बुधवार, 27 नवंबर 2013

"तुम्हारा ख्याल"



chhoti rachnaaye 

1-pyaar hain sirf madhur smran .
.maine bhi to kiya hai ...
isi tarah se apni smriti me ...
tumhe varan ..



2-baaton ki shrinkhala ki
shesh rah jaati hain kadi
isi bhahaane
mil liya karenge fir kabhi


3-main hi hu apne man ka jaankaar ...
ki vah bechain ho ..
kaese karta hai kisi ka intazaar .



4--"तुम्हारा ख्याल"

आते ही
तुम्हारा मन में ख्याल
हल हो जाते हैं सारे सवाल
शब्दों के समूह एकजुट हो जाते हैं
अभियक्त होने लगता हैं
आपसे आप दिल का हाल
आते ही
तुम्हारा मन में ख्याल

5-"अनाम रिश्ता"
अदृश्य सी महीन होती हैं
अनाम रिश्ते की डोर
न समझना उसे पर
नाजुक और कमजोर
निश्छल होता हैं
यह सम्बंध
न कोई जोर
न कहीं कोई शोर



6-तुम्हारी आँखें
मेरे लिए वो आईना हैं
जिनमें मुझे
मेरी देह नहीं ,मेरा मन नहीं
मेरी रूह दिखाई देती हैं


7-jaese nadi ke sath
rahataa hain kagaar
usi tarah se hain
mera tumase karaar
maine kiya tha tumase
apne pyaar ka izhaar
badale me tumne kaha tha
main nadiya hun
chalte raho mere sang
mere bahaav ke anusaar


8-तुम
वो एक मधुर गीत हो
जिसे मैं
मन ही मन
इस तरह से गाता रहता हूँ
इस तरह से गुनगुनाता रहता हूँ
ताकि कोई सुन न सके
या
तुम
तुम्हारे द्वारा प्रेषित
वह प्यार भरा अंतिम ख़त हो
जिसके शब्दों को
मैंने
अपने ह्रदय के कोरे पृष्ट पर
अमिट रूप से लिख लिया हैं


9-karate rahe unke aagman ka intazaar
pal pal lagata raha sadiyon sa


10-jinke ghar ki divaare khamoshi ke iiton se bani ho ..

unhe kaese pukaaraa jaaye ..


11-mai to tumhare khatir
rachata hi rahta hun chhand
tarif karate rahane ka
tumne hi toda hain anubandh


12

-"अहसास "
तुम्हारा मुस्कुराता हुआ चेहरा
आता हैं मुझे नज़र
तुम्हारी खिलखिलाहट का
मुझ पर दिन भर रहता हैं असर
अपनी निगाहों से आने के लिए
इशारे किये हो तुम मुझे जिधर
मन करता हैं
चलता रहूँ बस उधर
हालाकिं तुम उपस्थित नहीं हो
पर तुम्हारे होने का
अहसास लिए किया करता हूँ सफ़र
तुम्हारे जूड़े में
गुलाब की पंखुरोयों सा
खिला हुआ हूँ मैं
जिसे सहेजती हो बार बार तुम छूकर
मैं तुम्हारा दुप्पटा हूँ
जो तुम्हारे कंधें से सरकता भी हैं
तो संभल कर

किशोर कुमार खोरेन्द्र

721-"वजूद "

"वजूद "
मैं शरीर से
मन से अलग हूँ
शरीर को बदलता हुआ देखता हूँ
मन की बातें निरंतर सुनता हूँ
प्रकृति का अनुपम सौंदर्य मुझे अभिभूत कर लेता हैं
नियति के हिंसक प्रहार को निहारकर
अवाक रह जाता हूँ
दर्द किसी का दूर नहीं कर पाता हूँ
थक हार कर
लौटे हुए पक्षी सा
अपने मन के वृक्ष की खोह में
असहाय सा
दुबक कर बैठ जाता हूँ
नीले सागर की अथाह गहराई
अंतरिक्ष का असीम विस्तार
शिखर पर
बर्फ से आच्छादित ऊँचें पर्वत
सागौन और साल के घने जंगल
रास्ता तलाशती सी
सूनी सहमी सी अनेक पगडंडियाँ
बदहवाश सी
शहर की असंयमित सी सड़कें
धरती से उठकर आकाश छूने को तत्पर
मनुष्य के भीतर की
जगमगाते सितारों सी अनंत इच्छायें
अंतहीन और व्यापक हैं यह सब परिवेश
मैं यह शरीर नहीं हूँ
क्योंकिं इसे कल राख होना हैं
मैं यह मन भी नहीं हूँ
जिसकी कामनाएं कभी पूरी नहीं होती
मैं तो जैसे
अखिल सौर मंडल में स्थित पृथ्वी के सदृश्य
एक गोल खारा बूंद हूँ
उड़ती हुई गुबार का एक कण हूँ
मधु मय ओस सा अभी हूँ
अगले पल नहीं भी हूँ
धुंध सा सभी को अपनी बाँहों में भर कर
प्रेम देकर लापता हो जाता हूँ
तो क्या मैं हूँ ही नहीं
फिर अपने वजूद के लिए जिद्द क्यों
मान क्यों नहीं लेता की
मैं हूँ ही नहीं
किशोर कुमार खोरेन्द्र

