
तुम्हारे सुकुमार ह्रदय से
मेरे ह्रदय का
हो जाय
गहन परिचय
विरह काल के ये
सारे शब्द तुम तक
सम्प्रेषित नहीं हो पाय
उन चूर चूर हो चुके
शब्दों की आशा को
एकत्रित कर
पुन: तुम्हारे
सम्मुख ला पाने का
मेरे पास अब
नहीं हैं कोई उपाय
शायद किसी कारणवश
तुम्हें मुझ तक
पहुँचने में विलम्ब हो रहा हो
इसलिए वे सारे शब्द
मेरी अंतरात्मा के अंतरिक्ष के
शून्य में अंतर्ध्यान हो गय

खाली खाली सा मन लिए
वियोग के
अंतहीन पुल पर बैठा हूँ
इंतज़ार की घड़ियों सा
हो कर तन्मय

अब यदि तुम कभी आई
तो
मेरी ख़ामोशी के
मौन पर होगा
तुम्हे विस्मय
प्रतीक्षारत हूँ
मेरी चेतना में
आदि से अंत तक
तुम्हारा ही वर्चस्व हैं
कभी तुम
मेरी विराट कल्पना
बन जाती हो
कभी मेरे काव्य का
मुक्त
छंद या लय

जहाँ कही भी हो आओ
मैं ही हूँ
तुम्हारा गंतव्य
मेरी आत्मा ही है
तुम्हारा निवास आलय

किशोर कुमार खोरेन्द्र

797-"विचार"

"विचार"

सपनों में जागकर
तुम्हारे आगमन का
करता हूँ इंतज़ार

मेरे एकाकीपन के
रेगिस्तान में अंकित
तुम्हारे जाते हुए पदचिन्हों का
अमिट रहे आकार

तुम्हारी छवि का
पीछा करती है
मेरी दूर दृष्टि
महासागर की प्रचंड लहरों और
मेरी निगाहों के बीच
इसी बात पर
हो गयी है तकरार

मेरे मन के वन में
नीरवता की घनी डालियों सी
तुम छायी हो
मुझे तुमसे मिलने के
नज़र आ रहे है आसार

मैं हूँ तो तुम हो ही
तुम हो तो मैं हूँ ही
हम दोनों की
मिलनस्थली है
यह सँसार

तुम्हारे सौंदर्य को निहार कर
यह प्रकृति
करती आई हैं
अपना श्रृंगार

पूछता हूँ चांदनी से
क्या तुमने अपनी सखी को
आते हुए देखा है
क्षितिज के उस पार

निस्तब्ध है भोर का
सिंदूरी वातावरण
भ्रमवश
तुम्हारे कदमो की
सुनकर आहट
थम जाती है
मेरी धड़कनो की साँस
तुम बिन लगता है
यह जग
मुझे अब निस्सार

मैं यदि आत्मा हूँ
तो तुम हो परम आत्मा
आजकल
न जाने क्यूँ
मेरे मन मै आता है
यह विचार

किशोर

796-"बांसूरी"

"बांसूरी"

तुम्हें मुझमें है
मुझे तुममे है
गहरी रूचि

इसलिए हम दोनों को
एक दूसरे से
प्यार करने की
है सूझी

तुम्हारे बिना
मैं रह नहीं सकता
मेरे बिना अब
तुम्हें भी लगती है
अपनी जिंदगी अधूरी

हम दोनों के ह्रदय की
सुकुमार भावनाएं
करना चाहती हैं
आपस में
दिल्लगी और ठिठोली
प्रेम जाल से घिर कर
जब से हम
आनंद से विभोर हुए हैं
अधरों पर देखो
कैसी सुहानी हँसी है छूटी

हमदोनो इस बात से
भिज्ञ है
की यह
न खेल है न अभिनय
एक दूजे को देखे बिना
हम दोनों हो जाते है दुःखी
मैं वृत्त हूँ तुम हो मेरी धूरी

सलामत रहे यह
अनुराग हममे सदा
मृत्यु भी न कर पाये
प्रेम पथ से हमें जुदा
तुम्हारे मन के वृन्दावन की
गलियों में
गूंज उठी है मेरी बांसूरी

किशोर

795-"हमदम"

"हमदम"

