शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

733-"मनुष्य का जीवन "

"मनुष्य का जीवन "

तुम्हारी सांसों में
घुला हैं
सुगन्धित पवन
तुम्हारी आँखों में
बसा हैं
विस्तृत गगन
तुम्हारे मन में
जगमगाते हैं
इच्छाओं के अनंत उडु गण
चेतना के निस्तब्ध जगत की
खामोशी से जुड़ी हैं
तुम्हारे ह्रदय की धड़कन
कमल की पंखुरियों सा
खिला खिला हैं
तुम्हारा सुन्दर आनन
गंगा सी एक नदी
तुम्हारी नसों में
बहती हैं पावन
हिमालय की तरह
तुम्हारे इरादे मजबूत हैं
उन्हें पराजित
नहीं कर पायेगी कोई अड़चन
तुम्हारे ही भीतर
गंभीर और सारगर्भित समुद्र हैं
कर लो अमृत मंथन
देख कहाँ पाते हैं हम
स्वयं का
जन्म और मरण
जिसका कभी अंत ना हो
ऐसा हैं
प्रत्येक मनुष्य का जीवन
उड़ते रहो बादलों सा
धूप को छाया में
करो परिवर्तन
या बरस कर
शीतल कर दो भीषण तपन
सुखद और मनोरम हो जाए
ताकि
इस धरती का वातावरण

किशोर कुमार खोरेन्द्र

732-"प्रणय"

"प्रणय"

वियोग में ही
होता है
प्रणय का अहसास
बरसों पहले
पल भर के लिए ही सही
तुमसे मेरा परिचय हुआ था
इसे भी मानता हूँ मैं
मुझ पर तुम्हारा एहसान
उसी मिलन पर है मुझे नाज़

अन न तुम्हारी परछाई है
न तुम्हारी तस्वीर है
इस जहाँ में तनहा छोड़ गयी हो
यह कह कर की
अब फिर न होगी
कभी तुमसे मेरी मुलाक़ात
मौन हो गए है साज

मेरी मान्यता है
प्यार ,शब्दों का
नहीं होता हैं मोहताज
इसीलिए तो
सुनायी देती है
वादियों में खोयी हुई
तुम्हारी मधुर आवाज

धुंधली सी हो चुकी
तुम्हारी आकृति में
सुबह की रश्मियों की तरह ही
उभर आती है
तुम्हारी मधु सी मुस्कान
तुम्हारी शोख निगाहें
मेरा पीछा करती सी लगती है
इस रहस्य का
नहीं पाया हूँ जान
अब तक मैं राज

कभी किसी अजनबी ने
यह जताकर
किया था मुझसे एतिराज़
प्रेम
कभी खत्म नहीं होता
जीवन से भी लंबी है उसकी राह
उसकी कोई मंजिल नहीं होती
उसका होता है सिर्फ आगाज़

हार कर भी मैं जीत गया हूँ
दर्द के बिना
अधूरा हैं
मेरा अनुराग
तन्हाई की धुंध में
बर्फ सी घुली है
तुम्हारी याद
तुम्हारे और मेरे बीच
झील सी गहरी ख़ामोशी है आज

*किशोर कुमार खोरेन्द्र

731-"शरद ऋतु "

"शरद ऋतु "

बर्फ की सिल्लियों सा
नभ में हैं
बादलों का प्रसार

शशि किरणें कर रही हैं
धरा पर शीत की बौछार्

झील में
मिश्री की डली सा
घुल गया हैं
पूनम का चाँद
मचल उठी हैं लहरें
तट से कर रही हैं
वे मनुहार

ओस से भींगी
रेत की सुडौल काया
सजीव हो गयी हैं
चित्ताकर्षक हैं उसका
अनुपम रूप जो
हुआ हैं अभी साकार

खुले गगन के झरोखों से
सकुचाये से
टिमटिमाते तारे भी
रहे हैं इस छटा को निहार

आओं मैं और तुम भी करे
आँखों आँखों से
शरारतों का इज़हार

बह रही हैं
चन्दन की महक लिए
नर्म दुशाले सी
सुखद शीतल बयार

सुध बुध खो चुकी
एक नाव के हाथों में
नहीं हैं पतवार
आगे हैं मंझधार

मोंगरे की पंखुरियों सी
धवल लग रही हैं निशा
चांदनी ने किया हैं श्रृंगार

आज फिर सरस हुआ हैं
शरद ऋतु का शालीन व्यवहार

किशोर कुमार खोरेन्द्र

730-"हलचल"

"हलचल"

तुम कहती हो मुझ पर लिखना मत
मैं हूँ एक अति साधारण औरत
पर मैं तो हूँ एक लेखक
इसलिए तुम्हारे इस कथन
से नहीं हूँ पूरी तरह से सहमत

तुम्हारे ह्रदय में खिला हैं
सदभावों का shat दलीय कमल
तुम्हारे मन की रोशनी
हर लेना चाहती हैं तम
भविष्य में मृत्यु हैं अतीत में हैं जनम
लेकिन तुम वर्त्तमान के
प्रत्येक क्षण को मानती हो
सचमुच में जीवन

शब्दों से तुम्हें स्नेह हैं
उनमे किंचित भी त्रुटी हो
यह तुम्हें नहीं हैं सहन
तुम्हें पसंद हैं अध्ययन
चिंतन और मनन
और करती रहती हो
सतत आत्म विश्लेषण
एवं औरों के मन का भी निरीक्षण

स्त्रियों के प्रति पुरुषो के भीतर
जो दुर्भावना हैं
नारी को जो समझते हैं सिर्फ तन
महसूस नहीं कर पाते हैं
जो लोग उसकी रूह का वज़न
करना चाहते हैं केवल चीर हरण
ऐसे दू : शासन दुर्योधन से
तुम करती हो नफरत

लेकिन इस आक्रोश से उबलते
व्यैक्तित्व के अंदर हैं
एक युवती
पुष्प की पंखुरियों सी मुलायम
जिसे प्रकृति से प्रेम हैं
तुम्हें भाता हैं ऊगता हुआ सूरज
भागती नदियाँ की कल कल सी
तुम भी तो करती हो हलचल

किशोर

729-अवकाश

अवकाश
मेरी कलम की पीठ पर
मेरी उँगलियों के निशान हैं
अब तक
एक कोरा पन्ना मेरे बिना
कमरे के हर कोने में
मुझे तलाश चूका होगा
किताबों को यूँ ही
करीने से सजे रहना
अच्छा नहीं लग रहा होगा

घर के आईने ने मुझे
काफी दिनों से देखा नहीं हैं
खिड़की की दीवार से
सटा हुआ गुलमोहर
उचक उचक कर
सूने कमरे को
निहार रहा होगा
झरोखे से आती एक सीधी किरण
सर्च लाईट की तरह
अँधेरे में अकेली खड़ी होगी

दो छिपकलियाँ जो
आपस में लड़ते लड़ते या
प्यार करते करते
मुझ पर धप से
अक्सर गिर जाया करती हैं
सोच रही होंगी - अरे वो कहाँ गया

दरअसल इस बार
मेरे चश्मे ने
मेरी आँखों को पहन लिया हैं
मेरी चप्पल मुझे जहां जहां
ले जा रहीं हैं
मैं वहाँ वहाँ जा रहा हूँ

मैंने अपने मन को
खुला छोड़ दिया हैं
सोच रहा हूँ
शायद इस बार-
नदी को ,सागर को
पढ पाऊँ
वृक्षों से
कोई नयी कहानी सुन पाऊँ
पहाड़ों के शिखर से
लौट कर आयी प्रतिध्वनि से
कुछ सीख ले पाऊँ
किशोर