720-"प्रणय"

"प्रणय"

वियोग में ही
होता हैं
प्रणय का अहसास
बरसों पहले
पल भर के लिए ही सही
तुमसे मेरा परिचय हुआ था
इसे भी मानता हूँ मैं
मुझ पर तुम्हारा एहसान
उसी मिलन पर हैं मुझे नाज़

अन न तुम्हारी परछाई हैं
न तुम्हारी तस्वीर हैं
इस जहाँ में तनहा छोड़ गयी हो
यह कह कर की
अब फिर न होगी
कभी तुमसे मेरी मुलाक़ात
मौन हो गए हैं साज

मेरी मान्यता हैं
प्यार ,शब्दों का
नहीं होता हैं मोहताज
इसीलिए तो
सुनायी देती हैं
वादियों में खोयी हुई
तुम्हारी मधुर आवाज

धुंधली सी हो चुकी
तुम्हारी आकृति में
सुबह की रश्मियों की तरह ही
उभर आती हैं
तुम्हारी मधु सी मुस्कान
तुम्हारी शोख निगाहें
मेरा पीछा करती सी लगती हैं
इस रहस्य का
नहीं पाया हूँ जान
अब तक मैं राज

कभी किसी अजनबी ने
यह जताकर
किया था मुझसे एतिराज़
प्रेम
कभी खत्म नहीं होता
जीवन से भी लंबी हैं उसकी राह
उसकी कोई मंजिल नहीं होती
उसका होता हैं सिर्फ आगाज़

हार कर भी मैं जीत गया हूँ
दर्द के बिना
अधूरा हैं
मेरा अनुराग
तन्हाई की धुंध में
बर्फ सी घुली हैं
तुम्हारी याद
तुम्हारे और मेरे बीच
झील सी गहरी ख़ामोशी हैं आज

*किशोर कुमार खोरेन्द्र

719-"शरद ऋतु "

"शरद ऋतु "

बर्फ की सिल्लियों सा
नभ में हैं
बादलों का प्रसार

शशि किरणें कर रही हैं
धरा पर शीत की बौछार्

झील में
मिश्री की डली सा
घुल गया हैं
पूनम का चाँद
मचल उठी हैं लहरें
तट से कर रही हैं
वे मनुहार

ओस से भींगी
रेत की सुडौल काया
सजीव हो गयी हैं
चित्ताकर्षक हैं उसका
अनुपम रूप जो
हुआ हैं अभी साकार

खुले गगन के झरोखों से
सकुचाये से
टिमटिमाते तारे भी
रहे हैं इस छटा को निहार

आओं मैं और तुम भी करे
आँखों आँखों से
शरारतों का इज़हार

बह रही हैं
चन्दन की महक लिए
नर्म दुशाले सी
सुखद शीतल बयार

सुध बुध खो चुकी
एक नाव के हाथों में
नहीं हैं पतवार
आगे हैं मंझधार

मोंगरे की पंखुरियों सी
धवल लग रही हैं निशा
चांदनी ने किया हैं श्रृंगार

आज फिर सरस हुआ हैं
शरद ऋतु का शालीन व्यवहार

किशोर कुमार खोरेन्द्र

बुधवार, 20 नवंबर 2013

718-कह रहा भ्रमर

कह रहा भ्रमर

तुम …धरती के

सरोवर की सुन्दरता हो

हे कमली ...!



