मंगलवार, 15 जुलाई 2014

787--"ज़मीर "

-"ज़मीर "
पानी पर खिंच रहा हूँ लकीर 
मन मेरा न जाने क्यों है अधीर 


रेत  पर लिखा हुआ तुम्हारा नाम 
मिटा गया हैं 
अपनी उँगलियों से समीर 


मुझ लहर को
मिल  गया था किनारा 
ख़्वाब देखने लगा था हसीन 

एक अकेले सफ़ीना  सा 
फिर मँझधार  में पहुँच गया हूँ 
तन्हाई का महासागर हैं असीम 
फिर से सफर 
हो गया है कठिन 

कोई पत्थर के एक टुकड़े  की तरह
उठाकर 
मुझे भी उछाल दे 
जल की सतह पर फिसलते फिसलते 
मैं भी पहुँच जाऊंगा तुम्हारे करीब 
तुम्हारी तरह 
तुम्हारे शहर में भी है कशिश 

बिना तुम्हारे
मेरे पैरों तले 
खिसक गयी है जमीन 
मैं शरीर हूँ 
तुम  हो मेरा जमीर 

किशोर कुमार "खोरेन्द्र "

सोमवार, 14 जुलाई 2014

786-do tuuk

do tuuk 




"प्रथम "

दूर रह कर भी 

जब 

लगे कोई पास

यही तो हैं

इश्क़ का

प्रथम अहसास

२-

"फ़िदा "

बनाये बिना

कोई भूमिका

मैं कह

रहा हूँ सीधा

तुम पर

हूँ फ़िदा

३-

"फ़ना "

कुछ कहना हैं

यहाँ मना

चुप रह कर भी

आजीवन

इश्क़ में

कुछ लोग हो

जाते हैं फ़ना

४-

"बातें "

न जाने कितनी सारी

बातें हैं जिसे

मैं चाहता हूँ

उसे बताना

पर चली जाती हैं

मानती कहाँ हैं

वह मेरा कहना

५-

"प्रतिउत्तर "

न जाने

कितनी बार हूँ

तुम्हें पुकारा

पर प्रतिउत्तर में

न तुमने हां कहा

न नकारा

६-

"आषाढ़ "

आया आषाढ़

मन की नदी में

लेकर

तुम्हारी यादो

की बाढ़



"चाह "

मैं तुम्हें

चाहूँ कितना

सागर में भरा हो

पानी जितना

८-

"समंदर "

प्यार में डूबने के लिए

चाहिए मुझे

जो समंदर

वह हैं

तुम्हारी निगाहों

के अंदर

९-

"भला "

मैं जो भी हूँ

बुरा या भला

अब तो

तेरा हो चला

१०

"मंजिल "

तुमसे मिलने के लिए

मैं रहता हूँ तरसता

अब तो

तुम्ही हो

मेरी मंज़िल और

मेरा रस्ता

किशोर कुमार खोरेन्द्र

785-"सृजन"

"सृजन"

तुम पूछती हो मुझसे 

इतना किस तरह से 

कर लेते हो 

काव्य का लेखन 

जैसे किसी वन के

वृक्षों की टहनियों पर

खिलते है प्रतिक्षण

अनगिनत सुमन

वैसा ही है मेरा मन

भी एक कानन

ग़रज़ ग़रज़ कर

जब

बरसता है सावन

होता हैं

तब

ह्रदय में

सरस भावों का प्रस्फुटन

जब देखता हूँ

झील के दर्पण में

चाँद का खूबसूरत आनन

जब

सुनाई देता हैं

अमराई से

कोयल का मधुर गायन

जब तितलियों की तरह

मेरे नयन

कर लिया करते हैं

रंगों का संचयन

ध्यान से सुना करता हूँ

भ्रमों का गुंजन

जब जब होता है

बसंत का आगमन

जब मकड़ी अपने ही

बने जाल में फंसकर

त्याग देती है

अपना जीवन

जब जल के आभाव में

मछली को

प्राप्त होता हैं मरण

भूख से तडफता व्यक्ति

कैसे करे ज्ञान का अर्जन

जब जगमगाते अनंत सितारों के

कोलाहल के बीच

अंतरिक्ष को

महसूस होता है

नितांत एकाकीपन

जब पतझड़ लिख जाता है

शुष्क पत्तों की

लकीरो पर दर्द भरा

असहनीय सूनापन

तब मेरे मन में

अपने आप होने लगता है

काव्य का सृजन

किशोर कुमार खोरेन्द्र

784-"खूबसूरत "