728-"एक ग्राणीण युवती "

"एक ग्राणीण युवती "

नटखट मन चंचल चितवन
सुडौल तन सुन्दर आनन
निर्मल ह्रदय हँसीं ऐसी
जैसे
खिला हो अभी अभी सुमन
कुंतल लंबे और सघन
हो जब आगमन
नीरस lage न वातावरण
आप से आप
मुस्कुराने लगे यौवन

तीखे नाक नक्श
बोलती मीठे वचन
चहरे पर हैं
ग्रामीण भोलापन
जब देखो तब कार्य रत
मिले न उसे फुर्सत

जानती समझती सब हैं
लेकिन अभिनय किये बिना
जीती हैं
संयमित
अनुशासित
मर्यादित
और स्वाभाविक जीवन
किशोर

727-"विलय"

"विलय"

तुमसे जब हुआ परिचय
तब समझ में आया
जीवन का मूल आशय
धड़कने लगा हैं
तुम्हें याद कर
अब मेरा ह्रदय
तुम मुझे जीत गयी हो
तुम्हारे समक्ष मैं
मान लेता हूँ पराजय
स्वीकार किया था मैंने
इस जीवन को एक अभिनय
जबसे तुमसे मिला हूँ
तब से मिट गया हैं
पुर्वाग्रह और संशय
तुम्हारी नज़रों का सम्मोहन
मुझे लगा रहस्यमय
तुम्हारी आत्मा के
अंग अंग में हैं
मधु रस का संचय
तुम्हारे और मेरे प्यार से
ऊँचा नहीं हैं हिमालय
गंगा के उदगम स्थल सा
पावन हैं हमारा प्रणय
मैं एक ऐसा हूँ जलाशय
जिसके
निर्मल और मीठे जल में
तुम्हारी चाँद सी छवि का
हुआ हैं अंतरंग विलय
तुम्हारी रूह से मेरी रूह का
अब हो चूका हैं परिणय
तुम मेरी स्मृति के
निर्जन वन में
मधुर धुन सी गूंजती हो
मेरे लिए तुम ही हो
ताल छंद और लय
किशोर कुमार खोरेन्द्र

726-"क्या तुम भी मुझसे ....."

"क्या तुम भी मुझसे ....."


तुम्हारे ख्यालों तक

मेरे ख्याल ..

तुम्हारे सपनों तक

मेरे स्वप्न ..

तुम्हारी खामोशी तक

मेरी खामोशी ...

क्या कभी पहुँच पायेंगे ...?

तुम्हारी परछाई से

मेरी परछाई ..

तुम्हारी तस्वीर से

मेरी तस्वीर ...

तुम्हारी रूह से

मेरी रूह ..

क्या कभी मुलाकात कर पायेंगें ..?

ऐसे भी देह और मन का ..

तो कोई अर्थ ही नहीं हैं

तुम्हारी कविता में

मेरे शब्द ..

तुम्हारी पेंटिंग में

मेरे रंग ...

तुम्हारे साज में

मेरे सुर ..

क्या कभी शामिल हो पायेंगे

वैसे भी ..

प्रेम के अभाव में ..

धरती का हरा पन

आकाश का नीलापन ..

दिखाई नहीं देते

क्या मै तुम्हारी

चेतना की नसों में बह सकता हूँ

क्या मै तुम्हारे

ह्रदय का स्पन्दन बन सकता हूँ

क्या मैं तुम्हारे

चिंतन का विषय बन सकता हूँ

मै तो तुमसे बेहद प्यार करता हूँ

क्या तुम भी मुझसे .....

उतना ही प्रेम कर सकती हो .?
kishor

725-"माध्यम"

"माध्यम"

मैँ तो सिर्फ हूँ
एक माध्यम
कविता नहीं होती हैं ख़तम

बूंद बूंद की तरह आपस में
जुड जाते हैं अक्षर
शब्दों से शब्द मिलकर
बिखरते हैं ऐसे
जैसे हो
वे वाक्यों की अनेक लहर

जब भी तुम्हारे प्यार का
होता है मीठा सा अहसास
ह्रदय के भाव आते हैं उभर

तुम्हारे मन में है एक
ऐसा भी घर
जहां मेरे साये का होता हैं
तुम्हारे संग बसर

तुमसे बाते करता हुआ वहाँ
मैँ थकता नहीं हूँ
तुम्हारी मूक निगाहों की भाषा
होती हैं सरस
जिसका मुझ पर
पड़ता हैं गहरा असर

मैँ तो सिर्फ हूँ
एक माध्यम
कविता नहीं होती हैं ख़तम

किशोर

724-"कुछ दीवानगी

"कुछ दीवानगी "

तुझमें हुस्न का गुरुर हैं
मुझमेँ इश्क़ का सुरूर हैं

मैं भी पाक हो जाता
यदि मुझे पनाह देती
तेरी पाकीज़गी

मुझमे हैं अब कुछ आवारगी
मुझमे हैं अब कुछ दीवानगी

तेरी ज़रा सी बेरूखी की
वज़ह से मैं
खुद से हो गया हूँ अज़नबी

तेरी दुआ के बगैर
सूनी लगती हैं
मुझे यह पूरी मेरी ज़िंदगी

किसी बुत का नहीं
बस चाहा था मेरी रूह ने
करना तेरी बंदगी
किशोर कुमार खोरेन्द्र

723-आप

आप

अगर मिल जाती 

आपकी कोई खबर
आसान हो जाता 

मेरे जीवन का सफ़र

आप ही से दिल की बात
करने का था इरादा
पर कोई काम ज़रूरी हो गया
इस वक्त
हमारी बातों से ज्यादा

आप तो मेरी हर बात से हैं वाकिफ़
आपके बारे में कुछ जान पाऊँ
यह मेरे लिए कहां हैं मुनासिब

कोई बात नहीं होती तब भी
आप हो जाते हो नाराज़
प्यार प्रदर्शित करने का
यह भी खूब हैं अंदाज

किशोर कुमार खोरेन्द्र

{मुनासिब =उचित
वाकिफ़ =परिचित
अंदाज़ =ढंग }

बुधवार, 27 नवंबर 2013

"तुम्हारा ख्याल"



chhoti rachnaaye 

1-pyaar hain sirf madhur smran .
.maine bhi to kiya hai ...
isi tarah se apni smriti me ...
tumhe varan ..



2-baaton ki shrinkhala ki
shesh rah jaati hain kadi
isi bhahaane
mil liya karenge fir kabhi


3-main hi hu apne man ka jaankaar ...
ki vah bechain ho ..
kaese karta hai kisi ka intazaar .



