गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

880-उन्हें जितना......

उन्हें जितना......

उन्हें जितना याद रखने की कोशिश करने लगे हैं 
वो हमें उतना ही भूलाने की साजिश करने लगे हैं

वो जबसे परदे की ओट में छुप छुपकर रहने लगे हैं 
हम तबसे उन्हें रूबरू देखने की ख्वाहिश करने लगे हैं

उनकी निगाहे रहम में आश्नाई की एक चिंगारी दिखी हैं 
हम उनके सामने अपने इश्क़ की नुमाईश करने लगे हैं

कैसे बताए किसी को की हमने कभी उन्हें देखा ही नही हैं
रस्ते मुझसे नग्मा ए विसाल की फरमाईश करने लगे हैं

मेरा यह इश्क़ ,इश्के मजाजी हैं या इश्के हक़ीक़ी हैं
अपनी ही मोहब्बत की हम आज्माइश करने लगे हैं

किशोर कुमार खोरेंद्र

( नग्मा ए विसाल= मिलन का गीत .,निगाहे रहम = करूणा की दृष्टि , आश्नाई= मित्रता ,इश्के मजाजी =मानवीय प्रेम इश्के हक़ीक़ी =आध्यात्मिक प्रेम ,आज्माइश = परीक्षा

879--सपनों में.....

सपनों में.....

सपनों में अख़बार के गमगीन पन्ने फड़फड़ाते रहे 
ख्वाब में रक्त से सने वो मरहूम बच्चे आते रहे

सज़ा ए मौत भी कम है उन सभी दरिंदों के लिए 
सख़्त दीवारों में एक एक कर हम उन्हें चुनवाते रहे

अंधेरे में चिता की उँची उँची लपटें दिखाई देती रहीं 
बदला ले के रहेंगे उनसे बस हम यही कस्में खाते रहे

पृथ्वी से चाँद और मंगल तक पहुँच गये हम सभी
फसिला अपनों के बीच बढ़ाने की रस्मे निभाते रहे

कब तक भागते रहेंगे नापाक परछाईयों से हम
आईनों के कटघरों में खड़े धर्म के बन्दे पाते रहे

किशोर कुमार खोरेंद्र

(गमगीन = दुखी ,मरहूम -दिवगंत ,)

878-अब तुमसे मुलाकात....

अब तुमसे मुलाकात....

अब तुमसे मुलाकात होगी नही कभी 
अब तुमसे मेरी बात होगी नही कभी

आबे रवाँ सा गुजर जाउँगा मैं चुपचाप 
पहले सी दावते जज़्बात होगी नहीं कभी

मेरे अक्स को ख्वाब मे रखना संभाल के 
तेरे ख्यालों से मेरी निजात होगी नहीं कभी

तेरा नूर ए रुख़ माहे ताबाँ सा लगता रहा मुझे
रूबरू फिर वो रौनके हयात होगी नहीं कभी

दिली ख्वाहिश हैं की तुझे जाने से रोक लूँ मैं
साथ रहेंगे ख़त्म यह काएनात होगी नही कभी

किशोर कुमार खोरेंद्र

{आबे रवाँ = बहता हुआ पानी ,आबोताब=चमक दमक ,धूमधाम,निजात=छुटकारा
नूर ए रुख़=चेहरे की चमक , माहे ताबाँ =चमकते हुऐ चाँद ,..रौनके हयात=जीवन की खुशी
काएनात=संसार }

877-सड़क पुल पेड़

सड़क पुल पेड़ , नदी सभी खोये से हैं
कोहरे मे अभी नज़ारे सभी सोये से है
किरणों सी मुझे तलाशती आ जाओं
तन्हाई से घिरे हम भी घबराये से हैं

जर्रा जर्रा खामोशी से लिपटा हुआ है
निरुत्तर इस जहाँ में हम पराये से हैं
तेरा मेरा रिश्ता ख़त्म न होगा कभी
तेरा पीछा करते आये हम साये से हैं
किशोर कुमार खोरेंद्र