"खूबसूरत "
मेरी नज़र में 
तुम हो 
बला की खूबसूरत 
मेरी आँखों में 
बसी है 
इसीलिए तो 
तुम्हारी सुन्दर मूरत 

सुन लिया करो
मेरे चिर मौन का
मधुर प्रणय निवेदन
मैं सिर्फ नहीं हूँ
तुम्हारे सौंदर्य का उपासक
मेरी कविताएं
मेरे ह्रदय के उदगारों के
होते है हूबहू उदबोधन

मेरे मन के सागर की तरह
तुम्हारे मन के सागर में भी
चलता रहता है सतत
प्रेम अभिव्यक्ति हेतु
ऊहापोह की रस्सियों से
घिरा हुआ एक अमृत मंथन

मेरे भीतर जो कर गयी हो
अनुराग के बीज का रोपण
उसका हो चुका है
अब मेरे ह्रदय में
सघन अंकुरण

इसी तरह से
तुम्हारी चेतना में
वटवृक्ष की तरह
फैला हुआ हूँ
तुम्हारी नींद हो
या तुम्हारे सपन
या हो तुम्हारा जागरण
उभर आयो
असंख्य जड़ो का है
वहां पर सुदृढ़ बंधन

ठीक वैसे ही मुझे
घेरे रहती है
तुम्हारी रूह की महक
तुम्हारी परछाई मेरा
पीछा करती सी लगती है
बदलो सा आकृति
धर लेती है वह व्यापक

तुम्हारी आँखों की ज्योति
सुबह की किरणों की तरह
मुझ पर
बरस पड़ती है अचानक

तुम्हारी यादो की बौछार से
भींगा भींगा
लगता है सावन
तुम्हारे गेसूओं की तरह
पसर आयी संध्या
के आगोश में
फिर
मुझे तनहा छोड़ जाता हैं
अस्ताचल का
डूबता हुआ सूरज
मेरी नज़र में
तुम हो
बला की खूबसूरत

kishor kumar khorendra 

783-कोरा दर्पण"

कोरा दर्पण"

मैं कोरा दर्पण हूँ 
मेरे वक्षस्थल में 
समायी हुई 
तुम हो एक 
सुन्दर सी परछाई 

मैं स्वच्छ होकर 
और चमक ऊठा हूँ 
जब भी तुम हो मुस्कुराई

मेरा संयमित मन
दरक गया हैं
जब भी तुमने
मेरे सम्मुख ली है अंगड़ाई

कांच के भीतर
मेरी अपनी एक
पारदर्शी दुनियाँ हैं
जिसमे रंग भर जाती है
तुम्हारी कमल सी
खिलती हुई तरुणाई

यह जानकार की
मैं बेजान सा हूँ
मैं तुम्हे छू नहीं सकता हूँ
मैं तुमसे कुछ बोल नहीं सकता हूँ
न अभिव्यक्त होने वाला मेरा यह प्रेम
पत्थर की तरह ठोस होते हुए भी
इकतरफा और एकाकी है

यह सोचकर
रो पड़ती है कभी कभी
मेरी चिर परिचित तन्हाई

kishor  kumar khorendra 

782-" ibadat "

" ibadat "

apne karib aane ki 
mujhe do tum izazat 
naye sire se taki 
kar saku main 
tumase shalin shararat 

tumhari anupasthiti me bhi 
sun rahaa hun 
tumhare aate huae
kadmo kii aahat

tum apni kaamnaao ki
mahanadi ki
laharo ki rassiyo se
mujhe bandh lo
tumhare bahupash se
mukt ho paane ka
ab mujhame
nahi rahaa hain sahas

tumhari prti chhaaya
mere hriday me basi huii hai
tumase nirantar mohabbat
karte rahane ki mujhe
ho chuki hai aadat

tumhari nigaaho ko
mujhe
apalak niharne do
mujhe karne do
tumhari ibadat

mujhe tumase
kuchh nahi chaahiye
mai to prem path ka
hun sirf ek sadhak

kishor  kumar khorendra 

781-अभिव्यक्तियाँ "

