मंगलवार, 29 अक्तूबर 2013

704-"मुझ तट के लिए"

"मुझ तट के लिए"


दर्द के समुद्र की

गर्जनाओं से बने

मौन की तरह ..

तुम चुप हो



रेत के टीलों से बने शहरों से

निर्मित ...

एक् चट्टान से सहारा लेकर

विश्राम करती हुई

मेरी रीढ़ की नसों मे

तुम ...

स्मरण की प्रवाहित

झंकृत धुन हो



युगों के विरह की

अग्नि मे तपकर

एकत्रित ईटो से बना

मेरे पदार्पण के इंतज़ार मे

अकेले खड़े .. तुम

एकांत का सुदृढ़ पुल हो



शिखर पर जमी बर्फ सा

न तुम पिघलते हो

न बहकर मेरे करीब से गुजरते हो

जल रहित अदृश्य से हो तुम

लेकीन



मुझ तट के लिए

बहती हुई नदी होने के

अहसास से परिपूर्ण हो

किशोर

रविवार, 27 अक्तूबर 2013

703-"सपनो के यथार्थ ने"

"सपनो के यथार्थ ने"

सपनो के यथार्थ ने

मुझसे पूछा -

क्या तुम मेरे पास ही रहोगे

मैंने कहा -

तुम्हें देखते देखते

मै स्वप्न बन गया हूँ

तुम्हारा मन

तुम्हारे शब्द बन गया हूँ

तुम पढ़ सकती हो मुझे

अपने सौन्दर्य की आत्मा कों

निहार सकती हो मुझमे

लेकीन मै तुम्हारी आत्मा की देह तक

 पहुँच नही सकता



तुम्हारे ध्यान की रोशनी मुझे

आत्मसात नही कर सकती

 क्योंकि प्रेम सतत वियोग  है

तभी तक जीवन की चेतना में

मै तुम्हें जीवित रख पाऊंगा

तुम्हें तलाश लेने के

पश्चात भी

तुम्हें खोये रहने की

मुझमे लगातार पीड़ा है

केवल मेरे पास

मेरी आँखे बंद हो

या खुली .........

हर परिस्थिति  में

तुम्हारे परछाई की साकार देह की

महक है मेरे पास

केवल ..महक

किशोर  कुमार खोरेन्द्र

मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

702- माहिया

 माहिया
हुआ ना कर बेज़ार
रहता आया हैं
आपका ही इंतज़ार


बाहर सब कुछ माया 
मन की सुन्दरता 
न कभी है भरमाया


नर मय हैं नारायण
रावण असत्य हैं
रोज पढ़ें रामायण

उड़ जाती हैं रंगत
रहना सब मिलकर
करना अच्छी संगत


कुसंग साथ नहीं हो
जहरीला हैं वह 
अमृत होता सुसंग


ना हैं कोई दूजा
बेजान संग हैं

करता तेरी पूजा



अमर रहेगी आत्मा 
नश्वर हैं काया 
ह्रदय  me परमात्मा 
किशोर

मंगलवार, 15 अक्तूबर 2013

701-"महफूज़ "

"महफूज़ "
आओं बेतकल्लुफ़  हो जाए
न कोई बंदिश हो
न ही कोई तखल्लुफ़  हो पाए
उतार कर देहरूपी परहन
छोड़कर मन के अलंकृत प्रलोभन
रूह की पवित्र नदी में
गहरे तक डूब जाए
प्रेम पथ में साथ साथ
इस तरह चले कि
तुम्हारे आँचल को
मेरी कमीज़ कभी छू न पाए
ताकि
ऐसा कभी न हो कि
एक दूसरे   से
हम दोनों रूठ जाए
जो तुम कहना चाहती हो
तुम्हारी जुबाँ तक आकर
न रुक जाए
आओं बेतकल्लुफ़  हो जाए

न मैं दिखावा करूँ
न तुम करना संकोच
खामोश रहते रहते
ऐसा न हो एक दिन
हम विमुख  हो जाए
तरीकत  के लिए
जरुरी हैं कि
अंतर्मन की सभी रहस्यमयी गाँठें 
एक दूसरे के समक्ष  खुल जाए
समर्पण इस कदर हो कि
हम एकाकार ,एकरूप हो जाए

आओं बेतकल्लुफ़  हो जाए

तुम्हारी हथेली की गहरी लकीरों में
मेरी हथेली की उथली लकीरे
गुम  हो जाए
तुम्हारी आँखों में मेरा अक्स दिखे
मेरी निगाहों में ,हे महरुख ....!