876-दिल तोड़ने के

दिल तोड़ने के आजकल कई बहाने होते हैं
मोहब्बत करने वाले आजकल सयाने होते हैं
तोहफे में जख्मे जिगर देना अदा ए हुश्न है
दिले बेकरार लिए हम जैसे दीवाने होते हैं
ख्वाबों ख्याल में साये सा तुम्हें रख लिया हूँ
अनलिखे से भी इस जहाँ में अफ़साने होते हैं
निसारे यार तक मुहब्बत करने का इरादा है
कयामत तक वादा ए उलफत निभाने होते हैं
हम तो चूर रहेंगें तेरे प्रेम के नशे में ता उम्र
दिखाने के लिए हम जैसे खाली पैमाने होते हैं
किशोर कुमार खोरेंद्र
(जख्मे जिगर=प्रेम का जख्म ,दिले बेकरार=आहत हृदय ,अफ़साने=किस्से ,कयामत=प्रलय
वादा ए उलफत=प्यार का वचन ,पैमाने= शराब का गिलास )

875-अब तुमसे मुलाकात

अब तुमसे मुलाकात होगी नही कभी
अब तुमसे मेरी बात होगी नही कभी
आबे रवाँ सा गुजर जाउँगा मैं चुपचाप
पहले सी वो दावते जज़्बात होगी नहीं कभी
मेरे अक्स को ख्वाब मे रखना संभाल के
तेरे ख्यालों से मेरी निजात होगी नहीं कभी
तेरा नूर ए रुख़ माहे ताबाँ सा लगता रहा मुझे
रूबरू फिर वो रौनके हयात होगी नहीं कभी
दिली ख्वाहिश हैं की तुझे जाने से रोक लूँ मैं
साथ रहेंगे ख़त्म यह काएनात होगी नही कभी
किशोर कुमार खोरेंद्र
{आबे रवाँ = बहता हुआ पानी ,आबोताब=चमक दमक ,धूमधाम,निजात=छुटकारा
नूर ए रुख़=चेहरे की चमक , माहे ताबाँ =चमकते हुऐ चाँद ,..रौनके हयात=जीवन की खुशी
काएनात=संसार }

875-लब पे तबस्सुम

लब पे तबस्सुम रुख़ पे मा "सूमियत पास तेरे है
वो खुशउस्लूबी वाली अच्छी नीयत पास तेरे है
मैं तेरे ख्वाबों ख्याल का हमराज हमदर्द बन गया हूँ
मेरे खातिर इतनी ज़्यादा अहम्मीयत पास तेरे है
मैं संग तेरे साये सा रहता हूँ तू मेरी परछाई सी है
मुझमे जो उमंग जगा दे ऐसी सुहलियत पास तेरे है
चाहत में हमे इंसान ही लगने लगता है रब सा
मैं इबादत करूँ तेरी ऐसी रब्बानियत पास तेरे है
आजकल न जाने क्यों बुत परस्त हो गये हैं लोग
चेतना की वो शाश्वत रूहानी कैफ़ीयत पास तेरे है
किशोर कुमार खोरेंद्र
तबस्सुम= हाली हँसी , खुशउस्लूबी =आचार -व्यवहार की अच्छाई . नीयत=इरादा,मा "सूमियत =भोलापन,हमराज=मित्र , हमदर्द =दुख दर्द का साथी अहम्मीयत=महत्ता ,सुह,बत=संगत
इबादत =उपासना .रब्बानियत=ईश्वरत्व, रूहानी= आत्मिक , बुत परस्त=मूर्ति पूजक ,कैफ़ीयत=मस्ती

