रविवार, 28 अप्रैल 2013

636-मेरे ह्रदय की सात्विक भावना "


मेरे ह्रदय की सात्विक भावना "
तुम जितना करती हो
मेरे काव्य की सराहना
उतनी ही ज्यादा पवित्र हो जाती है
मेरे ह्रदय की सात्विक भावना
न तुम्हारे सुघड़ तन की ,
न ही मेरे कलुषित मन की
मुझे स्मृति अब रहती हैं
तुम्हारी रूह से मेरी रूह का
हो गया हैं ..जब से सामना
विरह से ही हुआ था आरम्भ
विरह मे ही होगा अंत
प्रेम में मिलन की ....
कहाँ हैं संभावना
तुम्हारी सुनहरी यादों की लौ को धारण किये


दीपक सा निरंतर जलता रहूँगा
तुम्हारे वियोग के ख्याल में निमग्न
अगरबत्तियों सा सुलगता रहूंगा
आकर सपनों में मुझे जो इन्द्रधनुष सौप गयी हो
उसके सातो रंगों को लिए फूलों सा खिलता रहूंगा
तुम्हारे सम्मुख बस यही हैं
मेरे मन की सच्ची मनोकामना
तुम साकार हो या निराकार हो
इस बात से मेरा कोई सरोकार नहीं हें
प्रेम के अतिरिक्त भला और क्या था मुझे जानना
न साध्य हैं ,न साधन हैं ....
न शेष रह गयी है कोई साधना
करता हूँ सिर्फ तुम्हारी ही आराधना
तुम जितना करती हो
मेरे काव्य की सराहना
उतनी ही ज्यादा पवित्र हो जाती है
मेरे ह्रदय की सात्विक भावना
*किशोर कुमार खोरेन्द्र

रविवार, 14 अप्रैल 2013

635-"प्रेम है सात्विक चरित्र का विस्तार"


"प्रेम है सात्विक चरित्र का विस्तार"
 
बादलों की तरह
मन में उमड़ आते है मृदु भाव
प्रेम करना मनुष्य का हैं स्वभाव

उठने लगते हैं भीतर शुभ विचार
प्रेम जीवन का है आधार



खिलते हैं सुमन
उपवन मे यही सोचकर
कोई तोड़ेगा नहीं हमें आगे बढ़कर
निज के व्यैक्तित्व की
स्वतंत्रता का होता हैं आभास
प्रेम है सात्विक चरित्र का विस्तार

याद में किसी के
खो जाने की होती है आश
जब जब आता हैं मधुमाश
रेशम के धागों के सदृश्य
होता हैं प्रणय पाश

प्रेम जीवन का हैं सार
प्रेम जीवन का है आधार

किशोर

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

634-मेरे दोस्त ...






मेरे दोस्त ...
समझो मुझे
कि-
मैं हूँ एक किताब

मुझे
इस तरह
लेकिन पढ़ना
मुझमे लिखी कहानी
चलती रहे
अंतिम पन्ना कभी न आ पाए
इस बात का अपने
मन के ख्यालों में रखना हिसाब 


कुछ पृष्ठ मुड़े होंगे
उन्हें ठीक कर दिया करना
कुछ पत्ते
कोरे मिल जाया करेंगे
उनमें लिख दिया करना
अपने विचार

आखिर तक मैं
रहूंगा तुम्हारे लिए
एक किस्सा
मेरी कहानियों को
बना न लेना कभी
अपने अहसासों का
कोई हिस्सा
मैं विसाल नहीं
तुम्हारी जिंदगी में मैं हूँ फ़िराक

मेरे जीवन का तम भी उसमे होगा
कही कही पर
जलता हुआ मिलेगा तुम्हे चिराग़
तटस्थ रहना
न मेरे साथ होना
न हो जाना कभी मेरे खिलाफ

{किशोर }
विसाल =मिलन
फिराक =विरह

633-तुम छूटी हुई वह एक बिंदु हो


तुम छूटी हुई वह एक बिंदु हो
जिसके बिना
पूरी कविता मुझे अधूरी सी लगती हैं
तुम गायब वह एक सरस पृष्ट हो
जिसके बिना


