रविवार, 24 फ़रवरी 2013

620-bankar ek kiran ..

kabhi apni gahraai me dubaa liya karte hai mujhe tumhare nayan ..
kabhi chirag tale andhere sa chhp jaayaa kartaa hun 
jab tum bikhar jaati ho bankar ek kiran ..

intazaar me tumhare sada jaagruk rahataa hai mera man ...

lekin n tum par mera adhikar hai ..rahata hai yah bhi smran ..

tumhe kho diya hun ..ya kho kar tumhe paa liya hun ...chalta rahta hai nirantar ek dvand man hi man ..

kabhi khvaab sa kabhi ythaarth sa ...sachmuch vaesi hi lagati ho tum bhi ....jaese aksar lagaa kartaa hain mujhe yah jivan ..

.bhul nahi paataa hun par,tumhari hansi tumhari muskurahat ,kabhi apni tarunaaii aur tumhaara yauvan .
.kishor kumar khorendra

619-maine kah diya

tumhe samajh liya tha mai apna
isliye tum par likhta rahaa
jivan bhar ..kavita
lekin tumne hi jab puchha
usaka naam bataaoo ......
maine kah diya
vo to hai meri kalpna
ya samajh lo usaka naam hai sapna
kishor

618-"पृथ्वी की गोद मे "

"पृथ्वी की गोद मे "

तट पर स्थिर पड़े हुए
कछुवे की तरह
ठहरा हुआ लग रहा था
मुझे
सुबह का शांत वक्त

केवल फेनिल लहरों के शोर कों
सुन रहें थे
पास ही की सडको और मकानों तक
जाती हुई
सूनी पगडण्डीयों के दृश्य 



कुछ जाते हुए अन्धेरें और आ रहें
सम्पूर्ण उजाले में
डूबी हुई थी कुछ झोपड़ियां ....
धीरे धीरे क्रमश:..
आसमान की तरह साफ़ साफ़
फिर नजर आने लगे थे
अंकित हो चुकी अनगिनत पद चिन्हों के सदृश्य .....
रौंधी हुई रेत के सीने पर
उभर आये जख्म .........

जालों से लदी हुई नावें
जा चुकी थी
न मछलियों कों पता था
न मंझधार कों
कि-
क्या होगा आज शाम तक उनका हश्र

खाली शीशी की परछाई
अब भी पूर्व की भांति
स्याह रंग से
भरी हुई थी...
यह देख कर भरा भरा
समुद्र भी था स्तब्ध

बिना ह्रदय के
केवल सिर लिये सा एक श्रीफल
अपनी आँखे मूंदें
माथे पर तिलक लगाए
तपस्वी सा लग रहा था
ध्यान मग्न

कुछ पालीथीन के दिल ...चीरे हुए थे
कुछ पन्नों की देहें .. फटी हुई ..
बिखरे हुए थे
कुछ चप्पलें .अपनो से बिछड़ कर .....छूटी हुई थी
कुछ घरौंधों की दीवारे हो चुकी थी ध्वस्त

लौटते हुई मौज के संग
मेरे पांवों के नीचे से
जमीन खिसक रही थी
परन्तु
इठलाता
हिचकोले खाता महासागर ..........!
पृथ्वी की गोद में ..
अबोध शिशु सा था अपनी धुन में मस्त

किशोर

617-"यात्रा ..."

"यात्रा ..."

आज का दिन
कोरे पन्ने सा ..
गया बीत
कविता न पाया ..मैं लिख

सड़क के किनारे
वृक्षों के तले ..
बैठे छावों की देखता ..
रह गया मैं पीठ

दूर से निहारते रह गए मुझे ..
खेतों में बिखरे
सरसों के रंग पीत



पुल ने कहा -
कुछ देर तो रुकों
सुन लो ज़रा ....
बहती हुई नदी का संगीत

जा रहें हो जिसके साथ
तीव्र गति से ..
उन राहों कों ज्ञात नहीं हैं ..
उनकी क्या हैं ....मंजिल

रह रह कर
मन के भीतर
गूंज रहा हैं
वक्त की कमी के कारण
अधूरा सुना तुम्हारा ..
तुमसे वह गीत

हर मोड़ पर
मील के पत्थर
जब जाते हैं ..मिल
तब ..लगता हैं
सर्वत्र उस गीत के शब्द हैं अंकित

जिन्दगी की इस यात्रा में अब तक
न जाने छूट गए ..
कितने चौराहें
न जाने कितने परीचित ..
बनगए ..अपरिचित

और कितने ही अजनबी
लगने लगे हैं
कई जन्मों से मेरे मित्र

लेकिन तुम्हें भूल न पाया कभी
हालाकि ..
तुमसे बहुत दूर निकल आया हूँ
आज ऐ मेरे मीत

मेरा मन तुम्हारे पास ही
रह गया हैं ...
अभी भ्रमण कर रहा हैं
सिर्फ मेरा शरीर

जब तक न लौटूं ...
मेरी याद कों
तुम भी रखना सुरक्षित

मेरे ह्रदय के द्वार पर तुम्हारी स्मृति के
ऐसे तो जलते ही हैं
सदैव ........दीप

कभी कभी
हवा के झोंके से यदि
खुल जाते हैं दरवाजे
तब लगता हैं
कहीं सुनाने तो नहीं आ गयी हो तुम
अचानक शेष छंद
लिये अपने ओंठों पर
मनमोहक स्मित
किशोर

