शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

733-"मनुष्य का जीवन "

"मनुष्य का जीवन "

तुम्हारी सांसों में
घुला हैं
सुगन्धित पवन
तुम्हारी आँखों में
बसा हैं
विस्तृत गगन
तुम्हारे मन में
जगमगाते हैं
इच्छाओं के अनंत उडु गण
चेतना के निस्तब्ध जगत की
खामोशी से जुड़ी हैं
तुम्हारे ह्रदय की धड़कन
कमल की पंखुरियों सा
खिला खिला हैं
तुम्हारा सुन्दर आनन
गंगा सी एक नदी
तुम्हारी नसों में
बहती हैं पावन
हिमालय की तरह
तुम्हारे इरादे मजबूत हैं
उन्हें पराजित
नहीं कर पायेगी कोई अड़चन
तुम्हारे ही भीतर
गंभीर और सारगर्भित समुद्र हैं
कर लो अमृत मंथन
देख कहाँ पाते हैं हम
स्वयं का
जन्म और मरण
जिसका कभी अंत ना हो
ऐसा हैं
प्रत्येक मनुष्य का जीवन
उड़ते रहो बादलों सा
धूप को छाया में
करो परिवर्तन
या बरस कर
शीतल कर दो भीषण तपन
सुखद और मनोरम हो जाए
ताकि
इस धरती का वातावरण

किशोर कुमार खोरेन्द्र

732-"प्रणय"

"प्रणय"

वियोग में ही
होता है
प्रणय का अहसास
बरसों पहले
पल भर के लिए ही सही
तुमसे मेरा परिचय हुआ था
इसे भी मानता हूँ मैं
मुझ पर तुम्हारा एहसान
उसी मिलन पर है मुझे नाज़

अन न तुम्हारी परछाई है
न तुम्हारी तस्वीर है
इस जहाँ में तनहा छोड़ गयी हो
यह कह कर की
अब फिर न होगी
कभी तुमसे मेरी मुलाक़ात
मौन हो गए है साज

मेरी मान्यता है
प्यार ,शब्दों का
नहीं होता हैं मोहताज
इसीलिए तो
सुनायी देती है
वादियों में खोयी हुई
तुम्हारी मधुर आवाज

धुंधली सी हो चुकी
तुम्हारी आकृति में
सुबह की रश्मियों की तरह ही
उभर आती है
तुम्हारी मधु सी मुस्कान
तुम्हारी शोख निगाहें
मेरा पीछा करती सी लगती है
इस रहस्य का
नहीं पाया हूँ जान
अब तक मैं राज

कभी किसी अजनबी ने
यह जताकर
किया था मुझसे एतिराज़
प्रेम
कभी खत्म नहीं होता
जीवन से भी लंबी है उसकी राह
उसकी कोई मंजिल नहीं होती
उसका होता है सिर्फ आगाज़

हार कर भी मैं जीत गया हूँ
दर्द के बिना
अधूरा हैं
मेरा अनुराग
तन्हाई की धुंध में
बर्फ सी घुली है
तुम्हारी याद
तुम्हारे और मेरे बीच
झील सी गहरी ख़ामोशी है आज

*किशोर कुमार खोरेन्द्र

731-"शरद ऋतु "

"शरद ऋतु "

बर्फ की सिल्लियों सा
नभ में हैं
बादलों का प्रसार

शशि किरणें कर रही हैं
धरा पर शीत की बौछार्

झील में
मिश्री की डली सा
घुल गया हैं
पूनम का चाँद
मचल उठी हैं लहरें
तट से कर रही हैं
वे मनुहार

ओस से भींगी
रेत की सुडौल काया
सजीव हो गयी हैं
चित्ताकर्षक हैं उसका
अनुपम रूप जो
हुआ हैं अभी साकार

खुले गगन के झरोखों से
सकुचाये से
टिमटिमाते तारे भी
रहे हैं इस छटा को निहार

आओं मैं और तुम भी करे
आँखों आँखों से
शरारतों का इज़हार

बह रही हैं
चन्दन की महक लिए
नर्म दुशाले सी
सुखद शीतल बयार

सुध बुध खो चुकी
एक नाव के हाथों में
नहीं हैं पतवार
आगे हैं मंझधार

मोंगरे की पंखुरियों सी
धवल लग रही हैं निशा
चांदनी ने किया हैं श्रृंगार

आज फिर सरस हुआ हैं
शरद ऋतु का शालीन व्यवहार

किशोर कुमार खोरेन्द्र

730-"हलचल"

"हलचल"