4--"तुम्हारा ख्याल"

आते ही
तुम्हारा मन में ख्याल
हल हो जाते हैं सारे सवाल
शब्दों के समूह एकजुट हो जाते हैं
अभियक्त होने लगता हैं
आपसे आप दिल का हाल
आते ही
तुम्हारा मन में ख्याल

5-"अनाम रिश्ता"
अदृश्य सी महीन होती हैं
अनाम रिश्ते की डोर
न समझना उसे पर
नाजुक और कमजोर
निश्छल होता हैं
यह सम्बंध
न कोई जोर
न कहीं कोई शोर



6-तुम्हारी आँखें
मेरे लिए वो आईना हैं
जिनमें मुझे
मेरी देह नहीं ,मेरा मन नहीं
मेरी रूह दिखाई देती हैं


7-jaese nadi ke sath
rahataa hain kagaar
usi tarah se hain
mera tumase karaar
maine kiya tha tumase
apne pyaar ka izhaar
badale me tumne kaha tha
main nadiya hun
chalte raho mere sang
mere bahaav ke anusaar


8-तुम
वो एक मधुर गीत हो
जिसे मैं
मन ही मन
इस तरह से गाता रहता हूँ
इस तरह से गुनगुनाता रहता हूँ
ताकि कोई सुन न सके
या
तुम
तुम्हारे द्वारा प्रेषित
वह प्यार भरा अंतिम ख़त हो
जिसके शब्दों को
मैंने
अपने ह्रदय के कोरे पृष्ट पर
अमिट रूप से लिख लिया हैं


9-karate rahe unke aagman ka intazaar
pal pal lagata raha sadiyon sa


10-jinke ghar ki divaare khamoshi ke iiton se bani ho ..

unhe kaese pukaaraa jaaye ..


11-mai to tumhare khatir
rachata hi rahta hun chhand
tarif karate rahane ka
tumne hi toda hain anubandh


12

-"अहसास "
तुम्हारा मुस्कुराता हुआ चेहरा
आता हैं मुझे नज़र
तुम्हारी खिलखिलाहट का
मुझ पर दिन भर रहता हैं असर
अपनी निगाहों से आने के लिए
इशारे किये हो तुम मुझे जिधर
मन करता हैं
चलता रहूँ बस उधर
हालाकिं तुम उपस्थित नहीं हो
पर तुम्हारे होने का
अहसास लिए किया करता हूँ सफ़र
तुम्हारे जूड़े में
गुलाब की पंखुरोयों सा
खिला हुआ हूँ मैं
जिसे सहेजती हो बार बार तुम छूकर
मैं तुम्हारा दुप्पटा हूँ
जो तुम्हारे कंधें से सरकता भी हैं
तो संभल कर

किशोर कुमार खोरेन्द्र

721-"वजूद "

"वजूद "
मैं शरीर से
मन से अलग हूँ
शरीर को बदलता हुआ देखता हूँ
मन की बातें निरंतर सुनता हूँ
प्रकृति का अनुपम सौंदर्य मुझे अभिभूत कर लेता हैं
नियति के हिंसक प्रहार को निहारकर
अवाक रह जाता हूँ
दर्द किसी का दूर नहीं कर पाता हूँ
थक हार कर
लौटे हुए पक्षी सा
अपने मन के वृक्ष की खोह में
असहाय सा
दुबक कर बैठ जाता हूँ
नीले सागर की अथाह गहराई
अंतरिक्ष का असीम विस्तार
शिखर पर
बर्फ से आच्छादित ऊँचें पर्वत
सागौन और साल के घने जंगल
रास्ता तलाशती सी
सूनी सहमी सी अनेक पगडंडियाँ
बदहवाश सी
शहर की असंयमित सी सड़कें
धरती से उठकर आकाश छूने को तत्पर
मनुष्य के भीतर की
जगमगाते सितारों सी अनंत इच्छायें
अंतहीन और व्यापक हैं यह सब परिवेश
मैं यह शरीर नहीं हूँ
क्योंकिं इसे कल राख होना हैं
मैं यह मन भी नहीं हूँ
जिसकी कामनाएं कभी पूरी नहीं होती
मैं तो जैसे
अखिल सौर मंडल में स्थित पृथ्वी के सदृश्य
एक गोल खारा बूंद हूँ
उड़ती हुई गुबार का एक कण हूँ
मधु मय ओस सा अभी हूँ
अगले पल नहीं भी हूँ
धुंध सा सभी को अपनी बाँहों में भर कर
प्रेम देकर लापता हो जाता हूँ
तो क्या मैं हूँ ही नहीं
फिर अपने वजूद के लिए जिद्द क्यों
मान क्यों नहीं लेता की
मैं हूँ ही नहीं
किशोर कुमार खोरेन्द्र

720-"प्रणय"

"प्रणय"

वियोग में ही
होता हैं
प्रणय का अहसास
बरसों पहले
पल भर के लिए ही सही
तुमसे मेरा परिचय हुआ था
इसे भी मानता हूँ मैं
मुझ पर तुम्हारा एहसान
उसी मिलन पर हैं मुझे नाज़

अन न तुम्हारी परछाई हैं
न तुम्हारी तस्वीर हैं
इस जहाँ में तनहा छोड़ गयी हो
यह कह कर की
अब फिर न होगी
कभी तुमसे मेरी मुलाक़ात
मौन हो गए हैं साज

मेरी मान्यता हैं
प्यार ,शब्दों का
नहीं होता हैं मोहताज
इसीलिए तो
सुनायी देती हैं
वादियों में खोयी हुई
तुम्हारी मधुर आवाज

धुंधली सी हो चुकी
तुम्हारी आकृति में
सुबह की रश्मियों की तरह ही
उभर आती हैं
तुम्हारी मधु सी मुस्कान
तुम्हारी शोख निगाहें
मेरा पीछा करती सी लगती हैं
इस रहस्य का
नहीं पाया हूँ जान
अब तक मैं राज

कभी किसी अजनबी ने
यह जताकर
किया था मुझसे एतिराज़
प्रेम
कभी खत्म नहीं होता
जीवन से भी लंबी हैं उसकी राह
उसकी कोई मंजिल नहीं होती
उसका होता हैं सिर्फ आगाज़

हार कर भी मैं जीत गया हूँ
दर्द के बिना
अधूरा हैं
मेरा अनुराग
तन्हाई की धुंध में
बर्फ सी घुली हैं
तुम्हारी याद
तुम्हारे और मेरे बीच
झील सी गहरी ख़ामोशी हैं आज

*किशोर कुमार खोरेन्द्र

719-"शरद ऋतु "

"शरद ऋतु "

बर्फ की सिल्लियों सा
नभ में हैं
बादलों का प्रसार

शशि किरणें कर रही हैं
धरा पर शीत की बौछार्

झील में
मिश्री की डली सा
घुल गया हैं
पूनम का चाँद
मचल उठी हैं लहरें
तट से कर रही हैं
वे मनुहार

ओस से भींगी
रेत की सुडौल काया
सजीव हो गयी हैं
चित्ताकर्षक हैं उसका
अनुपम रूप जो
हुआ हैं अभी साकार

खुले गगन के झरोखों से
सकुचाये से
टिमटिमाते तारे भी
रहे हैं इस छटा को निहार

आओं मैं और तुम भी करे
आँखों आँखों से
शरारतों का इज़हार

बह रही हैं
चन्दन की महक लिए
नर्म दुशाले सी
सुखद शीतल बयार

सुध बुध खो चुकी
एक नाव के हाथों में
नहीं हैं पतवार
आगे हैं मंझधार

मोंगरे की पंखुरियों सी
धवल लग रही हैं निशा
चांदनी ने किया हैं श्रृंगार

आज फिर सरस हुआ हैं
शरद ऋतु का शालीन व्यवहार

किशोर कुमार खोरेन्द्र

बुधवार, 20 नवंबर 2013

718-कह रहा भ्रमर

कह रहा भ्रमर

तुम …धरती के

सरोवर की सुन्दरता हो

हे कमली ...!