तेरा ही नूर नज़र आए
न उल्फ़त घटे ,न कशिश कम हो
क्यों न
हिज्र फिर से बरसों तक
बदस्तूर जारी रह जाए
तुम कस्तूरी हो ,मैं चन्दन हूँ
दुनियाँ  के इस जंगल में
महक हमारी सदा
महफ़ूज  रह जाए
आओं बेतकल्लुफ़  हो जाए

@किशोर कुमार खोरेन्द्र
{ बेतकल्लुफ =स्वाभविक ,अंतरंग ,बंदिश =बंधन ,तखल्लुफ़ =प्रतिज्ञा भंग होना ,
तरीकत =आत्म शुददी ,हिज्र =वियोग ,बदस्तूर =यथावत , महरुख =चन्द्रमुखी ,या नायिका महफूज =सुरक्षित }

सोमवार, 14 अक्तूबर 2013

700-"टूट कर बिखरे हुए"

"टूट कर बिखरे हुए"


आईने में जमी धूल की तरह तुम मुझे

साफ़ कर देना चाहती हो

पानी में तैरते तिनकों की तरह तुम मुझे

हिलोर कर

अलग कर देना चाहती हो

पन्नों पर अंकित मेरी कविता के शब्दों कों

मिटा कर

उन्हें हाशिये पर रखना चाहती हो

तुम ..मुझे ...सूखी हुई गुलाब की पंखुरियों की तरह

अपने मन के रुमाल में बांधकर

  विसर्जित कर देना चाहती हो

तुम चाहती हो कि....




मेरा नाम या कोई निशाँ

तुम्हारे जीवन की जुबान पर शेष न रह जाए

मै खुद कों आज

अजनबी और अवहेलित सा

महसूस कर रहा हूँ

मेरे स्नेह और प्रेम कों

तुमने खुबसूरत बादलों के आकाश से

काँटों से भरी जमीन पर उतार दिया .हैं .

टूट कर बिखरे हुए कांच  के  टुकड़े

मुझे चुभ रहें हैं

मै तुम्हारे लिये पहले भी कुछ नहीं था

और आज भी कुछ नहीं हूँ

शायद अब तुम मेरे न होने पर

अपना  स्वच्छ  चेहरा

दर्पण में निहार सको

किशोर  कुमार खोरेन्द्र

रविवार, 13 अक्तूबर 2013

699-"सौन्दर्य "

"सौन्दर्य "

फूल जब तक रहा खिला

सुगंध उससे मुझे मिला

रंग में उसके दिन भर

मन मेरा उलझा रहा

मोहित कर गयी मुझे

उसकी कोमल पंखुरिया 



कभी

गुनगुनाता हुआ आता

हैं मधुप

कभी

कलियों कों

चूम लेती हैं तितलिया

प्यार उनका निहारने

फुनगी पर

चुपचाप बैठी हैं

देखो एक ढीट चिड़िया

पवन के झोंकों के विरुद्ध

संघर्ष करता हुआ

यह पुष्प ,वृंत पर

दृढ़ता से हैं रहा टिका

ठीक साँझ होने से पहेले

जड़ों के करीब

क्षत विक्षत मुझे वह दिखा

न फूल ,न उसकी पंखुरिया

न वे मधूप ,न वे तितलिया

न वह धूप ,न वह चिड़िया

जान पाए कि...

कयों एकाएक

अश्रुपूरित हो गयी हैं

सौन्दर्य पर मुग्ध थी

जो ..मेरी अँखियाँ



किशोर

शनिवार, 12 अक्तूबर 2013

698-काँच का मनुष्य

काँच का मनुष्य


तुम मुझे
अपने आंसुओं के पवित्र जल से रोज नहलाती हो
तुम मुझे
हिरदय के अपने स्व्क्छ रूमाल से
साफ़ करती हो