874-दिल की बात

दिल की बात कह पाना उतना आसान नहीं है
बस तुझे मैं चाहूँ मेरा और कोई अरमान नहीं है
कहकशाँ सी मेरी आँखों में तुम समा गए हो
मुकद्दर में मेरे क्या तुझसा आसमान नहीं है
मुझ पर भी इनायत कर दो तो जानूं तुम्हें ऐ खुदा
कहते हैं जहाँ में तुझसा कोई मिहरबान नहीं है
दुनियाँ में सबसे प्यार करूँ कि तेरे लिये फ़ना हो जाऊँ
क्या तेरे नूर से लबरेज हर जर्रा प्रत्येक इंसान नहीं है
न कोई आईना न रास्ता ,न कोई मंजिल न हमसफ़र
सवाल है तन्हाई से ,क्या मेरी कोई पहचान नहीं है
किशोर कुमार खोरेन्द्र
{अरमान =लालसा ,कहकशाँ =आकाश गंगा ,इनायत =कृपा ,मिहरबान =दयावान ,फना =नष्ट ,लबरेज =परिपूर्ण ,जर्रा =कण }

873-तुम रहते हो....


तुम रहते हो.....

तुम रहते हो मेरे आसपास मुझे ऐसा लगता है
मैं तम हूँ तुम हो प्रकाश मुझे ऐसा लगता है

जगमगाते सितारों के बीच तुम चाँद सा खिले हो
तुम नूर से भरा हो आकाश मुझे ऐसा लगता है
मेरी गुमराह तन्हाई को ध्रुव तारे सा राह दिखाते हो
मुझमे जगाते हो आत्मविश्वास मुझे ऐसा लगता है
मंझधार में फंसीं नाव सा जब कभी घबरा जाता हूँ
उम्मीद के द्वीप सा आते हो पास मुझे ऐसा लगता है
मेरी राह में काँटों की जगह फूल बिछाते आये हो
पर तुम सिर्फ एक हो एहसास मुझे ऐसा लगता है

किशोर कुमार खोरेन्द्र

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

872-वो जब भी....

वो जब भी....

वो जब भी मुझसे मिलता है दीवाने की तरह 
उसमें फ़ना होने की चाह है परवाने की तरह

उसे नजर अंदाज करूँ भी तो किस तरह करूँ 
मैं नज़र बंद हूँ उसकी आँखें हैं आईने की तरह

उसके लिए मेरी रुसवाई भी हो जाये तो गम नहीं 
इस जहाँ में मिला है मुझे वह नजराने की तरह

अब बहार के फूल खिंजा के काँटों से लगने लगे है
उसके बिना शहर भी लगता है मुझे वीराने की तरह

मुझ पर लिखी उसकी शायरी से मुझे सुकून मिलता है
बाकि दुनियाँदारी लगती हैं मुझे अफ़साने की तरह

किशोर कुमार खोरेन्द्र

871-दो रस्सियों सा......

दो रस्सियों सा......
दो रस्सियों सा गूँथ कर इक मजबूत और अटूट डोर बन जायें
ज़मीं आसमाँ सा मिलकर क्षितिज का आखरी छोर बन जायें

तम के सागर में चाँदनी का अमृत भर गया चाँद सा मुखड़ा 
पहली किरण और अंतिम ओस के मिलन का भोर बन जायें

आजीवन मन में हम दोनो एक दूसरे को पुकारते ही रह गये 
मौजों के कोलाहल में साहिल की खामोशी का शोर बन जायें

वन की घाटियों मे गूँज उठे जिनकी दूर दूर तक मधुर आवाज़
तुम नृत्य करती मोरनी हम तुम्हारे प्रेम में मोर बन जा जायें

तुम्हें याद करते ही आप से आप मैं लिख लिया करता हूँ ग़ज़ल
जो लगता नही इश्क़ पर कभी आओं वही हसीन ज़ोर बन जायें


किशोर कुमार खोरेंद्र

रविवार, 14 दिसंबर 2014

870-उनसे करना बात ..........

उनसे करना बात ..........

उनसे करना बात अच्छा लगता है 
उनके रहना साथ अच्छा लगता है

जिंदगी तो अकेले ही कट जायगी
उनसे हो मुलाकात अच्छा लगता है

मिलती है जब उनकी नज़रों से नज़रे 
देखना रुख़ ए माहताब अच्छा लगता हैं

हमे पंखुरियों में उलझने की आदत है
उनका रखना एहतियात अच्छा लगता है

उनके ख्वाबों ख्याल में मै ही रहता हूँ
फिर भी देना इंतिबाह अच्छा लगता है

किशोर कुमार खोरेंद्र

एहतियात=सावधानी ,इंतिबाह=चेतावनी

869-वो मेरे रूह....