गुलाबी .कभी नीली ,तेरी पंखुरी

तुम्हें हुआ क्यों भरम

यह काम नही ..प्रेम परम

यह कहता उतर

अम्बर से

एक भ्रमर

तुम अपनी जमीन की जड़ो पर टिकी रहना

नाल पर मुकुट सा

ताल मे

पात पर

अपनी -खिली रहना

गुंजन करता हूँ मैं लिये

एकांत का मधुर स्वर

जैसे ..गुनगुनाता होऊं …

इस प्रकृति का मूळ प्यारा

तुम्हारे लिये एक गीत हरदम

यह कहता

उतर अम्बर से

मै

एक भ्रमर

तुम स्थिर हो -जल तरंगो कों सहती

मै चंचल उड़ता -जिधर हवा हो बहती

सम्मोहित हो जाता

तुम्हारी परछाई कों भी देख भली

मै

ऐसा ही हूँ एक अली

पर बिठा तुम

अपने सुकुमार अंक

कर लेती किसी सांझ मे मुझे बंद

और तुम्हारी पंखुरीया समेट लेती

अपने सभी अंग

मै तब

प्राण निछावर कर देता

उस मधुयामिनी के संग

फिर

प्रात: खिल जाते तेरे हरेक पंख

पर तेरी आँखों से बहते अश्रु

ओस बूंदों सा नम बन

मुझे बहा ले जाता तब

प्रेम मय जग का मधुर जल

हे कमली

मत कर भरम

यह काम नही

है प्रेम अमर

मै -

कह रहा एक भ्रमर

किशोर

717-"मनुष्य का जीवन "

"मनुष्य का जीवन "
 

तुम्हारी सांसों में
घुला हैं
सुगन्धित पवन
तुम्हारी आँखों में
बसा हैं
विस्तृत गगन
तुम्हारे मन में
जगमगाते हैं
इच्छाओं के अनंत उडु गण
चेतना के निस्तब्ध जगत की
खामोशी से जुड़ी हैं
तुम्हारे ह्रदय की धड़कन
कमल की पंखुरियों सा
खिला खिला हैं
तुम्हारा सुन्दर आनन
गंगा सी एक नदी
तुम्हारी नसों में
बहती हैं पावन
हिमालय की तरह
तुम्हारे इरादे मजबूत हैं
उन्हें पराजित
नहीं कर पायेगी कोई अड़चन
तुम्हारे ही भीतर
गंभीर और सारगर्भित समुद्र हैं
कर लो अमृत मंथन
देख कहाँ पाते हैं हम
स्वयं का
जन्म और मरण
जिसका कभी अंत ना हो
ऐसा हैं
प्रत्येक मनुष्य का जीवन
उड़ते रहो बादलों सा
धूप को छाया में
करो परिवर्तन
या बरस कर
शीतल कर दो भीषण तपन
सुखद और मनोरम हो जाए
ताकि
इस धरती का वातावरण

किशोर कुमार खोरेन्द्र

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

716-"यादो के तिनकों से

"यादो के तिनकों से"

तुम वही हो एक चेहरा

ख्यालों से कहता हूँ अक्सर

जिस पर अधिकार हैं सिर्फ मेरा

व्यतीत हो जायेगा जीवन

अंतिम साँस लेने से पहले

कह दूंगा मन कों

ओंठों पर न आने देना ..

नाम ....तुम्हारा

इस जग में आकर

एक तस्वीर तुम्हारी ..

अपनी आँखों में बसाए

चुपचाप ...चल दूंगा

तुम्हारी यादो के तिनकों से



बनाउंगा नीड़ ...इस जहाँ में

पुनह: एक सुनहरा

किशोर

सोमवार, 18 नवंबर 2013

715-"मेरी आत्मा एक नदी हैं"

"मेरी आत्मा एक नदी हैं"

बिखर जाती हैं जब ज्योत्सना
अम्बर से अप्सरा सी
उतर आती हैं मेरी कल्पना
प्रेम स्नेह ममता और करुणा
के जरिये
देती हैं मुझे वह फिर सांत्वना



लोग कहते हैं
सुकुमार ख़याल को
मेरे मन की आत्म प्रवंचना
नीम सा कितना भी कटु हो
सह लिया करता हूँ
मैं वह आलोचना
इस जहां में कोई भी तो ऐसा नहीं हैं
जो रहे संग सदा
इसलिए मैं नींद में
चुरा लिया करता हूँ रोज
एक खूबसूरत सपना
कोहरे सा प्रगट होकर
सीख लिया हैं ख़्वाबों ने
फिर छटना
मेरी आत्मा एक नदी हैं
रोक नहीं पाता हूँ उसका बहना
किशोर कुमार खोरेन्द्र

muktak

तुम्हारे मन में उठ ना जाये सवाल डरता हूँ
रख सकोगी कब तलक तुम मेरा खयाल डरता हूँ
तेरी रूह में कशिश हैं मेरी रूह में खलिश हैं
तुम्हें खोने का रह ना जाये मलाल डरता हूँ












ह्रदय जो कहता हैं उसे सीख लेता हूँ
मन जो कहता हैं उसी तरह लिख लेता हूँ
तुम्हें ही पढ़ता ,लिखता समझता रहा हूँ
तुमसे इस तरह अकेले में मिल लेता हूँ

किशोर कुमार खोरेन्द्र

714-"मेरे खयाल से "

"मेरे खयाल से "

मेरे लिए तुम
चुटकी भर नमक हो
मेरे जीवन में स्वाद आ गया हैं
मेरे लिए तुम
चम्मच भर शक्कर हो
मेरी दिनचर्या में मिठास आ गया हैं
लेकिन मेरे खयाल से
वियोग में
तुम्हारी आँखों से
छलक आयी अश्रु बूंदें
नमक से अधिक नमकीन होती हैं


मुझे देखते ही
तुम्हारे ओंठों पर
उभर आयी मुस्कराहट
शक्कर से ज्यादा मीठी होती हैं

किशोर कुमार खोरेन्द्र

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

dipawali -03-11-2013

dipawali -03-11-2013



713-"तुम्हें गुनगुनाने लगता हूँ"

"तुम्हें गुनगुनाने लगता हूँ"

वह प्रतिरूप जो
तुम्हारे मन के भीतर रहता हैं
मेरी जान पहचान उसी से हैं
उसी सेबातें कर
मैं कवितायें लिखता हूँ
वही तुम हो
मैं भी जो बाहर से दिखाई देता हूँ
वह नहीं हूँ
मेरे अंतर्मन के अन्दर मेरा
असली रूप रहता हैं
जिस तरह तुम अपने नश्वर तन
चंचल मन से परे हो
उसी तरह मैं भी
धरती और आसमान जहाँ
मिलते से दिखाई देते हैं
उस क्षितिज के उस पार से
तुम्हें पुकारता हूँ........