सम्पूर्ण किताब पढ़कर भी
मैं असंतुष्ट रह जाता हूँ
किसी चौराहे पर ..
बरसों पुराने किसी वृक्ष के
नदारद हो जाने पर भी
जैसे उसके होने का अहसास
मेरे मन में ऊगा हुआ रहता हैं
बिलकूल उसी तरह से
तुम मुझे याद रहती हो
मेरे लिए तुम इंजिन हो
और मैं ..अनाथ से खड़े रेल की बोगियों की तरह
तुम्हारा इंतज़ार करता रहता हूँ
बहुत दिनों से मैंने नीलकंठ को
तार पर बैठे हुए नहीं देखा हैं
आँखे बंद कर
तुमसे मन ही मन
कुछ कहे हुए काफी दिन हो गए हैं
आज की सुबह का अखबार भी
मेरी आँखों से हुई आंसूओं की
हल्की बूंदाबांदी से भींग गया हैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र

632-तुम्हारी एक इंच मीठी मुस्कान"


तुम्हारी एक इंच मीठी मुस्कान"

इस जीवन में
आते आते कितने आ गए हम तुम पास
कभी कभी लगता हैं
बेतरतीब सी मेरी चाहत की घाटियों ने
छू लिया हो तुम्हारे सतरंगी आँचल सा आकाश
ज्ञात नहीं ..जन्म से पूर्व हम दोनों कहाँ करते थे निवास
और
होगी भी या नहीं तुमसे मृत्यु के पश्चात
मेरी मुलाक़ात
लेकिन वर्तमान की गहन ख़ामोशी में
सुनता हूँ मैं तुम्हारी ही मधुर आवाज


मेरी आँखों के नमकीन जल में
फ़ैल जाती हैं
तुम्हारी एक इंच मीठी मुस्कान
ठगा सा रह जाता हूँ
मैं तुम्हारी तस्वीर को निहारता हुआ
मानों अभी अभी हुई हो
तुमसे मेरी प्रगाढ जान पहचान
नयी सी लगती हो हर बार
जब तुम करती हो साँझ सा श्रृंगार
मेरे हर खाली क्षणों
को तुम अमृत से भर जाती हो
प्यार का देकर मधूर अहसास
इस जीवन में
आते आते कितने आ गए हम तुम पास
किशोर

631-"मेरी यात्रा जारी है"

"मेरी यात्रा जारी है"

 

पीछे छूटे हुए .
उन सारे मील के पत्थरों का शुक्रिया
उनके पास से गुज़रते हुए हर बार
मुझे मंजिल के करीब होने का अहसास हुआ था

उन सभी बादलों को धन्यवाद
जिनके विभिन्न रूपों को देखते हुए
यात्रा में मुझे दूरी का आभास ही नहीं हुआ

राह में खड़े उन समस्त वृक्षों को सलाम
जिनकी झुकी हुई टहनियों
के स्पर्श से मुझे महसूस हुआ की
कोई तो है जो मेरे आसपास हैं

खिले हुए कमल से भरे हुए
उन सरोवरों को बहुत बहुत प्यार
जिनके निकट आते ही
मेरी थकन भाग जाया करती थी

जीवन के सफ़र में
इसलिए मैं अकेला कभी नहीं रहा
मेरी यात्रा जारी है
आगे भी इसी तरह मेरे नैसर्गिक मित्रो .
मेरा इसी तरह साथ निभाना

किशोर

630-"तुम हो मेरे प्रियतम "


"तुम हो मेरे प्रियतम "

काँटों की लिए चुभन
आशाओं के उपवन में
खिलते है सुमन



जल बूंदों से भरे होते हैं
नभ में उड़ते हुए बादल
रेगिस्तान सा लगता हैं
फिर भी प्यासा यह जीवन

कहते हैं -बोध तभी संभव है
जब खुद से खुद का हो मिलन
क्या प्रेम का अर्थ यही है की
मै करती रहूँ सिर्फ़ तुम्हारा चिंतन

तुममे और मुझमे कोई भेद नहीं हैं
मैं तुम्हारी प्रियतमा हूँ और
तुम हो मेरे प्रियतम

किशोर

629-"जैसे तुम.."