मेरे लिए यही
प्राथना करती हो
हे प्रभू
इसे टूटने मत देना


फिर दुनिया के स्वागत कक्ष मे रख देती हो

यह कहते हुए
कि
जब लोग आये
तब
अपने दिल के आईने मे
रखी मेरी तस्वीर मत दिखा देना

मुझसे अनजान बने रहना
मुझे देखना मत
मेरे करीब मत आना
मेरा नाम मत पुकारना

लेकीन मै तो
आर -पार दिखाई देने वाला
कांच का मनुष्य हूँ

उसके आंसू
मेरी आँखों की दुनियाँ मे सुरक्षित है
उसके स्पर्श के हाथो की कोमलता
मुझसे
देह की तरह चिपकी हुई है

उसकी शाश्वत कामना है -
मै साबूत रहूँ

और वह
मेरे पारदर्शी शीशे की
अटूट आत्मा के दर्पण मे
अपनी विभिन्न परछाईयों कों
निहारती रहें -मुक्त और स्वतंत्र समझ

पर मै
नाजूक कांच का मनुष्य
उसके प्यार और सौन्दर्य की
आंच से
कभी भी
टूट कर बिखर सकता हू

और स्वागत कक्ष मे
उपस्थित निगाहों कों ...
अपने प्रेम से घायल
व्यक्तित्व के प्रखर टुकडो से -
चूभ सकता हूँ

kishor kumar khorendra

बालार्क'

Hind Yugm Prakashan's photo.
आज से हम रश्मि प्रभा (Rashmi Prabha) और किशोर कुमार खोरेन्द्र (Kavi Kishor Kumar Khorendra) के संपादन में आने वाले 30 कवियों की चुनिंदा कविताओं के संग्रह 'बालार्क' की प्रीबुकिंग शुरू कर रहे हैं। किताब 19 अक्टूबर 2013 से से डिलीवरी के लिए तैयार रहेगी। प्रीबुकिंग पर अधिकाधिक छूट दी जा रही है।

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shbd sanvaad







gulmohar




शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

697-"जीवन "

"जीवन "

पक रही हैं धान की फसल
खेतों में जैसे बिछ गया हैं
दूर दूर तक स्वर्णिम आँचल
कच्ची बालियों के ऊपर बैठी
एक नन्हीं चिड़ियाँ

सोच रही हैं हवा के झोंकों में
क्यों नहीं हैं हलचल
मेड़ों पर ठहरे हुए से पदचिन्ह
भयभीत हैं
गीली मिटटी में कहीं
उनके पाँव भी न जाए फिसल

छोटे छोटे गड्डों में
समाये हुए हैं
अंबर के भीमकाय बादल
तालाब की सतह से
शीश उठाये झांक रहे हैं
रह रह कर
खिले हुए नीलकमल
बबूल की शाखों पर मौसम ने
हल्दी सा छिड़क दिया हैं
पीली पंखुरियां सुकोमल
धूप में तपकर
सूरजमुखी की सुन्दरता
और गयी हैं निखर


पलाश की हथेली सी पत्तियों पर
सौभाग्य की अमिट रेखाएँ
आयी हैं उभर 
 
अतिथि की तरह अचानक
टपक पड़ता हैं आकाश के छत से
बूंद बूंद भर जल
सुबह सुबह कोहरे की
घनी परतों को भेदकर
सूरज भी नहीं पाता हैं
आजकल निकल


नदी की
लहराती मंथर गति को देखकर
चट्टानों का
दिल भी जाता हैं मचल
ऐसे में परछाईयों को भी
एक दूजे से प्यार हो गया हैं
उनका ह्रदय भी हैं विकल


भोर से गए पंछी आये या नहीं
चिंतित संध्या के माथे पर हैं बल
मनुष्य मनुष्य से
करते हैं अक्सर छल
प्रकृति तो हैं
सीधी साधी और सरल
अनुशासित और शाश्वत हैं
उसके नियम अटल
दुःख और सुख के बराबर बराबर
अनुभवों में विभाजित हैं जीवन
किशोर कुमार खोरेन्द्र

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2013

696-"कंठस्थ "

"कंठस्थ "