तुम चाहती हो
की मैं तुम्हारे लिये छंद रचता रहूँ
और तुम
मेरे छंदों से आबद्ध होती रहो
मैं गीत गाता रहूँ
और तुम उसे सुनती रहो
मैं धुन हूँ
तुम नृत्य हो
मैं बांसूरी हूँ
तुम तान हो.
मै और तुम
एक के एकांत में
समाहित हैं
परन्तु
दुनियाँ में अलग अलग
होने का अहसास ही
वह दर्द हैं
जिसके वशीभूत .......
मैं अपने निपट अकेलेपन कों
भुलाने के लिये
तुम्हें गुनगुनाने लगता हूँ

तब तुम्हारे
देह की खुश्बू से
मेरे ह्रदय के कमरे महकने लगते हैं
तुम मेरी आत्मा की देह हो
क्या तुम्हें भी ऐसा लगता हैं
यह रिश्ता शब्दों द्वारा
अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता
हालाँ की
तुम्हें कभी कभी यह भ्रम होता हैं
की मै तुम्हारे बालों कों
गालों कों
छूना चाहता हूँ

बात ऐसी नहीं हैं ...
मैं तुम्हारे निराकार स्वरुप कों
अपनी कल्पना से साकार कर
उसकी निगाहों में
अपनी छवि निहारना चाहता हूँ

एक कवि का प्यार
बाह्य कभी हो ही नहीं सकता
मै तुमसे तुम्हें मांग लूंगा
एक दिन ....देखना

किशोर कुमार खोरेन्द्र

मंगलवार, 5 नवंबर 2013

712-"एक छाँव"

"एक छाँव"




साये की तरह
मैं तुम्हारा पीछा कर रहा हूँ
हो गए हैं बहुत दिवस
व्यतीत हो चुके
न जाने कितने बरस
पर तुम नदी कि तरह
भागती ही जा रही हों
चंचल हैं
तुम्हारे मन का लहर
पल भर के लिए भी ठहरती नहीं हो
मेरे समक्ष
तुम्हे मिली नहीं फुरसत
तुम्हे क्या वह क्षितिज प्रिय हैं
जो अप्राप्य हैं
छूना चाहती हो महत्वाकांक्षा. का
सबसे ऊंचा शिखर
तुम्हारे स्वागत में हर मोड़ पर
खड़ा रहता हूँ
लेकिन तुम
मुझे देखते ही
कोहरे की लकीर सी जाती हो सरक
मैं यह नहीं कहता की
तुम पर मेरा हैं हक़
मैं तो सिर्फ एक छाँव हूँ
मौन का गहन प्रभाव हूँ
कहीं तुम जिंदगी की तरह तो नहीं हो
जिसे कोई नहीं पाया हैं
अब तक समझ
किशोर कुमार खोरेन्द्र

सोमवार, 4 नवंबर 2013

711-"चिर अहसास"

"चिर अहसास"

कहीं  मैं वह तो नहीं हूँ
जो
तुम्हारे घर की  छत पर
कटी हुई पतंग सा आ गिरा था

आँगन में उड़ते उड़ते पहुँचे हुए
एक आवारा पत्ते सा
तुम्हारी शरण में आ दुबका था

एक तिनके सा
तुम्हारी आँखों को चुभ गया था

वर्षा की  बौछार बन
तुम्हारे दामन को भींगा गया था

आईने में  एक चिर परिचित
प्रतिबिम्ब के सदृश्य उभर आया था

या जो

कमरे के  कोने में
तुम्हारी आशंकाओं  के जालों सा
फ़ैल गया था

तुम्हें काफी दूर से
कोयल की मधुर आवाज की  तरह
लगा था

या जिसे सरोवर में खिल आया
कमल समझकर
तुमने तोड़ लिया था
जिसे तुमने जलेबी के रस से नम
अखबार के टुकड़े मेँ
छपी हुई कविता सा
पढ़कर कंठस्थ  कर लिया था

मैं हर वही  यादगार लम्हा हूँ
जो तुम्हे पसंद हैं
कभी आकाश में
चहल कदमी करते हुए
बादलों का समूह हूँ
जिनके द्वारा निर्मित
विभिन्न आकर्षक  आकृतियों को
निहारते हुए
तुम स्व्यं  को विस्मृत कर जाती हो
कभी न लौट कर आनेवाला
नदी का प्रवाह हूँ
जिसकी वजह  से तुम

मन मसोस कर रह जाती हो

ख़ैर मैं  जो भी था
अब तुमने
एक कोरे कागज़ के समान
अपने मन के दराज  में
मुझे सुरक्षित रख लिया हैं
वक्त मिलने पर
अपनी इच्छा अनुसार पढ़ लेती हो
यह सोचकर की
मुझमे वही लिखा हैं
जो तुम्हारे हृदय  में  हैं
हालाँ कि मैं
एक कोरा कागज़ ही हूँ
कहीं मैं
वह इंतज़ार तो नहीं हूँ
जिसमे आगंतुक का
न कोई चेहरा होता हैं न नाम
जिसमे होता हैं बस
बिछड़े होने का चिर अहसास

किशोर कुमार खोरेन्द्र

रविवार, 3 नवंबर 2013

710-माहिया

माहिया

सुखद मलय शीतल हैं
भ्रमण सुबह भाये
सुमन महक विलय हुआ

सपना हैं या माया
नज़र परख लेगें
तू छू मत यह छाया

अच्छी होगी नीयत
धोखा मत देना
उसकी हैं कीमत

छल बल से पाया जय
सत पथ पर चलना
समझों इसका आशय

किशोर

709-"प्रकृति "

"प्रकृति "

बीज में छिपी होती हैं
मजबूत जड़ ,हरी पत्तियाँ और टहनी
बूंद में समाहित हैं
वीरान तट ,चंचल लहरें और नदिया गहरी
रज कण में चलती हैं
वे पगडंडियाँ जो ,कभी न थकी न ठहरी
तारों को पता हैं
अतीत की सारी बातें साहसी और सहमी
मन के भीतर हैं
चेतना का हर स्तर उच्चतम और सतही
नियम शाश्वत हैं
सूर्योदय ,सूर्यास्त और चन्द्रमा की आभा
कभी बड़ती तो कभी हैं घटती




यही हैं संसार की नियति
मछली जल से बाहर
नहीं हैं रहती
दुःख हो या ख़ुशी
आँसू की बूंदे नमकीन ही हैं लगती
विचार के अनुरूप नहीं होता जीवन
जन्म और मृत्यु से परे हैं
प्रकृति की रहस्यमयी सहमति
किशोर कुमार खोरेन्द्र

शनिवार, 2 नवंबर 2013

708-"एक नन्ही चिड़िया"

"एक नन्ही चिड़िया"

 

यह कैसा है महावृत्त
जो है अपरिमित
जिसमें व्यास है न त्रिज्या
उसे छूना जितना चाहूँ
उसकी परिधि भी लगती है
तब क्षितिज सी मिथ्या
बिना केंद्र बिंदु के
किस प्रकार से -
खींची है किसने
बिना आकार की
यह गोलमाल  दुनियाँ
न ओर का पता, न छोर का
फिर भी -
आकाश को भी
अपने परों से नाप रही है
हर मन के घोसलें  से .उड़कर
एक नन्ही चिड़िया
किशोर कुमार खोरेन्द्र

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

707-mahiya

मेरा मन तेरा घर
रहना आजीवन
चिंता ना कोई डर


रखना सच से वास्ता
जीतो या हारो
जग में पालो रास्ता



एक अच्छा हो पाठक
छन्दों की रचना
बनता लेखक साधक



लौटा कर दो बचपन
हो मनचाहा सब
होने ना दूँ अनबन



kishor

706-मुक्तक

जब भी मैं जीता कोई हार गया था
कड़ी मेहनत से बाजी मार गया था
भ्रमवश मुझे अहंकार हो गया
था
 जाना सबको हैं कहा कई बार गया था



वह चंदा सी खूबसूरत हैं पर उसमें चमक ज्यादा हैं
वह फूलों सी सुकुमार हैं पर उसमें महक ज्यादा हैं
कलाई में रंगीन चूड़ियाँ हैं पर उसमे खनक ज्यादा हैं
मिलन असम्भव हैं मेरे मन में कसक ज्यादा हैं