तुम कहती हो मुझ पर लिखना मत
मैं हूँ एक अति साधारण औरत
पर मैं तो हूँ एक लेखक
इसलिए तुम्हारे इस कथन
से नहीं हूँ पूरी तरह से सहमत

तुम्हारे ह्रदय में खिला हैं
सदभावों का shat दलीय कमल
तुम्हारे मन की रोशनी
हर लेना चाहती हैं तम
भविष्य में मृत्यु हैं अतीत में हैं जनम
लेकिन तुम वर्त्तमान के
प्रत्येक क्षण को मानती हो
सचमुच में जीवन

शब्दों से तुम्हें स्नेह हैं
उनमे किंचित भी त्रुटी हो
यह तुम्हें नहीं हैं सहन
तुम्हें पसंद हैं अध्ययन
चिंतन और मनन
और करती रहती हो
सतत आत्म विश्लेषण
एवं औरों के मन का भी निरीक्षण

स्त्रियों के प्रति पुरुषो के भीतर
जो दुर्भावना हैं
नारी को जो समझते हैं सिर्फ तन
महसूस नहीं कर पाते हैं
जो लोग उसकी रूह का वज़न
करना चाहते हैं केवल चीर हरण
ऐसे दू : शासन दुर्योधन से
तुम करती हो नफरत

लेकिन इस आक्रोश से उबलते
व्यैक्तित्व के अंदर हैं
एक युवती
पुष्प की पंखुरियों सी मुलायम
जिसे प्रकृति से प्रेम हैं
तुम्हें भाता हैं ऊगता हुआ सूरज
भागती नदियाँ की कल कल सी
तुम भी तो करती हो हलचल

किशोर

729-अवकाश

अवकाश
मेरी कलम की पीठ पर
मेरी उँगलियों के निशान हैं
अब तक
एक कोरा पन्ना मेरे बिना
कमरे के हर कोने में
मुझे तलाश चूका होगा
किताबों को यूँ ही
करीने से सजे रहना
अच्छा नहीं लग रहा होगा

घर के आईने ने मुझे
काफी दिनों से देखा नहीं हैं
खिड़की की दीवार से
सटा हुआ गुलमोहर
उचक उचक कर
सूने कमरे को
निहार रहा होगा
झरोखे से आती एक सीधी किरण
सर्च लाईट की तरह
अँधेरे में अकेली खड़ी होगी

दो छिपकलियाँ जो
आपस में लड़ते लड़ते या
प्यार करते करते
मुझ पर धप से
अक्सर गिर जाया करती हैं
सोच रही होंगी - अरे वो कहाँ गया

दरअसल इस बार
मेरे चश्मे ने
मेरी आँखों को पहन लिया हैं
मेरी चप्पल मुझे जहां जहां
ले जा रहीं हैं
मैं वहाँ वहाँ जा रहा हूँ

मैंने अपने मन को
खुला छोड़ दिया हैं
सोच रहा हूँ
शायद इस बार-
नदी को ,सागर को
पढ पाऊँ
वृक्षों से
कोई नयी कहानी सुन पाऊँ
पहाड़ों के शिखर से
लौट कर आयी प्रतिध्वनि से
कुछ सीख ले पाऊँ
किशोर

728-"एक ग्राणीण युवती "

"एक ग्राणीण युवती "

नटखट मन चंचल चितवन
सुडौल तन सुन्दर आनन
निर्मल ह्रदय हँसीं ऐसी
जैसे
खिला हो अभी अभी सुमन
कुंतल लंबे और सघन
हो जब आगमन
नीरस lage न वातावरण
आप से आप
मुस्कुराने लगे यौवन

तीखे नाक नक्श
बोलती मीठे वचन
चहरे पर हैं
ग्रामीण भोलापन
जब देखो तब कार्य रत
मिले न उसे फुर्सत

जानती समझती सब हैं
लेकिन अभिनय किये बिना
जीती हैं
संयमित
अनुशासित
मर्यादित
और स्वाभाविक जीवन
किशोर

727-"विलय"

"विलय"

तुमसे जब हुआ परिचय
तब समझ में आया
जीवन का मूल आशय
धड़कने लगा हैं
तुम्हें याद कर
अब मेरा ह्रदय
तुम मुझे जीत गयी हो
तुम्हारे समक्ष मैं
मान लेता हूँ पराजय
स्वीकार किया था मैंने
इस जीवन को एक अभिनय
जबसे तुमसे मिला हूँ
तब से मिट गया हैं
पुर्वाग्रह और संशय
तुम्हारी नज़रों का सम्मोहन
मुझे लगा रहस्यमय
तुम्हारी आत्मा के
अंग अंग में हैं
मधु रस का संचय
तुम्हारे और मेरे प्यार से
ऊँचा नहीं हैं हिमालय
गंगा के उदगम स्थल सा
पावन हैं हमारा प्रणय
मैं एक ऐसा हूँ जलाशय
जिसके
निर्मल और मीठे जल में
तुम्हारी चाँद सी छवि का
हुआ हैं अंतरंग विलय
तुम्हारी रूह से मेरी रूह का
अब हो चूका हैं परिणय
तुम मेरी स्मृति के
निर्जन वन में
मधुर धुन सी गूंजती हो
मेरे लिए तुम ही हो
ताल छंद और लय
किशोर कुमार खोरेन्द्र

726-"क्या तुम भी मुझसे ....."