तुम
मेरा वह चश्मा हो
जिसके बिना
मैं देख नहीं सकता
तुम
मेरी वह कलम हो
जिसके बिना
मैं लिख नहीं सकता
तुम
मेरी वह डायरी हो
जिसके पन्नों में
मैं अक्षरस: अंकित रहता हूँ
तुम
चाय में शक्कर की तरह
घुली हुई रहती हो
मेरे मन के खेतों में
गन्ने की तरह उगी हुई रहती हो
गमलों में तुम्हे
मैं प्रतिदिन खिलते हुए देखता हूँ
तुम शीतकालीन गुनगुनी धूप हो
शरद ऋतू की मधुर  ज्योत्सना हो
तुम्हारे कारण  मेरे जीवन में
इसलिए
गर्दिश का अँधेरा टिक नहीं पाता
तुम्हारी उदारता से अभिभूत
मेरे अंतर्मन का
तुम वह खूबसूरत हिस्सा हो
जिसकी वजह से
पतझड़ के मौसम का
मुझ पर दुष्प्रभाव नहीं पड़ पाता
जेठ की भीषण गर्मी
मुझे झुलसा नहीं पाती
रास्ते में बिखरे हुए
कांच के टुकड़ों
या
बबूल के नुकीले काँटों से
मेरे पाँव सुरक्षित बच  जाया करते हैं
तुम मेरे लिए
सारगर्भित विचार हो
सकारात्मक चिंतन हो
जिनसे मुझे यह बोध हुआ हैं कि
मैं जन्म और मत्यु से परे हूँ
तुम कभी न समाप्त होने वाली
मेरी शाश्वत चेतना हो
गति हो ,… प्रवाह  हो
इसीलिए मैं
कमल के पुष्पों से सुसज्जित
सरोवर की तरह प्रफुल्लित रहता  हूँ 

तुम स्वर हो
तुम व्यंजन हो
और मैं उनसे जुड़कर बना
एक सार्थक शब्द हूँ
मुझे.,तुम .
महावाक्य की तरह कंठस्थ  हो
अटूट प्रेम के अविरल भाव की तरह
तुम्हें
मेरे ह्रदय ने आत्मसात कर लिया हैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र

बालार्क'

रविवार, 6 अक्तूबर 2013

695-07-10-1954 से 07-10-2013 तक

07-10-1954  से   07-10-2013 तक 



















आज मेरा ५९ वाँ  जन्म दिवस हैं 
आरम्भ के छ: वर्षों  का ज्ञान नहीं हैं 
पहली से पांचवीं  तक भिलाई छत्तीसगढ़ में पढ़ा 
छठवीं से ग्यारहवीं तक रायपुर  छ्ग़.  में पढ़ा 
बी ए pratham  से अंतिम तक रायपुर में पढ़ा 

१४साल तक पढाई करने के पश्चात पत्रकारिता ,टायपिंग 
की कक्षा में गया एक वर्ष तक 
फिर बैंक की परीक्षा की तैयारी किया 

18-10 -77 से मैं प्रतिस्पर्धा में  उतीर्ण होकर  भारतीय स्टेट बैंक में 
कैशियर बन गया 
18-10-84 से फिर मेरी पदोन्नति  हुई और मैं अधिकारी बन गया 

दल्ली राजहरा ,बालकों ,सक्ती ,बरमकेला ,बलौदा बाजार ,नवापारा राजिम ,
ताड़ोकी ,अंतागढ़ ,बागबाहरा। .इत्यादि शाखाओं में  पदस्थ रहा 

ब्रांच मैनेजर रहते हुए मैं  18-04-2006 में बैंक से वी आर एस लेकर सेवा निवृत हुआ 

तब  से अपने जीवन की महत्वपूर्ण अभिलाषा याने काव्य सृजन में रत हूँ 

किताबें पढ़ने का भी मुझे शौक हैं 

वर्तमान में पिता जी का देहांत  पिछले साल हुआ ,माँ हैं ,पत्नी हैं ,दो बेटे हैं एक पुत्री हैं 
एक दामाद हैं ,एक नाती हैं ,सास ससुर हैं 

raipur  में रहता हूँ ,मुंगेली में मेरा गाँव हैं वहां अक्सर जाया करता हूँ ,माँ  वही  रहती हैं 

उनकी उम्र पच्यासी साल की हैं 




मेरी धर्म पत्नी शिव की पुजारन हैं ,वह विदुषी हैं ,वह मुक्त आत्मा हैं ,
मेरे घर के आँगन में शिव जी का मंदिर हैं 



नेट पर मेरा प्रवेश अक्टूबर दो हज़ार आठ से हुआ हैं तभी से  यह ब्लॉग बनाया हैं 

आरकूट से फिर मैं फेसबुक तक पहुंचा ,इस बीच बहुत से मित्रों का प्रोत्साहन मुझे 
मेरे लेखन के लिए मिला 