तुम्हारे शहर से रेल सा गुजरता हूँ अच्छा लगता हैं
तुम्हारा जिक्र हो तो उसे सुनता हूँ अच्छा लगता हैं
सपनों मेंख्यालों में तुम्हे बुनता हूँ
तुम्हारे पद चिन्हों पर रुकता हूँ अच्छा लगता हैं

तुम्हे दूर से देखा हूँ परिचय नहीं हैं
अनदेखा कर दो मुझे शिकायत नहीं हैं
रुबरु न मिलों इस पर विस्मय नहीं हैं
इश्क़ एक जूनून हैं यह अभिनय नहीं हैं



 इस जहाँ में कोई तो होगा एक शख्स
मेरे जैसा 
मन दर्पण में जिसके होगा एक काल्पनिक अक्स मेरे जैसा 
मृदु कविताओं से जिसे होगा बेहद इश्क़
तन्हाई में जीने की आदत होगी जिसे बेशक
मेरे जैसा 

 वो शहर वो गलियां वो मोड़ वह उपवन
मुझे याद हैं
 प्यार की मीठी बूंदों से भींगी थी नस नस वह सावन मुझे याद हैं
तुम्हारी रेशमी जुल्फें सुन्दर रुख मृग से दो नयन
अगले जन्म में फिर मिलने का दिया था वह वचन
मुझे याद हैं



 

705-"नि:शब्द "

"नि:शब्द "

किसी शब्द के माथे पर
बिंदु सी बिंदी लगाना
भूल जाता हूँ
तो बिंदु नाराज हो जाती हैं
अक्षर कहते हैं हमें जोड़ो
शब्द कहते हैं हमें बोलो
वाक्य कहते हैं हमें पढ़ों
छंद कहते है हमें गाओ
शरीर रूपी बोगी में
बैठकर मेरा एकाकी मन
अपनी आत्मकथा लिख रहा हैं
जो कभी खत्म नहीं होगी
इस कथा में
न अल्प विराम हैं न पूर्ण विराम हैं
बिना पटरियों के ही
मानों ख्यालों की रेल
अबाध गति से दौड़ रही हैं
लेकिन
तुम्हारी मुस्कराहट को
तुम्हारी आंखों में समाये
मौन को
मेरा मन नहीं लिख पाता हैं
सौभग्य की लहरों के आँचल की तरह
तुम मेरे करीब आकर लौट जाती हो
जाते हुए आँचल के छोर को मैं
कहाँ पकड़ पाता हूँ
असहाय सा बेबस सा
निर्मम वक्त के समक्ष
निरुत्तर हो जाता हूँ
अपने मन से भी ऊपर
परे
उसका नियंत्रक
"मैं "जो हूँ
इसलिए मेरी तरह
वे सारे अक्षर
वे सभी शब्द
वे लंबे वाक्य
वे मधुर छंद
समुद्र की तरह हाहाकार करता
हुआ सा मेरा एकाकी मन
सब चुप हो जाते हैं
नि:शब्द हो जाते हैं
स्तब्ध हो जाते हैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र

मंगलवार, 29 अक्तूबर 2013

704-"मुझ तट के लिए"

"मुझ तट के लिए"


दर्द के समुद्र की

गर्जनाओं से बने

मौन की तरह ..

तुम चुप हो



रेत के टीलों से बने शहरों से

निर्मित ...

एक् चट्टान से सहारा लेकर

विश्राम करती हुई

मेरी रीढ़ की नसों मे

तुम ...

स्मरण की प्रवाहित

झंकृत धुन हो



युगों के विरह की

अग्नि मे तपकर

एकत्रित ईटो से बना

मेरे पदार्पण के इंतज़ार मे

अकेले खड़े .. तुम

एकांत का सुदृढ़ पुल हो



शिखर पर जमी बर्फ सा

न तुम पिघलते हो

न बहकर मेरे करीब से गुजरते हो

जल रहित अदृश्य से हो तुम

लेकीन



मुझ तट के लिए

बहती हुई नदी होने के

अहसास से परिपूर्ण हो

किशोर

रविवार, 27 अक्तूबर 2013

703-"सपनो के यथार्थ ने"

"सपनो के यथार्थ ने"

सपनो के यथार्थ ने

मुझसे पूछा -

क्या तुम मेरे पास ही रहोगे

मैंने कहा -

तुम्हें देखते देखते

मै स्वप्न बन गया हूँ

तुम्हारा मन

तुम्हारे शब्द बन गया हूँ

तुम पढ़ सकती हो मुझे

अपने सौन्दर्य की आत्मा कों

निहार सकती हो मुझमे

लेकीन मै तुम्हारी आत्मा की देह तक

 पहुँच नही सकता



तुम्हारे ध्यान की रोशनी मुझे

आत्मसात नही कर सकती

 क्योंकि प्रेम सतत वियोग  है

तभी तक जीवन की चेतना में

मै तुम्हें जीवित रख पाऊंगा

तुम्हें तलाश लेने के

पश्चात भी

तुम्हें खोये रहने की

मुझमे लगातार पीड़ा है

केवल मेरे पास

मेरी आँखे बंद हो

या खुली .........

हर परिस्थिति  में

तुम्हारे परछाई की साकार देह की

महक है मेरे पास

केवल ..महक

किशोर  कुमार खोरेन्द्र

मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

702- माहिया

 माहिया
हुआ ना कर बेज़ार
रहता आया हैं
आपका ही इंतज़ार


बाहर सब कुछ माया 
मन की सुन्दरता 
न कभी है भरमाया


नर मय हैं नारायण
रावण असत्य हैं
रोज पढ़ें रामायण

उड़ जाती हैं रंगत
रहना सब मिलकर
करना अच्छी संगत


कुसंग साथ नहीं हो
जहरीला हैं वह 
अमृत होता सुसंग


ना हैं कोई दूजा
बेजान संग हैं

करता तेरी पूजा



अमर रहेगी आत्मा 
नश्वर हैं काया 
ह्रदय  me परमात्मा 
किशोर

मंगलवार, 15 अक्तूबर 2013

701-"महफूज़ "

"महफूज़ "
आओं बेतकल्लुफ़  हो जाए
न कोई बंदिश हो
न ही कोई तखल्लुफ़  हो पाए
उतार कर देहरूपी परहन
छोड़कर मन के अलंकृत प्रलोभन
रूह की पवित्र नदी में
गहरे तक डूब जाए
प्रेम पथ में साथ साथ
इस तरह चले कि
तुम्हारे आँचल को
मेरी कमीज़ कभी छू न पाए
ताकि
ऐसा कभी न हो कि
एक दूसरे   से
हम दोनों रूठ जाए
जो तुम कहना चाहती हो
तुम्हारी जुबाँ तक आकर
न रुक जाए
आओं बेतकल्लुफ़  हो जाए

न मैं दिखावा करूँ
न तुम करना संकोच
खामोश रहते रहते
ऐसा न हो एक दिन
हम विमुख  हो जाए
तरीकत  के लिए
जरुरी हैं कि
अंतर्मन की सभी रहस्यमयी गाँठें 
एक दूसरे के समक्ष  खुल जाए
समर्पण इस कदर हो कि
हम एकाकार ,एकरूप हो जाए

आओं बेतकल्लुफ़  हो जाए

तुम्हारी हथेली की गहरी लकीरों में
मेरी हथेली की उथली लकीरे
गुम  हो जाए
तुम्हारी आँखों में मेरा अक्स दिखे
मेरी निगाहों में ,हे महरुख ....!