वो मेरे रूह....

वो मेरे रूह समेत हो गये 
दो दिल आज एक हो गये 

आँखों ने आँखों को पढा
अब इरादे भी नेक हो गये 

वो बर्फ से नदी बन गयी 
हम पहाड़ से रेत हो गये 

वो कविता , मैं काव्य हूँ
रेखांकित उल्लेख हो गये

एक दूजे की आँखों मे हैं
आँखों के उन्मेष हो गये

किशोर कुमार खोरेंद्र

868-मुझे जंगल के.....

मुझे जंगल के.....

मुझे जंगल के दुर्गम रास्तों की आवारगी पसंद है 
मर मिटने को आतुर परवाने की दीवानगी पसंद है

वियोग में तेरे मैं तो दूर बहुत दूर निकल आया हूँ 
मुझे महा सागर के साहिल की वीरानगी पसंद है

वो तो सदा लहरों सी आकर चुपचाप चली जाती है 
राहनुमा की मुझे यह निश्छल अदायगी पसंद है

नदी प्यासी सागर प्यासा ,लहर प्यासी तट प्यासा
जिस्म ए रूह की यह सोहबत ए तिश्नगी पसंद है

तेरे लिए दुआ माँगूँ , सजदा करूँ , तेरी इबादत करूँ
तुझसे बिना रूबरू मिले रगबत की जिंदगी पसंद है

किशोर कुमार खोरेंद्र

रगबत= मिलनसारी

867-तेरे रुख़ से......

तेरे रुख़ से......

तेरे रुख़ से वो हँसी गायब है 
जहाँ के प्रति यकीं गायब है

तुमने जिस पे ऐतबार किया 
वो निगहबाँ अभी गायब है

जो तेरी तन्हाई का साथी है 
चाँद की वो चाँदनी गायब है

मकसद समझ नही आया
पतवार है कश्ती गायब है

दर्द सहना आता है पर
आँखों से मस्ती गायब है

किशोर



निगहबाँ=रखवाला

866-यादों में तुम्हारे ....

यादों में तुम्हारे ....

यादों में तुम्हारे हरदम मैं खोया रहता हूँ 
तेरे सपनो के आगोश में मैं सोया रहता हूँ

तुम कोहरे सा आकर रोज ओझल हो जाते हो 
वियोग सूत्र में अश्रु मोतियों सा पिरोया रहता हूँ

शबनम से नम रहती हैं फूलों की आँखों सी पंखुरियाँ 
हृदय सरोवर में कमल बीज सा तुम्हें बोया रहता हूँ

पतझड़ के अमावाश के तम सा एकाकी रहता हूँ
तुम्हारी स्मृति को ज्योत्सना सा संजोया रहता हूँ

मेरे प्रेम का तुम्हें अहसास होगा कभी न कभी
तेरे प्रति निरंतर चराग़ ए इश्क़ जलाया रहता हूँ

किशोर कुमार खोरेंद्र

865-"चुभन "

"चुभन "

झरते हैं तो क्या हुआ 
रोज तो खिलते है सुमन 
काँटों को देखकर 
महसूस न करों चुभन 
मन बहता ही रहता है 
गति ही है जीवन 
हालाँ की यह सच नहीं है 
फिर भी मान लो 
क्षितिज पर
ज़मीं से मिल रहा है गगन
आती हुई लहर
जाती हुई लहर के क्र्म सा
है जनम और मरण
सपन सा लगता है जागरण
नींद में वही
जागरण बन जाता है सपन

किशोर कुमार खोरेंद्र

864-चाँद दिखा नही ...

चाँद दिखा नही ...