गुलाबी .कभी नीली ,तेरी पंखुरी

तुम्हें हुआ क्यों भरम

यह काम नही ..प्रेम परम

यह कहता उतर

अम्बर से

एक भ्रमर

तुम अपनी जमीन की जड़ो पर टिकी रहना

नाल पर मुकुट सा

ताल मे

पात पर

अपनी -खिली रहना

गुंजन करता हूँ मैं लिये

एकांत का मधुर स्वर

जैसे ..गुनगुनाता होऊं …

इस प्रकृति का मूळ प्यारा

तुम्हारे लिये एक गीत हरदम

यह कहता

उतर अम्बर से

मै

एक भ्रमर

तुम स्थिर हो -जल तरंगो कों सहती

मै चंचल उड़ता -जिधर हवा हो बहती

सम्मोहित हो जाता

तुम्हारी परछाई कों भी देख भली

मै

ऐसा ही हूँ एक अली

पर बिठा तुम

अपने सुकुमार अंक

कर लेती किसी सांझ मे मुझे बंद

और तुम्हारी पंखुरीया समेट लेती

अपने सभी अंग

मै तब

प्राण निछावर कर देता

उस मधुयामिनी के संग

फिर

प्रात: खिल जाते तेरे हरेक पंख

पर तेरी आँखों से बहते अश्रु

ओस बूंदों सा नम बन

मुझे बहा ले जाता तब

प्रेम मय जग का मधुर जल

हे कमली

मत कर भरम

यह काम नही

है प्रेम अमर

मै -

कह रहा एक भ्रमर

किशोर

717-"मनुष्य का जीवन "

"मनुष्य का जीवन "
 

तुम्हारी सांसों में
घुला हैं
सुगन्धित पवन
तुम्हारी आँखों में
बसा हैं
विस्तृत गगन
तुम्हारे मन में
जगमगाते हैं
इच्छाओं के अनंत उडु गण
चेतना के निस्तब्ध जगत की
खामोशी से जुड़ी हैं
तुम्हारे ह्रदय की धड़कन
कमल की पंखुरियों सा
खिला खिला हैं
तुम्हारा सुन्दर आनन
गंगा सी एक नदी
तुम्हारी नसों में
बहती हैं पावन
हिमालय की तरह
तुम्हारे इरादे मजबूत हैं
उन्हें पराजित
नहीं कर पायेगी कोई अड़चन
तुम्हारे ही भीतर
गंभीर और सारगर्भित समुद्र हैं
कर लो अमृत मंथन
देख कहाँ पाते हैं हम
स्वयं का
जन्म और मरण
जिसका कभी अंत ना हो
ऐसा हैं
प्रत्येक मनुष्य का जीवन
उड़ते रहो बादलों सा
धूप को छाया में
करो परिवर्तन
या बरस कर
शीतल कर दो भीषण तपन
सुखद और मनोरम हो जाए
ताकि
इस धरती का वातावरण

किशोर कुमार खोरेन्द्र

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

716-"यादो के तिनकों से

"यादो के तिनकों से"

तुम वही हो एक चेहरा

ख्यालों से कहता हूँ अक्सर

जिस पर अधिकार हैं सिर्फ मेरा

व्यतीत हो जायेगा जीवन

अंतिम साँस लेने से पहले

कह दूंगा मन कों

ओंठों पर न आने देना ..

नाम ....तुम्हारा

इस जग में आकर

एक तस्वीर तुम्हारी ..

अपनी आँखों में बसाए

चुपचाप ...चल दूंगा

तुम्हारी यादो के तिनकों से



बनाउंगा नीड़ ...इस जहाँ में

पुनह: एक सुनहरा

किशोर

सोमवार, 18 नवंबर 2013

715-"मेरी आत्मा एक नदी हैं"

"मेरी आत्मा एक नदी हैं"

बिखर जाती हैं जब ज्योत्सना
अम्बर से अप्सरा सी
उतर आती हैं मेरी कल्पना
प्रेम स्नेह ममता और करुणा
के जरिये
देती हैं मुझे वह फिर सांत्वना



लोग कहते हैं
सुकुमार ख़याल को
मेरे मन की आत्म प्रवंचना
नीम सा कितना भी कटु हो
सह लिया करता हूँ
मैं वह आलोचना
इस जहां में कोई भी तो ऐसा नहीं हैं
जो रहे संग सदा
इसलिए मैं नींद में
चुरा लिया करता हूँ रोज
एक खूबसूरत सपना
कोहरे सा प्रगट होकर
सीख लिया हैं ख़्वाबों ने
फिर छटना
मेरी आत्मा एक नदी हैं
रोक नहीं पाता हूँ उसका बहना
किशोर कुमार खोरेन्द्र

muktak

तुम्हारे मन में उठ ना जाये सवाल डरता हूँ
रख सकोगी कब तलक तुम मेरा खयाल डरता हूँ
तेरी रूह में कशिश हैं मेरी रूह में खलिश हैं
तुम्हें खोने का रह ना जाये मलाल डरता हूँ