मेरे लिए प्रक्रति ,ईश्वर ,कल्पना  =तीनों का मतलब एक ही हैं 
इन्हें अपनी कविताओं में एक साथ प्रस्तुत कर मैं चैतन्य हो उठता हूँ 

बचपन से मैं प्राय: अकेला ही रहता आ रहा हूँ ,किताबे मेरे दोस्त रहे हैं 
धरती में 
वृक्ष ,नदियाँ ,पर्वत 
और 
आकाश में 
तारों के समूह ,चाँद ,सूरज 
मुझे बहुत प्रिय हैं 

देह से ,मन से परे 
स्वयं को मैं एक चेतन के रूप में इस कायनात में उपस्थित पाता  हूँ 
मैं आस्तिक हूँ 
मैं अंतर्मुखी हूँ 
मैं अत्यंत संवेदनशील हूँ 

रंग बिरंगें बादलों से आच्छादित नभ ,सुबह का समुद्रीय तट ,
सागौन ,साल ,के वृक्षों से भरे वन ,पर्वतों की ऊँची चोटीयाँ 
पगडंडियाँ ,घाटी की or  चढ़ती हुई घुमावदार सड़कें ,
मुझे लिखने की प्रेरणा देते हैं 
मैं विरह की अपेक्षा मिलन के सौन्दर्य का उपासक हूँ 



किशोर कुमार खोरेन्द्र 
रायपुर 
सात अक्टूबर दो हजार तेरह 

शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2013

694-" तकदीर"

" तकदीर"

पढ़ता हूँ
कभी तुम्हारी ..तहरीर
देखता हूँ
कभी तुम्हारी तस्वीर
सुनता हूँ
कभी तुम्हारी तकरीर
यही तो हैं .. मेरी तकदीर
तुम्हारे दीदार के
अलावा
यही मुझे हुआ हैं हासिल
किशोर




गुरुवार, 3 अक्तूबर 2013

693-"वजूद"

"वजूद"

मैं कायदा हूँ या तू रिवाज हैं
मेरे मन में यहीं कशमकश हैं

तुम हो तो मेरा वजूद हैं
साथ मेरे ,तेरा अक्स हैं 


प्यार करना गुनाह नहीं हैं
प्रतिबंध मगर सख्त हैं

यूँ तो मुझे कोई गम नहीं हैं 
मेरी आँखों में फिर भी अश्क हैं

आबे रवा सा तेरा हुश्न हैं
आबे सियाह सा मेरा इश्क हैं

किशोर कुमार खोरेन्द्र

{आबे रवा =बहता पानी
आबे सियाह =गहरा पानी }
Unlike ·  · Promote · 

692-"एक रिश्ता"

"एक रिश्ता"

खुशमिजाज़ हूँ ,खुशनुमा हूँ 
बस तुम से ही मिलता हूँ 

खुश्बू  हूँ ,खुशरंग हूँ 
मैं  कहाँ बिकता हूँ 

 तुम्हारे मौन को पढ़ता हूँ 
उसे ही तो रोज लिखता हूँ 

साया सा  साथ रहता हूँ 
अनाम सा एक रिश्ता हूँ 

तुम्हारे मन का 
खुशगुवार हिस्सा  हूँ 
कभी नज्म तो 
कभी एक किस्सा हूँ 

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

691-"सौन्दर्य"

"सौन्दर्य"
तुम्हारे मन के
सौन्दर्य पर मैं हूँ मोहित
मेरे ह्रदय की घाटियों कों
सूर्योदय सा ...
तुम ही करती हो सुशोभित



यदि तुम यह जान भी जाओ कि
मैं तुमसे ही हूँ आकर्षित
तुम मुझसे
कभी नाराज न होना
क्योंकि मेरी
हर बात सदा रहेगी
तुम्हारे आंतरिक रूप की
प्रशंसा पर ही केन्द्रित

कनेर के पीले
गुलाब के गुलाबी
गुडहल के लाल
मोंगरे के दुधिया
और सदाबहार के फूलों की तरह
तुम मेरे मन के
उपवन में जो रहती हो मुकुलित

इस जग में कोई भी किसी के सदा
नहीं रहा सकता हैं समीप
इसलिए
मैं तुम्हे अपने ख्यालों में
अपनी कल्पनाओं के रंग से
कर लिया करता हूँ चित्रित
किशोर