शनिवार, 4 मई 2013

637-स्पष्टीकरण"

स्पष्टीकरण"

तुमसे दूर हो जाने के लिए
मैं क्या दूँ स्पष्टीकरण
हालाकिं
दर्द बहुत हुआ था सीने मे उस वक्त
एकाएक घेर गया था तब
गहन सूनेपन को लिए हुए सा
एक शून्य सा वातावरण

तुम पर लिखते रहा था कवितायें
शब्दों के रंग से मैंने किया था तुम्हारे
अदृश्य चेतन का चित्रण
यह सोचकर की ऐसा भी हो सकता हैं
की कोई मेरे लेखन से ऊब जाए ....?
या मुझमे ही कोई दोष हो ..?
उस खिन्न समय का
आज किस तरह से प्रस्तुत करूँ विवरण

फिर मैंने अपने क्षुब्ध मन को मना कर
चुपचाप कर लिया था उस उदास से मन को वरण
फिर भी तुम्हे भूल नहीं पाया
तुमसे अलग रह कर भी
मन ही मन
तुम्हारे पास ही रहा अकारण

हम क्यों किसी को पसंद करते हैं
मनुष्य जान नहीं पाया हैं
अब तक इसका कारण
जब भी करता हूँ काव्य का सृजन
समृति पटल पर तुम आ जाती हो सम्मुख
और करने लगता हूँ तुम्हारे ही सौन्दर्य का वरनन

मानों तुम्हारा स्मरण
कर गया ho मुझ पर कोई सम्मोहन
हैं न मधुर यह प्रकरण
तुमसे दूर हो जाने के लिए
मैं क्या दूँ स्पष्टीकरण
हालाकिं
दर्द बहुत हुआ था सीने मे उस वक्त
एकाएक घेर गया था तब
गहन सूनेपन को लिए हुए सा
एक शून्य सा वातावरण
*किशोर