ह्रदय जो कहता हैं उसे सीख लेता हूँ
मन जो कहता हैं उसी तरह लिख लेता हूँ
तुम्हें ही पढ़ता ,लिखता समझता रहा हूँ
तुमसे इस तरह अकेले में मिल लेता हूँ

किशोर कुमार खोरेन्द्र

714-"मेरे खयाल से "

"मेरे खयाल से "

मेरे लिए तुम
चुटकी भर नमक हो
मेरे जीवन में स्वाद आ गया हैं
मेरे लिए तुम
चम्मच भर शक्कर हो
मेरी दिनचर्या में मिठास आ गया हैं
लेकिन मेरे खयाल से
वियोग में
तुम्हारी आँखों से
छलक आयी अश्रु बूंदें
नमक से अधिक नमकीन होती हैं


मुझे देखते ही
तुम्हारे ओंठों पर
उभर आयी मुस्कराहट
शक्कर से ज्यादा मीठी होती हैं

किशोर कुमार खोरेन्द्र

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

dipawali -03-11-2013

dipawali -03-11-2013



713-"तुम्हें गुनगुनाने लगता हूँ"

"तुम्हें गुनगुनाने लगता हूँ"

वह प्रतिरूप जो
तुम्हारे मन के भीतर रहता हैं
मेरी जान पहचान उसी से हैं
उसी सेबातें कर
मैं कवितायें लिखता हूँ
वही तुम हो
मैं भी जो बाहर से दिखाई देता हूँ
वह नहीं हूँ
मेरे अंतर्मन के अन्दर मेरा
असली रूप रहता हैं
जिस तरह तुम अपने नश्वर तन
चंचल मन से परे हो
उसी तरह मैं भी
धरती और आसमान जहाँ
मिलते से दिखाई देते हैं
उस क्षितिज के उस पार से
तुम्हें पुकारता हूँ........



तुम चाहती हो
की मैं तुम्हारे लिये छंद रचता रहूँ
और तुम
मेरे छंदों से आबद्ध होती रहो
मैं गीत गाता रहूँ
और तुम उसे सुनती रहो
मैं धुन हूँ
तुम नृत्य हो
मैं बांसूरी हूँ
तुम तान हो.
मै और तुम
एक के एकांत में
समाहित हैं
परन्तु
दुनियाँ में अलग अलग
होने का अहसास ही
वह दर्द हैं
जिसके वशीभूत .......
मैं अपने निपट अकेलेपन कों
भुलाने के लिये
तुम्हें गुनगुनाने लगता हूँ

तब तुम्हारे
देह की खुश्बू से
मेरे ह्रदय के कमरे महकने लगते हैं
तुम मेरी आत्मा की देह हो
क्या तुम्हें भी ऐसा लगता हैं
यह रिश्ता शब्दों द्वारा
अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता
हालाँ की
तुम्हें कभी कभी यह भ्रम होता हैं
की मै तुम्हारे बालों कों
गालों कों
छूना चाहता हूँ

बात ऐसी नहीं हैं ...
मैं तुम्हारे निराकार स्वरुप कों
अपनी कल्पना से साकार कर
उसकी निगाहों में
अपनी छवि निहारना चाहता हूँ

एक कवि का प्यार
बाह्य कभी हो ही नहीं सकता
मै तुमसे तुम्हें मांग लूंगा
एक दिन ....देखना

किशोर कुमार खोरेन्द्र

मंगलवार, 5 नवंबर 2013

712-"एक छाँव"

"एक छाँव"




साये की तरह
मैं तुम्हारा पीछा कर रहा हूँ
हो गए हैं बहुत दिवस
व्यतीत हो चुके
न जाने कितने बरस
पर तुम नदी कि तरह
भागती ही जा रही हों
चंचल हैं
तुम्हारे मन का लहर
पल भर के लिए भी ठहरती नहीं हो
मेरे समक्ष
तुम्हे मिली नहीं फुरसत
तुम्हे क्या वह क्षितिज प्रिय हैं
जो अप्राप्य हैं
छूना चाहती हो महत्वाकांक्षा. का
सबसे ऊंचा शिखर
तुम्हारे स्वागत में हर मोड़ पर
खड़ा रहता हूँ
लेकिन तुम
मुझे देखते ही
कोहरे की लकीर सी जाती हो सरक
मैं यह नहीं कहता की
तुम पर मेरा हैं हक़
मैं तो सिर्फ एक छाँव हूँ
मौन का गहन प्रभाव हूँ
कहीं तुम जिंदगी की तरह तो नहीं हो
जिसे कोई नहीं पाया हैं
अब तक समझ
किशोर कुमार खोरेन्द्र