616-वही खामोशी लिखा जाती हैं

वही खामोशी लिखा जाती हैं
kishorkumarkhorendra द्वारा 2 जनवरी, 2011 5:22:00 PM IST पर पोस्टेड #

पूरी उम्र
जीते रहें मुझे शब्द
पर समझ न पाया
मै उनके अर्थ

मौन ही तो हूँ मै
जो इस जहाँ में
हुआ हूँ -अभियक्त

मेरे ह्रदय में सबके लिये
प्रेम हैं ...
करुणा से इसीलिए तो
द्रवित हो उठा हैं मेरा रक्त
इसीलिए तो चूभता हैं शूल सा
मुझे ..सभी का दर्द

चाहता नहीं मैं
कुछ भी कहना
परन्तु जिसे कहा नहीं जा सकता
वही खामोशी लिखा जाती हैं
मुझसे सर्व

सच्ची भाषा हैं ..
ज्ञान की उँगलियों का
मूक स्नेहिल ..स्पर्श

दीपक की लौ सा जलता रहूँ
और
तम के मन में
उजागर हो जाए ..
चाहता हूँ ...स्वत: उज्जवल हर्ष



अपनी छाँव की स्लेट पर
किरणों की बूंद -बूंद अक्षरों से
जो लिखता रहा हैं वृक्ष
सपनों की कामनाओं की नींद में बेसुध
सुप्त पथिक ..
कहाँ हो पाए हैं उन्हें
पढ़ने में समर्थ

किशोर

615-चुप रह जाता हैं दर्पण

चुप रह जाता हैं दर्पण

अपनी ही हथेली पसारे
अंत तक ...
उसकी रेखाओं कों निहारते
उलझे रह गए सारे वृक्षों के पर्ण

बहती हुई धारा -प्रवाह
चली गयी
किस गंतव्य कों नदी
मैं उसके जल कों
प्रतिमाओं के चरणों पर
करता रह गया अर्पण

पथ चले संग ..खामोश
हर मोड़ रहा ..गुमशुम
घेरे रहें मुझे पर
आजीवन ...
समस्याओं के ऊँचें ऊँचें पर्वत

जब कोई न मिला मित्र
खुद कों ही किया
दो भागों में मेरे
मन ने विभाजित
एक श्रोता ..दूसरा रहा
रचनाओं का सर्जक



कहता हैं यह जग ..
मैं हूँ शाश्वत एक प्रश्न
ढूढते रहना तुम उत्तर
मेरे अस्तित्व के औचित्य के लिये
किसी तर्क कों ..
अब तक मिला न कोई समर्थन

लगता हैं मैं ..
चिंतन शील प्रकाश पुंज हूँ केवल
बनाया जिसे चैतन्य किरणों ने
हो कर परावर्तन

जन्म से मृत्यु तक ..
मेरे जीवन के पैर
करते रहेंगे क्या ..
बस
काल के समानांतर ..नर्तन
किशोर

614-tum mujhe n jaana khabhi bhuul

tum mujhe n jaana khabhi bhuul
mere shbd tumhare shbdon se milna chahenge
chahe paristhitiya anukul ho ya prtikul
kishor

612-यह जीस्त हैं या ..

यह जीस्त हैं या ..
हैं तश्नगी
कहते हैं हर बूंद में सागर हैं
लेकिन खुद की
कैसे करूँ मैं बंदगी
डोर किसी और के हाथ मे हैं
पतंग सा उड़ रहा हूँ ..
क्या यही हैं ..जिन्दगी
मुझे देखकर किसी की निगाहों मे
आ गयी हैं ख़ुशी से नमी
फिर भी कहता हूँ उसे मैं अजनबी
मेरे ख्वाब उसके सपनों में जाकर
करते हैं चहल कदमी 


घेर लेती हैं मुझे कभी
उसकी रूह की रोशनी सतरंगी
और
कभी आत्मसात कर लेती हैं मुझे
मेरी तन्हाई की तीरगी
यह जीस्त हैं या ..
हैं तश्नगी
किशोर कुमार खोरेन्द्र

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

611-इंतज़ार में मौन


इंतज़ार में मौन

इंतज़ार में मौन
तडफता हैं

कभी नसों में चीटीयाँ
रेंगती सी लगती हैं

घास के तिनके भी
काटों की तरह चूभ जाते हैं

वृक्ष की सूखी हुई छालों की तरह
दर्द का अहसास
हथेलियों पर आप से आप गिर आता हैं

झुकी हुई टहनिया छोड़ कर मेरी
उंगलिया ...मुझे चिडाती हुई
लचकती हुई
ऊपर ऊठ जाती हैं