अभिव्यक्तियाँ "

मेरे संभावित उपन्यास की 
तुम हो नायिका 
महाकाव्य हो मेरा 
तुम अनलिखा 

मन ही मन तुम्हें 
पढता रहता हूँ 
ख्यालों में तुम्हे 
बुनता रहता हूँ
मेरे सपनो की
तुम ही हो मलिका

तुम न
अपने जीवन की
कहानी सुनाती हो
न रहस्यमयी
अपनी कविता

मौन ही रहती हो
जैसे जलती है
विरह की अग्नि से
प्रज्वलित होकर
अविरल
एक दीपशिखा

मैंने तुम्हे अपने
ह्रदय की वादियों में
चन्दन वन सा
बसा लिया हैं
जैसे झील ने चाँद की
सुन्दर छवि को हो
अपना लिया

प्रेम के बदले प्रेम मिले
यह जरूरी नहीं हैं
मैं तो सिर्फ पुजारी हूँ
और तुम हो देवी सी
एक सजीव प्रतिमा

न शब्द मिलते हैं
न आबद्ध हो पाते हैं छंद
न तुम्हारी
तस्वीर बना पाता हूँ
न गढ़ पाता हूँ
तुम्हारी मूर्तियाँ

तुम्हारे दिव्य रूप के समक्ष
बेबस सी है
मेरी सारी अभिव्यक्तियाँ

किशोर कुमार खोरेन्द्र

780-मधु यामिनी "

मधु यामिनी "

छिटकी हैं चांदनी 
अम्बर में 
सितारों के नूर से भरी 
बह रही हैं 
एक और मंदाकनी 

बादलों की ओट से 
पूनम का चाँद भी 
हमें झाँक रहा हैं
तुम्हारे और मेरे
मिलन की है
यह मधु यामिनी

शरमा कर तुम्हारे रुखसार
हो गए हैं शर्बती
नजदीक आने से डर रही हो
तृषित अधरों पर हैं कपकपी
छेड़ रही हैं दूर कहीं
सागर की लहरे मधुर रागिनी

आओ बंधन सारे खोल दूँ
सुर्ख परहन तुम्हारे हैं रेशमी
तुम्हारी काया खुद कंचन हैं
मुझे पसंद हैं yah सादगी

छिटकी हैं चांदनी
अम्बर में
सितारों के नूर से भरी
बह रही हैं
एक और मंदाकनी

किशोर कुमार खोरेन्द्र

779-"दो टूक "

"दो टूक "

1-
न अक्षर न शब्द न आवाज़ 
कैसे लगाऊं 
गहन प्रेम का मैं अंदाज़ 

2-
सुन रहा हूँ 
तुम्हारे मन का संगीत 
इसीलिए लिख रहा हूँ गीत

३-
कहो तो कर दूँ
तुम पर जान कुर्बान
मत लेना मेरे प्रेम का
तुम इम्तहान

4-मालूम नहीं
उनका पता न ठिकाना
फिर भी लोग कहते है
मैं हूँ उनका दिवाना

5 -
तुममे हैं कस्तूरी सी गंध
इसीलिए तो नहीं हो रहा हैं
तुम्हारे प्रति मोहभंग

6-
बिना अनुबंध के भी
होता है सम्बन्ध
जीते है सिर्फ
तुम्हारी यादो के संग

7-
उसके ख्यालों में
मैं रहता हूँ
खुशनसीब खुद को
मैं कहता हूँ

8-
वो मुझे
करदेते है नज़र अंदाज़
अपनापन जताने का
यह भी है
उनका एक अँदाज़

9-
कब और कहाँ
होगी उनसे मुलाक़ात
यह नहीं हैं तय
मैं उनका इंतज़ार
करता रहता हूँ
हर समय

10-
बिना बोले
रोज हो जाती है उनसे बात
प्यार में अक्सर
ऐसे ही
कटती है हर रात

11-
किसी ने आज तक नहीं पूछा
न किया कोई सवाल
फिर भी न जाने क्यों
मैं लिखता रहता हूँ
कोरे पन्नों पर जवाब

किशोर कुमार खोरेन्द्र