सोमवार, 4 नवंबर 2013

711-"चिर अहसास"

"चिर अहसास"

कहीं  मैं वह तो नहीं हूँ
जो
तुम्हारे घर की  छत पर
कटी हुई पतंग सा आ गिरा था

आँगन में उड़ते उड़ते पहुँचे हुए
एक आवारा पत्ते सा
तुम्हारी शरण में आ दुबका था

एक तिनके सा
तुम्हारी आँखों को चुभ गया था

वर्षा की  बौछार बन
तुम्हारे दामन को भींगा गया था

आईने में  एक चिर परिचित
प्रतिबिम्ब के सदृश्य उभर आया था

या जो

कमरे के  कोने में
तुम्हारी आशंकाओं  के जालों सा
फ़ैल गया था

तुम्हें काफी दूर से
कोयल की मधुर आवाज की  तरह
लगा था

या जिसे सरोवर में खिल आया
कमल समझकर
तुमने तोड़ लिया था
जिसे तुमने जलेबी के रस से नम
अखबार के टुकड़े मेँ
छपी हुई कविता सा
पढ़कर कंठस्थ  कर लिया था

मैं हर वही  यादगार लम्हा हूँ
जो तुम्हे पसंद हैं
कभी आकाश में
चहल कदमी करते हुए
बादलों का समूह हूँ
जिनके द्वारा निर्मित
विभिन्न आकर्षक  आकृतियों को
निहारते हुए
तुम स्व्यं  को विस्मृत कर जाती हो
कभी न लौट कर आनेवाला
नदी का प्रवाह हूँ
जिसकी वजह  से तुम

मन मसोस कर रह जाती हो

ख़ैर मैं  जो भी था
अब तुमने
एक कोरे कागज़ के समान
अपने मन के दराज  में
मुझे सुरक्षित रख लिया हैं
वक्त मिलने पर
अपनी इच्छा अनुसार पढ़ लेती हो
यह सोचकर की
मुझमे वही लिखा हैं
जो तुम्हारे हृदय  में  हैं
हालाँ कि मैं
एक कोरा कागज़ ही हूँ
कहीं मैं
वह इंतज़ार तो नहीं हूँ
जिसमे आगंतुक का
न कोई चेहरा होता हैं न नाम
जिसमे होता हैं बस
बिछड़े होने का चिर अहसास

किशोर कुमार खोरेन्द्र

रविवार, 3 नवंबर 2013

710-माहिया

माहिया

सुखद मलय शीतल हैं
भ्रमण सुबह भाये
सुमन महक विलय हुआ

सपना हैं या माया
नज़र परख लेगें
तू छू मत यह छाया

अच्छी होगी नीयत
धोखा मत देना
उसकी हैं कीमत

छल बल से पाया जय
सत पथ पर चलना
समझों इसका आशय

किशोर

709-"प्रकृति "

"प्रकृति "

बीज में छिपी होती हैं
मजबूत जड़ ,हरी पत्तियाँ और टहनी
बूंद में समाहित हैं
वीरान तट ,चंचल लहरें और नदिया गहरी
रज कण में चलती हैं
वे पगडंडियाँ जो ,कभी न थकी न ठहरी
तारों को पता हैं
अतीत की सारी बातें साहसी और सहमी
मन के भीतर हैं
चेतना का हर स्तर उच्चतम और सतही
नियम शाश्वत हैं
सूर्योदय ,सूर्यास्त और चन्द्रमा की आभा
कभी बड़ती तो कभी हैं घटती




यही हैं संसार की नियति
मछली जल से बाहर
नहीं हैं रहती
दुःख हो या ख़ुशी
आँसू की बूंदे नमकीन ही हैं लगती
विचार के अनुरूप नहीं होता जीवन
जन्म और मृत्यु से परे हैं
प्रकृति की रहस्यमयी सहमति
किशोर कुमार खोरेन्द्र

शनिवार, 2 नवंबर 2013

708-"एक नन्ही चिड़िया"

"एक नन्ही चिड़िया"

 