तेरा ही नूर नज़र आए
न उल्फ़त घटे ,न कशिश कम हो
क्यों न
हिज्र फिर से बरसों तक
बदस्तूर जारी रह जाए
तुम कस्तूरी हो ,मैं चन्दन हूँ
दुनियाँ  के इस जंगल में
महक हमारी सदा
महफ़ूज  रह जाए
आओं बेतकल्लुफ़  हो जाए

@किशोर कुमार खोरेन्द्र
{ बेतकल्लुफ =स्वाभविक ,अंतरंग ,बंदिश =बंधन ,तखल्लुफ़ =प्रतिज्ञा भंग होना ,
तरीकत =आत्म शुददी ,हिज्र =वियोग ,बदस्तूर =यथावत , महरुख =चन्द्रमुखी ,या नायिका महफूज =सुरक्षित }

सोमवार, 14 अक्तूबर 2013

700-"टूट कर बिखरे हुए"

"टूट कर बिखरे हुए"


आईने में जमी धूल की तरह तुम मुझे

साफ़ कर देना चाहती हो

पानी में तैरते तिनकों की तरह तुम मुझे

हिलोर कर

अलग कर देना चाहती हो

पन्नों पर अंकित मेरी कविता के शब्दों कों

मिटा कर

उन्हें हाशिये पर रखना चाहती हो

तुम ..मुझे ...सूखी हुई गुलाब की पंखुरियों की तरह

अपने मन के रुमाल में बांधकर

  विसर्जित कर देना चाहती हो

तुम चाहती हो कि....




मेरा नाम या कोई निशाँ

तुम्हारे जीवन की जुबान पर शेष न रह जाए

मै खुद कों आज

अजनबी और अवहेलित सा

महसूस कर रहा हूँ

मेरे स्नेह और प्रेम कों

तुमने खुबसूरत बादलों के आकाश से

काँटों से भरी जमीन पर उतार दिया .हैं .

टूट कर बिखरे हुए कांच  के  टुकड़े

मुझे चुभ रहें हैं

मै तुम्हारे लिये पहले भी कुछ नहीं था

और आज भी कुछ नहीं हूँ

शायद अब तुम मेरे न होने पर

अपना  स्वच्छ  चेहरा

दर्पण में निहार सको

किशोर  कुमार खोरेन्द्र

रविवार, 13 अक्तूबर 2013

699-"सौन्दर्य "

"सौन्दर्य "

फूल जब तक रहा खिला

सुगंध उससे मुझे मिला

रंग में उसके दिन भर

मन मेरा उलझा रहा

मोहित कर गयी मुझे

उसकी कोमल पंखुरिया 



कभी

गुनगुनाता हुआ आता

हैं मधुप

कभी

कलियों कों

चूम लेती हैं तितलिया

प्यार उनका निहारने

फुनगी पर

चुपचाप बैठी हैं

देखो एक ढीट चिड़िया

पवन के झोंकों के विरुद्ध

संघर्ष करता हुआ

यह पुष्प ,वृंत पर

दृढ़ता से हैं रहा टिका

ठीक साँझ होने से पहेले

जड़ों के करीब

क्षत विक्षत मुझे वह दिखा

न फूल ,न उसकी पंखुरिया

न वे मधूप ,न वे तितलिया

न वह धूप ,न वह चिड़िया

जान पाए कि...

कयों एकाएक

अश्रुपूरित हो गयी हैं

सौन्दर्य पर मुग्ध थी

जो ..मेरी अँखियाँ



किशोर

शनिवार, 12 अक्तूबर 2013

698-काँच का मनुष्य

काँच का मनुष्य


तुम मुझे
अपने आंसुओं के पवित्र जल से रोज नहलाती हो
तुम मुझे
हिरदय के अपने स्व्क्छ रूमाल से
साफ़ करती हो

मेरे लिए यही
प्राथना करती हो
हे प्रभू
इसे टूटने मत देना


फिर दुनिया के स्वागत कक्ष मे रख देती हो

यह कहते हुए
कि
जब लोग आये
तब
अपने दिल के आईने मे
रखी मेरी तस्वीर मत दिखा देना

मुझसे अनजान बने रहना
मुझे देखना मत
मेरे करीब मत आना
मेरा नाम मत पुकारना

लेकीन मै तो
आर -पार दिखाई देने वाला
कांच का मनुष्य हूँ

उसके आंसू
मेरी आँखों की दुनियाँ मे सुरक्षित है
उसके स्पर्श के हाथो की कोमलता
मुझसे
देह की तरह चिपकी हुई है

उसकी शाश्वत कामना है -
मै साबूत रहूँ

और वह
मेरे पारदर्शी शीशे की
अटूट आत्मा के दर्पण मे
अपनी विभिन्न परछाईयों कों
निहारती रहें -मुक्त और स्वतंत्र समझ

पर मै
नाजूक कांच का मनुष्य
उसके प्यार और सौन्दर्य की
आंच से
कभी भी
टूट कर बिखर सकता हू

और स्वागत कक्ष मे
उपस्थित निगाहों कों ...
अपने प्रेम से घायल
व्यक्तित्व के प्रखर टुकडो से -
चूभ सकता हूँ

kishor kumar khorendra

बालार्क'

Hind Yugm Prakashan's photo.
आज से हम रश्मि प्रभा (Rashmi Prabha) और किशोर कुमार खोरेन्द्र (Kavi Kishor Kumar Khorendra) के संपादन में आने वाले 30 कवियों की चुनिंदा कविताओं के संग्रह 'बालार्क' की प्रीबुकिंग शुरू कर रहे हैं। किताब 19 अक्टूबर 2013 से से डिलीवरी के लिए तैयार रहेगी। प्रीबुकिंग पर अधिकाधिक छूट दी जा रही है।

@Snapdeal: http://www.snapdeal.com/product/balark/1173031843 (30% छूट के साथ, कैश ऑन डिलीवरी सुविधा के साथ)

@Infibeam: http://www.infibeam.com/Books/balark-hindi-kishore-khorendra-rashmi-prabha/9789381394571.html (20% छूट के साथ, कैश ऑन डिलीवरी सुविधा के साथ)

@BookAdda: http://www.bookadda.com/books/balark-rashmi-prabha-9381394571-9789381394571 (7% छूट के साथ, कैश ऑन डिलीवरी सुविधा के साथ)

*कैश ऑन डिलीवरी का आशय यह है कि आपको इस किताब को ऑनलाइन खरीदने के लिए क्रेडिट कार्ड/डेबिट कार्ट/नेट बैंकिंग आदि के माध्यम से पहले मूल्य नहीं चुकाना है, बल्कि जब किताब आपके घर पहुँच जाए तो कोरियर वाले को नगद पैसे देने हैं।

shbd sanvaad







gulmohar




शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

697-"जीवन "

"जीवन "

पक रही हैं धान की फसल
खेतों में जैसे बिछ गया हैं
दूर दूर तक स्वर्णिम आँचल
कच्ची बालियों के ऊपर बैठी
एक नन्हीं चिड़ियाँ

सोच रही हैं हवा के झोंकों में
क्यों नहीं हैं हलचल
मेड़ों पर ठहरे हुए से पदचिन्ह
भयभीत हैं
गीली मिटटी में कहीं
उनके पाँव भी न जाए फिसल

छोटे छोटे गड्डों में
समाये हुए हैं
अंबर के भीमकाय बादल
तालाब की सतह से
शीश उठाये झांक रहे हैं
रह रह कर
खिले हुए नीलकमल
बबूल की शाखों पर मौसम ने
हल्दी सा छिड़क दिया हैं
पीली पंखुरियां सुकोमल
धूप में तपकर
सूरजमुखी की सुन्दरता
और गयी हैं निखर