चाँद दिखा नही बहुत अंधेरा हैं 
गम के अमावाश ने आ घेरा है

तारों की तरह बिखरा है मेरा दर्द 
याद में चाँदनी सा तेरा चेहरा है

तू बहती नदी मै स्थिर सागर हूँ 
तेरे प्रति प्रेम मेरा अति गहरा हैं

मुँह मोड़ कर क्यों चल देते हो
जीवन मेरा तेरे लिए ही ठहरा है

निगाहें सबकी मुझे देख रही हैं
लगता है हर तरफ जैसे पहरा है

किशोर कुमार खोरेंद्रा

शनिवार, 29 नवंबर 2014

863-भटकाव"

भटकाव"

आख़िर मैं 
पहुँच ही गया 
जहाँ पर 
राह ख़त्म हो ज़ाती है 
यहाँ पर 
न शहर है न गाँव है 
आकाश का धरती की ओर 
बस कुछ झुकाव है
यहाँ से 
एक नदी शुरू होती है
उसकी सतह पर एक नाव तैरती है
उस पार घना जंगल है
वहाँ पर
कहीं धूप है
वहाँ पर
कहीं छाँव है
फिर से
नये पथ को खोजूँगा
बिना मंज़िल को
जाने चलूँगा
जीवन बस
एक भटकाव है


किशोर कुमार खोरेंद्र

862-चाँद दिखा नही ...

चाँद दिखा नही ...

चाँद दिखा नही बहुत अंधेरा हैं 
गम के अमावाश ने आ घेरा है

तारों की तरह बिखरा है मेरा दर्द 
याद में चाँदनी सा तेरा चेहरा है

तू बहती नदी मै स्थिर सागर हूँ 
तेरे प्रति प्रेम मेरा अति गहरा हैं

मुँह मोड़ कर क्यों चल देते हो
जीवन मेरा तेरे लिए ही ठहरा है

निगाहें सबकी मुझे देख रही हैं
लगता है हर तरफ जैसे पहरा है

किशोर कुमार खोरेंद्रा

861-"चुभन "

"चुभन "

झरते हैं तो क्या हुआ 
रोज तो खिलते है सुमन 
काँटों को देखकर 
महसूस न करों चुभन 
मन बहता ही रहता है 
गति ही है जीवन 
हालाँ की यह सच नहीं है 
फिर भी मान लो 
क्षितिज पर
ज़मीं से मिल रहा है गगन
आती हुई लहर
जाती हुई लहर के क्र्म सा
है जनम और मरण
सपन सा लगता है जागरण
नींद में वही
जागरण बन जाता है सपन

किशोर कुमार खोरेंद्र

860-यादों में तुम्हारे ....

यादों में तुम्हारे ....

यादों में तुम्हारे हरदम मैं खोया रहता हूँ 
तेरे सपनो के आगोश में मैं सोया रहता हूँ

तुम कोहरे सा आकर रोज ओझल हो जाते हो 
वियोग सूत्र में अश्रु मोतियों सा पिरोया रहता हूँ

शबनम से नम रहती हैं फूलों की आँखों सी पंखुरियाँ 
हृदय सरोवर में कमल बीज सा तुम्हें बोया रहता हूँ

पतझड़ के अमावाश के तम सा एकाकी रहता हूँ
तुम्हारी स्मृति को ज्योत्सना सा संजोया रहता हूँ

मेरे प्रेम का तुम्हें अहसास होगा कभी न कभी
तेरे प्रति निरंतर चराग़ ए इश्क़ जलाया रहता हूँ

किशोर कुमार खोरेंद्र

मंगलवार, 25 नवंबर 2014

859-मकहने लगता हैं...