"क्या तुम भी मुझसे ....."


तुम्हारे ख्यालों तक

मेरे ख्याल ..

तुम्हारे सपनों तक

मेरे स्वप्न ..

तुम्हारी खामोशी तक

मेरी खामोशी ...

क्या कभी पहुँच पायेंगे ...?

तुम्हारी परछाई से

मेरी परछाई ..

तुम्हारी तस्वीर से

मेरी तस्वीर ...

तुम्हारी रूह से

मेरी रूह ..

क्या कभी मुलाकात कर पायेंगें ..?

ऐसे भी देह और मन का ..

तो कोई अर्थ ही नहीं हैं

तुम्हारी कविता में

मेरे शब्द ..

तुम्हारी पेंटिंग में

मेरे रंग ...

तुम्हारे साज में

मेरे सुर ..

क्या कभी शामिल हो पायेंगे

वैसे भी ..

प्रेम के अभाव में ..

धरती का हरा पन

आकाश का नीलापन ..

दिखाई नहीं देते

क्या मै तुम्हारी

चेतना की नसों में बह सकता हूँ

क्या मै तुम्हारे

ह्रदय का स्पन्दन बन सकता हूँ

क्या मैं तुम्हारे

चिंतन का विषय बन सकता हूँ

मै तो तुमसे बेहद प्यार करता हूँ

क्या तुम भी मुझसे .....

उतना ही प्रेम कर सकती हो .?
kishor

725-"माध्यम"

"माध्यम"

मैँ तो सिर्फ हूँ
एक माध्यम
कविता नहीं होती हैं ख़तम

बूंद बूंद की तरह आपस में
जुड जाते हैं अक्षर
शब्दों से शब्द मिलकर
बिखरते हैं ऐसे
जैसे हो
वे वाक्यों की अनेक लहर

जब भी तुम्हारे प्यार का
होता है मीठा सा अहसास
ह्रदय के भाव आते हैं उभर

तुम्हारे मन में है एक
ऐसा भी घर
जहां मेरे साये का होता हैं
तुम्हारे संग बसर

तुमसे बाते करता हुआ वहाँ
मैँ थकता नहीं हूँ
तुम्हारी मूक निगाहों की भाषा
होती हैं सरस
जिसका मुझ पर
पड़ता हैं गहरा असर

मैँ तो सिर्फ हूँ
एक माध्यम
कविता नहीं होती हैं ख़तम

किशोर

724-"कुछ दीवानगी

"कुछ दीवानगी "

तुझमें हुस्न का गुरुर हैं
मुझमेँ इश्क़ का सुरूर हैं

मैं भी पाक हो जाता
यदि मुझे पनाह देती
तेरी पाकीज़गी

मुझमे हैं अब कुछ आवारगी
मुझमे हैं अब कुछ दीवानगी

तेरी ज़रा सी बेरूखी की
वज़ह से मैं
खुद से हो गया हूँ अज़नबी

तेरी दुआ के बगैर
सूनी लगती हैं
मुझे यह पूरी मेरी ज़िंदगी

किसी बुत का नहीं
बस चाहा था मेरी रूह ने
करना तेरी बंदगी
किशोर कुमार खोरेन्द्र

723-आप

आप

अगर मिल जाती 

आपकी कोई खबर
आसान हो जाता 

मेरे जीवन का सफ़र

आप ही से दिल की बात
करने का था इरादा
पर कोई काम ज़रूरी हो गया
इस वक्त
हमारी बातों से ज्यादा

आप तो मेरी हर बात से हैं वाकिफ़
आपके बारे में कुछ जान पाऊँ
यह मेरे लिए कहां हैं मुनासिब

कोई बात नहीं होती तब भी
आप हो जाते हो नाराज़
प्यार प्रदर्शित करने का
यह भी खूब हैं अंदाज

किशोर कुमार खोरेन्द्र

{मुनासिब =उचित
वाकिफ़ =परिचित
अंदाज़ =ढंग }