यह कैसा है महावृत्त
जो है अपरिमित
जिसमें व्यास है न त्रिज्या
उसे छूना जितना चाहूँ
उसकी परिधि भी लगती है
तब क्षितिज सी मिथ्या
बिना केंद्र बिंदु के
किस प्रकार से -
खींची है किसने
बिना आकार की
यह गोलमाल  दुनियाँ
न ओर का पता, न छोर का
फिर भी -
आकाश को भी
अपने परों से नाप रही है
हर मन के घोसलें  से .उड़कर
एक नन्ही चिड़िया
किशोर कुमार खोरेन्द्र

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

707-mahiya

मेरा मन तेरा घर
रहना आजीवन
चिंता ना कोई डर


रखना सच से वास्ता
जीतो या हारो
जग में पालो रास्ता



एक अच्छा हो पाठक
छन्दों की रचना
बनता लेखक साधक



लौटा कर दो बचपन
हो मनचाहा सब
होने ना दूँ अनबन



kishor

706-मुक्तक

जब भी मैं जीता कोई हार गया था
कड़ी मेहनत से बाजी मार गया था
भ्रमवश मुझे अहंकार हो गया
था
 जाना सबको हैं कहा कई बार गया था



वह चंदा सी खूबसूरत हैं पर उसमें चमक ज्यादा हैं
वह फूलों सी सुकुमार हैं पर उसमें महक ज्यादा हैं
कलाई में रंगीन चूड़ियाँ हैं पर उसमे खनक ज्यादा हैं
मिलन असम्भव हैं मेरे मन में कसक ज्यादा हैं


तुम्हारे शहर से रेल सा गुजरता हूँ अच्छा लगता हैं
तुम्हारा जिक्र हो तो उसे सुनता हूँ अच्छा लगता हैं
सपनों मेंख्यालों में तुम्हे बुनता हूँ
तुम्हारे पद चिन्हों पर रुकता हूँ अच्छा लगता हैं

तुम्हे दूर से देखा हूँ परिचय नहीं हैं
अनदेखा कर दो मुझे शिकायत नहीं हैं
रुबरु न मिलों इस पर विस्मय नहीं हैं
इश्क़ एक जूनून हैं यह अभिनय नहीं हैं



 इस जहाँ में कोई तो होगा एक शख्स
मेरे जैसा 
मन दर्पण में जिसके होगा एक काल्पनिक अक्स मेरे जैसा 
मृदु कविताओं से जिसे होगा बेहद इश्क़
तन्हाई में जीने की आदत होगी जिसे बेशक
मेरे जैसा 

 वो शहर वो गलियां वो मोड़ वह उपवन
मुझे याद हैं
 प्यार की मीठी बूंदों से भींगी थी नस नस वह सावन मुझे याद हैं
तुम्हारी रेशमी जुल्फें सुन्दर रुख मृग से दो नयन
अगले जन्म में फिर मिलने का दिया था वह वचन
मुझे याद हैं



 

705-"नि:शब्द "

"नि:शब्द "

किसी शब्द के माथे पर
बिंदु सी बिंदी लगाना
भूल जाता हूँ
तो बिंदु नाराज हो जाती हैं
अक्षर कहते हैं हमें जोड़ो
शब्द कहते हैं हमें बोलो
वाक्य कहते हैं हमें पढ़ों
छंद कहते है हमें गाओ
शरीर रूपी बोगी में
बैठकर मेरा एकाकी मन
अपनी आत्मकथा लिख रहा हैं
जो कभी खत्म नहीं होगी
इस कथा में
न अल्प विराम हैं न पूर्ण विराम हैं
बिना पटरियों के ही
मानों ख्यालों की रेल
अबाध गति से दौड़ रही हैं
लेकिन
तुम्हारी मुस्कराहट को
तुम्हारी आंखों में समाये
मौन को
मेरा मन नहीं लिख पाता हैं
सौभग्य की लहरों के आँचल की तरह
तुम मेरे करीब आकर लौट जाती हो
जाते हुए आँचल के छोर को मैं
कहाँ पकड़ पाता हूँ
असहाय सा बेबस सा
निर्मम वक्त के समक्ष
निरुत्तर हो जाता हूँ
अपने मन से भी ऊपर
परे
उसका नियंत्रक
"मैं "जो हूँ
इसलिए मेरी तरह
वे सारे अक्षर
वे सभी शब्द
वे लंबे वाक्य
वे मधुर छंद
समुद्र की तरह हाहाकार करता
हुआ सा मेरा एकाकी मन
सब चुप हो जाते हैं
नि:शब्द हो जाते हैं
स्तब्ध हो जाते हैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र