"जैसे तुम.."

जैसे तुम
सुबह की हो पहली सुनहरी किरण
कभी बह आती हो बन बयार शीतल
खिले फूलों मे
स्नेह के गाड़े रंग सी आती हो उभर
सड़कों के किनारे झुके से खड़े


वृक्षों की टहनियों सी मुझे छूकर
उमंग जगाती हो मेरे भीतर
कभी लगता हैं आकाश में ठहरे हुए
अंतिम तारे की तरह
मेरे जागने का
इंतज़ार कर रही हो होकर विकल
धूप की तरह अब सीढियों से उतर आओ
तुम्हारे स्वागत में
जमीन की तरह बिछा हुआ है मेरा जीवन
तुम बादल के एक टुकड़े की तरह टहलते हुए धीरे धीरे
और करीब आ जाओ
तुम्हे पाने की चाह में मैं भी तो
बन गया हूँ ऊँचे पर्वत का एक शिखर
तुम्हारी ख़ामोशी से मेरी ख़ामोशी का
तभी तो होगा दिव्य मिलन
किशोर कुमार खोरेन्द्र

628-"तुम्हे देखे बिन"


"तुम्हे देखे बिन"

तुम्हे देखे बिन
मैं किया करता हूँ
तुम्हारी खूबसूरती की तारीफ
मुझे तो लगता हैं
तुम्हारा सौन्दर्य होगा इसी काबिल

चाहो तो तुम मुझे
अपने सपनों में कर लिया करो आमंत्रित
तुम्हारे एक इशारे पर
मैं लाँघ आउंगा ऊँचे ऊँचे पर्वतों की सख्त पीठ
चाहे कितना भी गहरा होगा सागर
या
कितनी भी गहरी होगी झील

तुम्हारी अजनबी सी आँखों मे अपने खातिर
मैंने पाया हैं जहाँ पर अपरिमित सा क्षितिज
मैं आकाश के बादलों सा वहाँ पर ..
तुममे सुन्दर आकार लिए जाउंगा घुलमिल
कभी लगता हैं मुझे तुम्हारे प्रति
मेरा प्रेम एक तरफ़ा हैं
कम से कम इस जनम मे तो
तुम्हारे ह्रदय मे मेरे लिए जगह है या नहीं
चाहता हूँ कर लूँ
यह महत्वपूर्ण जानकारी हासिल

तुम्हारा कोई नाम तो होगा
तुम्हारा कोई पता तो होगा
तुम्हारा अस्तित्व होगा ही
बार बार यह क्यों कहता हैं
मुझसे मेरा एकाकी दिल

तुम्हें याद कर जिस तरह
मेरी आँखों मे आंसूं आ जाते हैं
क्या मुझे स्मरण कर
तुम्हारी पलकें भी हो जाती है अश्रुपूरित
तुम्हे राधा कहूँ या मीरा
मेरी कल्पनाओं मै
तुम इसी तरह से हो शामिल

मन मे समाये अथाह प्यार को
तुम्हारे समक्ष ही


करना चाहता हूँ मैं जाहिर
इस जग मे चाहकर भी
कोई किसी का न हो पाया
वीरान जंगल की सूनी राह की तरह
क्या मेरी भी कोई नहीं है मंजिल

अपने स्नेह के अमृत को
किसे करूँ समरपित
सामने यदि तुम प्रगट हो जाओ
तो मुझ भटके हुए लहर को
मिल जाएगा साहिल

तुम्हे देखे बिन
मैं किया करता हूँ
तुम्हारी खूबसूरती की तारीफ
मुझे तो लगता हैं
तुम्हारा सौन्दर्य होगा इसी काबिल

किशोर कुमार खोरेन्द्र