मकहने लगता हैं...
मकहने लगता हैं मेरा घर तेरे आने के बाद 
महकने लगती हैं मेरी साँसें तेरे जाने के बाद

अब न कोई गम है ना कोई सितमगर हैं 
मेरे इश्क़ को तेरे ज़रिए आज़माने के बाद

चाँद तारों को भी मुझसे रश्क़ होने लगा है 
संग तेरे इस मोहब्बत के अफ़साने के बाद

तुझमें जुनून ए उलफत और बढ़ गया हैं
मिलकर मुझ जैसे इक दीवाने के बाद

बुत परस्त तंग गलियों से मैं लौट आया हूँ
तेरे कदमों में रस्म ए सजदा निभाने के बाद

पहले से तुम और ज़्यादा खूबसूरत लगने लगे हो
अपने अक्स का मेरी निगहों में मुआयने के बाद

किशोर कुमार खोरेंद्र

( ,सितमगर=अत्याचारी ,आजमाना=परीक्षा लेना ,रश्क=ईर्ष्या
अफ़साना =कहानी ,जुनून ए उलफत =प्यार का उन्माद , बुत परस्त=
मूर्ति पूजने वाले ,
रस्म ए सजदा =शीश झुकाने की रस्म ,मुआयना =निरीक्षण )

858-हर घड़ी तेरा...

हर घड़ी तेरा...

हर घड़ी तेरा मैं बेसब्री से इंतजार करता हूँ 
तू आये न आये पर तुझपे ऐतबार करता हूँ

तू कौन हैं तेरा नाम है क्या मुझे मालूम नही 
इब्तिदा से तुझसे मैं बेइंतहा प्यार करता हूँ

साहिले वस्ल इस जहाँ में कहीं पर तो होगा 
सागरे हिज्र को तन्हा कश्ती सा पार करता हूँ

कोहरे के आँचल सा मेरे हाथों से फिसल जाते हो
खत या नज़्म लिखकर प्रेम का इज़हार करता हूँ

उदगम से नदी सी उतरती हुई लगती हो तुम
मैं तेरा पीछा तेरे प्रवाह के अनुसार करता हूँ

मन में ख्ववाहिशों की भीषण लहरे उठती हैं
एहतिजार पर तेरे शालीन व्यवहार करता हूँ

बर्फ से ढकें पर्वत के शिखर पर है एक मंदिर
परचम ,स्वर्ण कलश ,सा तेरा दीदार करता हूँ

अहले जुनूँ की लहर सी तुझे भी मेरी तलाश होगी
ख्वाबो ख्याल में इसलिए तुझे स्वीकार करता हूँ

किशोर कुमार खोरेंद्र

(इब्तिदा=शुरू से ,साहिले वस्ल=मिलन का किनारा ,सागरे हिज्र =विरह का सागर
एहतिजार= सामने आना ,अहले जुनूँ=जुनून रखने वाला )

857-"तेरी जुदाई को......"

"तेरी जुदाई को......"

तेरी जुदाई को सहना अब आसान नहीं है 
मेरी आपबीती का तुझे अनुमान नहीं है

साये की तरह तेरे संग मैं चलता आया हूँ 
मेरे खुलूश का और कोई अरमान नही है

जबसे तुम गये हो मुझे तन्हा छोड़कर 
मेरे लबों पर पहले जैसी मुस्कान नहीं है

जश्ने बहार आया नही ,पतझड़ गया नहीं
इंद्रधनुष से सजा रंगीन आसमान नही है

तेरी याद में मैं चराग़ सा रोज जल रहा हूँ
उसकी लौ में तेरे न होने का गुमान नही है

परिंदा ए सूकूत़ सा झील के किनारे बैठा हूँ
मेरे परों के ख्वाब में पर वो उड़ान नहीं है

लफ़्ज़ों में अपने दर्द को कैसे बयाँ करूँ
ऐसी दास्ताँ हूँ जिसका उनवान नहीं है

तूने भी तो मुझसे बेहद मोहब्बत की है
मेरी हालत से तू भी तो अंजान नहीं है

किशोर कुमार खोरेंद्र

(जुदाई =वियोग ,खुलूश =निष्कपटता, अरमान = इच्‍छा ,तन्हा =अकेला , जश्ने बहार =बसंत उत्सव , गुमान =भर्म
सूकूत़= मौन ,लफ़्ज =शब्द ,बयाँ=इज़हार ,दास्तान=कहानी ,उनवान = शीर्षक )

856-न कभी हाँ कहा....