धूप की चमक आँखों के सामने अंधेरा
बिखेर जाती हैं

सब कुछ दोपहर की तरह सूना सूना
सा लगने लगता हैं

मैं पत्थर के एक गोल टुकड़े की तरह
सरोवर के जल की सतह पर
जोरों से वक्त के हाथों उछला हुआ सा
फिसलता ..दौड़ता हुआ सा
खुद कों महसूस करता हूँ

चिड़ियों की तरह छाँव के संग फिर
चुपचाप दुबक कर..बैठ जाता हूँ

किशोर

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

611-आया ऋतुराज ...बसंत


kishor
लिये नूतन उमंग.......
टिप्पणी जोड़ें kishorkumarkhorendra द्वारा 8 फ़रवरी, 2011 3:03:00 PM IST पर पोस्टेड#


लिये नूतन उमंग
आया ऋतुराज ...बसंत

स्वक्छ हैं नीला आकाश
जिस पर हैं श्वेत कोमल
मेघों का राज

हवा बह रही
अपनी मुट्ठी में भर
कण -पराग

रुचिकर लग रहा
सूर्य -प्रकाश

तट छोड़ मध्य में
बहते जल लग रहें
पीयूष समान

आनंदित हो विहंग उड़ रहें
खुशियों के
पंख -पसार

मौसम के स्नेह से
खिल उठे हैं
कण कण के संसार

प्रकृति के हाथों में हैं वीणा
मानव मन में गूंज रही हैं
उसकी मधूर झंकार

कोयल गा रही राग... पंचम
लिये नूतन उमंग
आया ऋतुराज ..बसंत


क्षण क्षण कहता -ठहरों
निहारों.......!

मुझसे प्रेम करों ...
कह रहें वृक्षों पर उगी
नन्ही पत्तियाँ .बजाकर तालिया
खेतों में ऊगे जौं ..गेंहूँ की बालियाँ
सरसों की स्वर्णिम नरम डालियाँ
मनोरम ...लगते है
सूर्योदय और सूर्यास्त के
सप्त ...रंग
लिये नूतन उमंग
आया ऋतुराज ....बसंत

शुष्क रेत का ह्रदय भी
पसीज रहा
नदी के प्रवाह के प्यार के संग
घुलने कों
चूर चूर हो रहें हैं चट्टान
उपवन हो या कानन
पुष्पों ने बिखराए हैं ..सुगंध
लिये नूतन उमंग
आया ऋतुराज ...बसंत
kishor

610-बसंत ऋतु का ...जब हुआ आगमन


सभी को ....
भाने लगा यह मौसम 
बहने  लगा शीतल पवन 
मनमोहक हुआ 
सम्पूर्ण वातावरण 
बसंत ऋतु  का ...
जब हुआ आगमन 
खिलते ही पुष्पों के 
धरती गयी निखर 
सरसों सा पिला रंग 
चहुँ और गया बिखर 
सीने में अपने प्यार लिए 
बहने लगे फिर से निर्झर 
नवं -उमंग से 
भर उठा सबका जीवन 
बसंत ऋतू का 
जब हुआ आगमन 
मदहोश हो गए अन्तरंग भाव 
छिपूँ कहाँ सोच रही छाँव 
एक दूजे  को 
 निहारने लगे एकटक 
प्रेमी  युगलों के नयन 
बसंत ऋतू का 
जब हुआ आगमन 
@किशोर कुमार खोरेन्द्र 

स्मरण तुम्हारा मुझे लगता है मधुर


स्मरण तुम्हारा मुझे लगता है मधुर 
मेरे मनरूपी वृत्त का 
केंद्र बिंदु हो तुम 
तुम महा सागर हो तो मैं हूँ सूक्षम बूंद 
लहरों पर हो आरूढ़ 
मेरी यात्रा रहे सदा तुम्हारी ओर  उन्मुख 
कभी न जाऊ गन्तव्य मार्ग से चूक 
प्रेम का ,सौन्दर्य का ..
तुम ही हो स्रोत -मूल 
तुम्हारे प्रति -
मेरे ह्रदय में रहे हमेशा 
सौहाद्र -भाव ..विपुल 
हालांकि तुममे है -
अनुशासित गरिमा अदभूत 
तुम्हारी आँखों के दर्पण में 
अपनी कल्पनाओं को 
अपने सपनों को 
साकार निहारा करता हूँ ..
अपने मन अनुकूल 
मेरे लिए तुम ..
स्नेह की अदृश्य धुरी हो 
जिस पर मैं जाया करता हूँ 
प्रतिपल  घूम 
तुम शाश्वत का पुष्प हो 
तो जिसे चिर यौवन उपलब्ध हो 
ऐसा हूँ मैं एक बासंतिक मधुप 
स्मरण तुम्हारा लगता हैं मुझे मधुर 
किशोर कुमार खोरेन्द्र