रविवार, 24 मार्च 2013

627-देख कर तुम्हारी तस्वीर

देख कर तुम्हारी तस्वीर
लिखता हूँ कवितायें फिर
पर कभी
कह नहीं पाता पूरी बाते
मन रह जाता हैं

आखिर तक अधीर
जानता हूँ इस जन्म में
तुमसे मिलन असम्भव हैं
क्या सदियों से सह रहा हूँ
मैं वियोग की यही असह्य पीर
क्या यही बहुत बड़ी घटना नहीं हैं
की
हम दोनों के मन आ गए हैं
एक दूसरे के करीब
इंसान से प्यार करने वाला मनुष्य ही
ईश्वर के लिए प्रेम गीत
लिख पायेगा एक दिन
देख कर तुम्हारी तस्वीर
लिखता हूँ कवितायें फिर

किशोर कुमार खोरेन्द्र

626-रेत के पन्नों पर

रेत के पन्नों पर

रेत के पन्नों पर

एक गीत लिखने लगी हैं चांदनी


स्निग्ध किरणों का स्पर्श पा

हर नदी लगने लगी हैं ..मंदाकनी


बरगद की छाया तक ,चलकर आ गयी

देखने जगमगाते सितारों की ,.. छावनी


सफ़ेद लकीर सी उभर आयी हैं पगडंडियाँ

नजर नहीं आ रहा पर कोई भी आदमी


यह मौन का कौनसा मधुर राग हैं

जिसे छेड गयी हैं आज रागनी


घाटियों में

उतर आये हैं नर्म रुई से बादल

छूना मत उन्हें

कांच सा तुम कही दरक न जाओ

सम्मोहित कर लेती हैं उनकी सादगी


रेत के पन्नों पर

एक गीत लिखने लगी हैं चांदनी

किशोर कुमार खोरेन्द्र

625-होली खेलूं तुम्हारे संग

होली खेलूं तुम्हारे संग




होली खेलूं तुम्हारे संग

हाथों में लेकर आत्मीयता के रंग
मिट जाए सारी कटुता
प्रेम का रह जाए सिर्फ
तुम्हारे और मेरे बीच संबंध
नयनों से नयन मिले
शब्दों के बिना
बाते हो जाए अन्तरंग
मेरी साँसों में बस जाए
तुम्हारे देह की चन्दन सी सुगंध
तुम्हे ही स्मरण करते हो
मेरी हर प्रात: का आरंभ
इस सुखद ..
संयोग का कभी न हो अंत
मन से उन्मुक्त हो दोनों हम
परन्तु
अंग अंग में बना रहे संयम

होली खेलूं तुम्हारे संग
हाथों में लेकर आत्मीयता के रंग
किशोर

624-"हैं वे ..खामोश"

"हैं वे ..खामोश"


पर्वतों के पास नहीं हैं ओंठ
कैसे अभिव्यक्त करे मन की बाते
रहे हैं वे सोच

सदियों से खड़े हैं जंगल में वृक्ष
अपने ही सायों से
घिरे हुए ...हैं वे खामोश

नदियों को सागर तक तो जाना ही हैं
पल भर को ठहरे कैसे
आगे जो हैं नए नए अनगिनत मोड़

उसे अपनी ही परछाई नजर नहीं आती
कभी इतना अन्धेरा हैं
कभी निशा सोती हैं
चांदनी के धागों से बुनी हुई चादर को ओढ़

दूर दूर तक फैला हैं नीला समुद्र
लहरे तट तक आकर कुछ कह जाती हैं
पर वह लगता हैं हमें सिर्फ भीषण शोर

जीवन सिर्फ एक मौन उत्तर हैं
बेवज़ह रेत पर लिखे शब्दों में
प्रश्न यहाँ न तू खोज

किशोर कुमार खोरेन्द्र

623-"आज ...अनायास "

"आज ...अनायास "

शर्म से मुख तुम्हारा हो गया लाल
मन करता है तुम्हारे गालों से
चुरा लूँ ....मुट्ठी भर गुलाल

तुम्हारी आँखों के इशारों को
मैं समझ न पाया
जीवन भर रहा
इस बात का मुझे मलाल

खेतों में फिर
खिल आया हैं
प्यार का गाड़ा रंग लिए पलाश
महक उठी है अमराई
मुझे भी तुम्हारी याद आई हैं
आज ...अनायास

किशोर