एक दूसरे को
दोनों ने चुन लिया है
एक दूसरे विषय में
उन्हें नहीं है वहम

इश्क़ की राह में
बड़ चले है
दोनों के कदम
रोज एक कदम
रोज एक कदम

फासला है बे हद
वह हो रहा है
धीरे धीरे कम

अब दूर नहीं है मंजिल
दोनों सातो जनम
के लिए
बन जाएंगे हमदम

अभी तो मिली है
निगाहों से निगाहें
पर जख्मी दिलों का
यह है आलम
खतो के सिलसिले
लगाते है
उन पर मरहम

न जी पाते है न मर पाते है
जिस्म के सायों की दूरियाँ
ढा रही है
उन पर सितम

यह दुनियाँ भी है बेरहम
ये कैसा जुनून है
जो तोड़ देना चाहता है
बरसों का आत्म संयम

लेकिन दोनों के रूहों का
पहली नज़र में ही
हो चुका है पाक संगम

मन की उन्मत्त लहरों को
रोक न पायेगा
सुदृढ़ बांध से लगते
ये रिती रिवाज़ों के
सख्त नियम

आएगी पुरनूर पूनम की रात
छट जाएगा तब
उस मधुयामिनी में
अतीत के घनघोर तम

उनकी चाहत में हरदम
इतना रहेगा दमखम
उनका यह रूहानी प्रेम
हो न पायेगा कभी ख़तम

किशोर

794-"विशाल हृदय"

"विशाल हृदय"

मैं
तुम्हारें मन का
एक खूबसूरत सा ख्याल हूँ
या
बंद या खुली हुई
आँखों का हूँ
मुलायम सा एक सपना

जिसे तुम
मानती हो सिर्फ़ सिर्फ़ अपना

आचार से भरी हुई शीशी की तरह
जिसे संभाल कर रखती हो
असहनीय है जिसका
तुम्हारे लिए दरकना

अपने आँगन के
एक गमले सा
रोज सिंचती हो तुम
मुझ पर
अपने स्नेह का जल
उठा कर रख देती हो
वहाँ पर जहाँ
मुझे अधिक धूप से न पड़े तपना

मेरे शीर्ष पर खिले फूलों से
करती हो पूजा अर्चना

समझ कर मेरी छवि को आईना
हर पल करना चाहती हो
उसकी निगाहों मे
अपने चेहरे और
अपने सौन्द्र्य का मुआयना

मेरे अक्स को खरगोश की तरह
चाहती हो पुचकारना
यूँ भी
अब मैं वह पंछी हूँ
जो तुम्हारे विशाल हृदय के जहाज़ में
सीख गया हैं
उड़ना
ठहरना और कैद रहना

सच सी लगने लगी हैं तुम्हें
मुझसे संबंधित
सारी की सारी कल्पना

किशोर कुमार खोरेंद्र

793-तन्हा और उदास

तन्हा और उदास
सिवा इंतज़ार के
क्या है मेरे पास
घड़ी घुूरती है मुझे
दोनो काँटे मेरी खातिर
चलते ही रहते है
करते नही है विश्राम
वृक्ष ,मुझे सांत्वना देने के लिए
अपनी डालियों को झुका कर
अपनी नरम पत्तियों से मेरा सिर सहलाते है
बादल भी मेरे करीब आकर
मुझसे कुछ कहने का करते है प्रयास
लंबी सुनसान सड़क भी
मेरी तरह लगती है
तन्हा और उदास
फुदकतीी ही रहती है एक नन्ही गौरया
मेरे आसपास
कई दफे मेरा मन कहता है
छोडो यह प्यार व्यार
जिसमे मिलन का अभी तक
नही हुआ है अहसास
पर धड़कने कहती है ..
अरे तुम ही इस दुनियाँ मे अकेले नही हो
यहाँ तो प्रत्‍येक मनुष्य को
है किसी न किसी प्रिय व्यक्ति से
मिलने की आश
और तुम करो न करो
मृत्यु को तुम्हारे लौटने का
पूरा है विश्वास

किशोर कुमार खोरेंद्र

792-"वजूद "

"वजूद "