पलाश की हथेली सी पत्तियों पर
सौभाग्य की अमिट रेखाएँ
आयी हैं उभर 
 
अतिथि की तरह अचानक
टपक पड़ता हैं आकाश के छत से
बूंद बूंद भर जल
सुबह सुबह कोहरे की
घनी परतों को भेदकर
सूरज भी नहीं पाता हैं
आजकल निकल


नदी की
लहराती मंथर गति को देखकर
चट्टानों का
दिल भी जाता हैं मचल
ऐसे में परछाईयों को भी
एक दूजे से प्यार हो गया हैं
उनका ह्रदय भी हैं विकल


भोर से गए पंछी आये या नहीं
चिंतित संध्या के माथे पर हैं बल
मनुष्य मनुष्य से
करते हैं अक्सर छल
प्रकृति तो हैं
सीधी साधी और सरल
अनुशासित और शाश्वत हैं
उसके नियम अटल
दुःख और सुख के बराबर बराबर
अनुभवों में विभाजित हैं जीवन
किशोर कुमार खोरेन्द्र

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2013

696-"कंठस्थ "

"कंठस्थ "

तुम
मेरा वह चश्मा हो
जिसके बिना
मैं देख नहीं सकता
तुम
मेरी वह कलम हो
जिसके बिना
मैं लिख नहीं सकता
तुम
मेरी वह डायरी हो
जिसके पन्नों में
मैं अक्षरस: अंकित रहता हूँ
तुम
चाय में शक्कर की तरह
घुली हुई रहती हो
मेरे मन के खेतों में
गन्ने की तरह उगी हुई रहती हो
गमलों में तुम्हे
मैं प्रतिदिन खिलते हुए देखता हूँ
तुम शीतकालीन गुनगुनी धूप हो
शरद ऋतू की मधुर  ज्योत्सना हो
तुम्हारे कारण  मेरे जीवन में
इसलिए
गर्दिश का अँधेरा टिक नहीं पाता
तुम्हारी उदारता से अभिभूत
मेरे अंतर्मन का
तुम वह खूबसूरत हिस्सा हो
जिसकी वजह से
पतझड़ के मौसम का
मुझ पर दुष्प्रभाव नहीं पड़ पाता
जेठ की भीषण गर्मी
मुझे झुलसा नहीं पाती
रास्ते में बिखरे हुए
कांच के टुकड़ों
या
बबूल के नुकीले काँटों से
मेरे पाँव सुरक्षित बच  जाया करते हैं
तुम मेरे लिए
सारगर्भित विचार हो
सकारात्मक चिंतन हो
जिनसे मुझे यह बोध हुआ हैं कि
मैं जन्म और मत्यु से परे हूँ
तुम कभी न समाप्त होने वाली
मेरी शाश्वत चेतना हो
गति हो ,… प्रवाह  हो
इसीलिए मैं
कमल के पुष्पों से सुसज्जित
सरोवर की तरह प्रफुल्लित रहता  हूँ 

तुम स्वर हो
तुम व्यंजन हो
और मैं उनसे जुड़कर बना
एक सार्थक शब्द हूँ
मुझे.,तुम .
महावाक्य की तरह कंठस्थ  हो
अटूट प्रेम के अविरल भाव की तरह
तुम्हें
मेरे ह्रदय ने आत्मसात कर लिया हैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र

बालार्क'

रविवार, 6 अक्तूबर 2013

695-07-10-1954 से 07-10-2013 तक

07-10-1954  से   07-10-2013 तक 



















आज मेरा ५९ वाँ  जन्म दिवस हैं 
आरम्भ के छ: वर्षों  का ज्ञान नहीं हैं 
पहली से पांचवीं  तक भिलाई छत्तीसगढ़ में पढ़ा 
छठवीं से ग्यारहवीं तक रायपुर  छ्ग़.  में पढ़ा 
बी ए pratham  से अंतिम तक रायपुर में पढ़ा 

१४साल तक पढाई करने के पश्चात पत्रकारिता ,टायपिंग 
की कक्षा में गया एक वर्ष तक 
फिर बैंक की परीक्षा की तैयारी किया 

18-10 -77 से मैं प्रतिस्पर्धा में  उतीर्ण होकर  भारतीय स्टेट बैंक में 
कैशियर बन गया 
18-10-84 से फिर मेरी पदोन्नति  हुई और मैं अधिकारी बन गया 

दल्ली राजहरा ,बालकों ,सक्ती ,बरमकेला ,बलौदा बाजार ,नवापारा राजिम ,
ताड़ोकी ,अंतागढ़ ,बागबाहरा। .इत्यादि शाखाओं में  पदस्थ रहा 

ब्रांच मैनेजर रहते हुए मैं  18-04-2006 में बैंक से वी आर एस लेकर सेवा निवृत हुआ 

तब  से अपने जीवन की महत्वपूर्ण अभिलाषा याने काव्य सृजन में रत हूँ 

किताबें पढ़ने का भी मुझे शौक हैं 

वर्तमान में पिता जी का देहांत  पिछले साल हुआ ,माँ हैं ,पत्नी हैं ,दो बेटे हैं एक पुत्री हैं 
एक दामाद हैं ,एक नाती हैं ,सास ससुर हैं 

raipur  में रहता हूँ ,मुंगेली में मेरा गाँव हैं वहां अक्सर जाया करता हूँ ,माँ  वही  रहती हैं 

उनकी उम्र पच्यासी साल की हैं 




मेरी धर्म पत्नी शिव की पुजारन हैं ,वह विदुषी हैं ,वह मुक्त आत्मा हैं ,
मेरे घर के आँगन में शिव जी का मंदिर हैं 



नेट पर मेरा प्रवेश अक्टूबर दो हज़ार आठ से हुआ हैं तभी से  यह ब्लॉग बनाया हैं 

आरकूट से फिर मैं फेसबुक तक पहुंचा ,इस बीच बहुत से मित्रों का प्रोत्साहन मुझे 
मेरे लेखन के लिए मिला 

मेरे लिए प्रक्रति ,ईश्वर ,कल्पना  =तीनों का मतलब एक ही हैं 
इन्हें अपनी कविताओं में एक साथ प्रस्तुत कर मैं चैतन्य हो उठता हूँ 

बचपन से मैं प्राय: अकेला ही रहता आ रहा हूँ ,किताबे मेरे दोस्त रहे हैं 
धरती में 
वृक्ष ,नदियाँ ,पर्वत 
और 
आकाश में 
तारों के समूह ,चाँद ,सूरज 
मुझे बहुत प्रिय हैं 

देह से ,मन से परे 
स्वयं को मैं एक चेतन के रूप में इस कायनात में उपस्थित पाता  हूँ 
मैं आस्तिक हूँ 
मैं अंतर्मुखी हूँ 
मैं अत्यंत संवेदनशील हूँ 

रंग बिरंगें बादलों से आच्छादित नभ ,सुबह का समुद्रीय तट ,
सागौन ,साल ,के वृक्षों से भरे वन ,पर्वतों की ऊँची चोटीयाँ 
पगडंडियाँ ,घाटी की or  चढ़ती हुई घुमावदार सड़कें ,
मुझे लिखने की प्रेरणा देते हैं 
मैं विरह की अपेक्षा मिलन के सौन्दर्य का उपासक हूँ 



किशोर कुमार खोरेन्द्र 
रायपुर 
सात अक्टूबर दो हजार तेरह