न कभी हाँ कहा....

न कभी हाँ कहा न कभी ना कहा उसने 
मेरे सवालों के जवाब में कुछ ना कहा उसने

उसकी खामोशी की गहनता भी बोलती है 
मेरे मन के दर्द को ,दर्द अपना कहा उसने

मेरी निगाहों की किताब को पढ़ चुकी है वो 
चीर कर सीना मुझे मत दिखाना कहा उसने

रात भर उसे भी नींद नहीं आती होगी
मुझसे रोज जल्दी सो जाना कहा उसने

मैं उसकी ओर खींचा चला ज़ा रहा हूँ
मुझसे करीब मत आना कहा उसने

किशोर कुमार खोरेंद्र

मंगलवार, 11 नवंबर 2014

855-"वुसअत ए मुहब्बत "

"वुसअत ए मुहब्बत "

चुभते हुऐ इंतज़ार के काँटों में गुलाब सा तुम खिले हो 
छिटकी हुई यादों की चाँदनी में माहताब सा तुम खिले हो

मेरे गम ए हिज्र का तुम्हें ज़रा भी अनुमान नहीं है 
मुझमे ,रेत में जज़्ब लहरों के आब सा तुम मिले हो

हमारी वुसअत ए मुहब्बत तेरी रूह से मेरी रुह तक फैली है 
आसमाँ में सितारों सा मेरे ख्यालों ख्वाब का तुम सिलसिले हो

तेरी आँखों के आईने से मेरे अक्स ने यह मुझे बतलाया है 
इब्तिदा से अंजाम तक मेरे वजूद मे सबब सा तुम घुले हो

नूर सा जगमगाता हैं दूर दूर तलक मेरी निगाहों में तेरा तसव्वूर 
मेरे गमगीन अंधेरों के तप को सुबह के आफताब सा तुम मिले हो

किशोर कुमार खोरेंद्र

(माहताब =चाँद ,गम ए हिज्र=विरह का दुख ,जज़्ब =सोखना ,आब =जल ,वुसअत ए मुहब्बत=प्रेम का विस्तार ,अक्स =परछाई , इब्तिदा=आरंभ ,अंजाम =अंत ,वजूद =अस्तित्व ,सबब = मूल कारण 
तसव्वूर=ध्यान ,विचार , गमगीन =दुखी ,आफताब =सूरज )

854-"फूल"

"फूल"

तुम कहते हो सारे फूल अच्छे लगते हैं
तेरे जुड़े में गुलाब के फूल अच्छे लगते हैं

तुम्हारी नीयत पर मुझे कोई गुमान नही है
तुम्हे मुझसे हुऐ शरारती भूल अच्छे लगते हैं

उस पार कोहरे से घिरे तुम, जब नज़र आते हो
बीच में गहरी नदी और उँचे पुल अच्छे लगते हैं

गमले में रोप कर जिन जिन पौधों को तुम गये हो
उन पौधों की शाखों में खिले गुल अच्छे लगते हैं

जिस राह पर तुम्हारे पैरों के निशान अंकित हैं
उस पगडंडी के मुलायम धूल अच्छे लगते हैं

किशोर कुमार खोरेंद्र

853-"खत "

"खत "

क्या मेरे दिल में ही बस प्यार प्यार भरा है 
लोग कहते है हमारा दिल भी सोने सा खरा है

शब्दों ने मेरी उंगली पकड़ कर मुझसे लिखवाया 
वरना मेरी ज़ुबाँ पर भी तो जड़े ताले का पहरा है

वो भोली है नादां हैं दुनियानदरी से वो दूर है 
मेरे प्रति उसके हृदय का प्रेम पर बहुत गहरा है

रोज लिखने को कहता है मन उसे प्रेम के खत 
साथ मेरे खजाँ का हर कोंपल हो गया हरा है

जिस शै को देखता हूँ उसमे तुम ही नज़र आते हो 
जैसे बहार को ताकता हर तरफ परेशान सहरा है

किशोर कुमार खोरेंद्र