तुम हो महरुख
जबसे निहारा हूँ एक बार
तुम्हारा अनुपम रूप

मन की आँखों से
तुम्हे देखने में
रहता हूँ मस्रुफ

तुम कभी शीतल छाव हो
कभी हो गुनगुनीी धूप

मेरे हर सवाल का
तुम्हारे पास जवाब है
पर तुम अपनी खामोशी के
दायरे में रहती हो मशगूल

तुम्हारी याद आती है
तब लगता है
जैसे बज रहा हो
दूर कहीं मधुर नुपूर

एक जगमगाते तारे सा है
तुम्हारे चेहरे का नूर
मेरे हृदय में
आ बसी है तुम्हारी रूह

लेकिन
तुम रहती हो तन से
ज़मीं से आकाश जितनी दूर
किस्मत मुझसे क्यों गयी है रूठ

तुमसे न मिल पाने के कारण
मेरा जीवन रह गया है
पीकर
अफ़सोस का अम्लीय घूंठ

मेरे प्राण जाने से पहले
अच्च्छा है
यदि तुम्हे आ जाए मेरी सुध

मेरी स्मृति में
तुम्हारी मीठी आवाज़
गूँजती रहती है
फिर भी लोग
कहते है यह स्वप्न है
तुम्हारा नही है कोई वजूद

किशोर कुमार खोरेंद्र

791-दफ़न "

दफ़न "

काँच से बना टी टेबल
या हो दर्पण

चीनी का हो कप
या कोमल पंखुरिया से
घिरा सुमन

प्यार की तरह
कितना भी संभालो
कभी न कभी
टूट कर बिखर ही जाते है
तब कितना
एकाकी हो ज़ाता है
न मन और जीवन

घिर आता है तब
अचानक घुप अंधेरा
रास्ते भूल जाते है
करना मार्गद्रशन
जग लगने लगता है
मानो हो वह
बबूल का कानन

क्योंकि
फिर से नही खिलता वही पुष्प
वही पंखुरियों का दल
क्योंकि
फिर से लौट कर नही आता
न वह पल
न वही सुरभित पवन

काँच के टुकड़ों मे
समा जाता है सुंदर अतीत
एक क्षण में ही
मेरे हज़ारो घायल चेहरे
हो जाते है
पीड़ा से कराहते हुऐ
एक साथ
समय की गहरी खाई में दफ़न

किशोर कुमार खोरेंद्र

790-"मौन"

"मौन"

वो अक्षर जो जुड़ नही पाए
वो शब्द जो बोले नही गये
मन की गहराई मे दबे रह गये
अनपढ़े रह गये
उनसे भी होगी
कभी न कभी मुलाकात

जब सारी कहानियाँ ,कविताए
मुझे दे न पाएँगे
सच का सच की तरह जवाब
खामोशी लेगी
तब मेरा इम्तहान
कहेगी करो
अब मुझे बेनकाब

अक्षरो से पहले भी हूँ मैं
बन कर भावों का सैलाब
वो भाव जो उमड़ ही नही पाए
कोहरे सा छा कर छट गये
ओस की बूँदो सा लुप्त हो गये
जल में बनी परछाई सा
लहरो के हाथो मिट गये
कहाँ से लौटाकर लाओगे
वे ज़ज्बात

बूँद हो या सागर
बिंब हो या प्रतिबिंब
सबके होते होंगे
अपने अपने अलग से ख्वाब
कोलाहल से घिरकर भी
जैसे
मौन रहता है

 निश्चिंत हो
कण कण मे व्‍याप्त

किशोर कुमार खोरेंद्र

बुधवार, 3 सितंबर 2014

789-"तुम्हारे न आने से "

तुम्हारे न आने से

एक पत्ता अपनी डाल पर

नहीं फूट पाया

एक कली खिल नहीं पाई

एक बीज अंकुरित नहीं हो पाया

एक बादल आकर लौट गया

बरस नहीं पाया

एक छाव धूप में बदल गयी

कोहरे की डबडबाई आँखों से

अश्रु की तरह शबनम चू पड़े

तुम्हारे न आने से

खुशी से उच्छलती हुई आई लहरें

उदास होकर लौट गयी

मेरी नसों में बहते हुऐ रक्‍त का

रंग कुछ फीका हो गया

पाषाण की मूरत में

जान आते आते रह गयी

किशोर कुमार खोरेंद्र