मंगलवार, 14 अगस्त 2012

क्या मैं हूँ....

निभा रहा हूँ उसे
तुमने रखी थी जो शर्त

परन्तु आज तक
समझ नहीं पाया हूँ
मै उसका अर्थ

मुझसे मिले बिना मुझे चाहना
तुमने जाते जाते यही कहा था
तब मैंने हां कह दिया था
आजीवन क्या इस बात पर
मैं अडिग रह पाउँगा
सोचा करता हूँ आजकल
क्या मैं हूँ इतना समर्थ ..?

किशोर

मित्रवत रिश्ता


तुमने दिया हैं मुझे
जो सिमित अधिकार
उस सीमा तक ही मै कर सकता हूँ
तुमसे व्यवहार

मेरे इस जीवन में तुम मेरे लिये
ईश्वर द्वारा मिला
एक हो उपहार

तुम खुद कों पढ़ सकती हो
मेरी कविताओं के द्वारा
उन्हें लिखने के उपरान्त

तुम ही कहती हो की
मै अपने मन की भावनाओं कों
शब्दों के जरिये अभिव्यक्त
कर पाने में हूँ निष्णात

दर्द तुम्हारा मुझे अपना सा लगे
ऐसे भी आते हैं
बातचीत के दौरान लमहात

मै कह  सकता हूँ साफ़ साफ की
मुझे पसंद हैं
तुम्हारे आकर्षक व्यैक्तित्व में ..
तुम्हारी रूह और उसका
जिस्म रूपी खूबसुरत परिधान

पर हम दोनों एक दूसरे के प्रति
कयों हैं बंधे बंधे से
मिल पाना कठिन हैं इसका
मेरी दृष्टी में उचित समाधान

इस पृथ्वी पर लोग बहुत मिलते हैं
पर कुछ ही ऐसे व्यक्ति होते हैं
लगता हैं जैसे कर रहें थे हम
उनका बरसों से इंतज़ार

और जिनसे उम्मीद रखते हैं की
यह ..मित्रवत रिश्ता बना रहें
आजीवन बरकरार

किशोर

सोमवार, 13 अगस्त 2012


मेरे एक मित्र के लिये ..


मेरे एक मित्र के लिये ..

तुम्हारे रुग्ण शरीर की असहनीय पीड़ा कों
काश ,मै भी कर पाता महसूस
तुम्हारे दर्द कों सहने का सहभागी
मैं नहीं हो सकता
यह सोच  कर मुझे
कुछ नहीं रहा हैं सूझ

अपनी अपनी वेदना कों ..
चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक
स्वयम सहता हैं प्रत्येक मनुज
इसलिए मनुष्य कों
तन्हा कर जाता हैं उसका दुःख

जीवन की इस सच्चाई से अवगत होकर
तुम हो गयी ही अत्यंत भावुक
किसी की मांग सूनी हैं
उस पर भरा नहीं हैं सिंदूर
किसी कों अन्न का एक दाना भी नहीं मिला
लगी हैं उसे जोरो की भूख

दुःख हैं ...
दुःख का निवारण भी हैं ....
ये महावाक्य भी कहाँ  कर पाए हैं
हमें संतुष्ट
सिर्फ सद्भावना के बल पर
नहीं बदल सकते हम
किसी व्यक्ती के वर्तमान जीवन का
दुखद स्वरूप

कष्ट के समय
तिनका तक हाथ छुडा जाता हैं
और दुर्भाग्य के भंवर में
हम जाते हैं गहराई तक ड़ूब
तुम्हारे घर से
मेरा घर यूँ  भी तो बहुत हैं दूर
और रास्ते पर बिछी हैं
अडचनों  की चिलचिलाती हुई धूप
तुम कहती हो
वैसे भी मै किसी का अहसान नहीं लेती हूँ
जबकि तुम्हें तकलीफ  हैं बहुत
इसके बावजूद

निज के स्वतंत्र होने की भावना भी
हम सबमे हैं अदभूत
क्या ..हर बूंद में हैं एक महासमुद्र
इस सत्य कों जानने के लिये
हम सब  में हैं ...
एक जुनून
तुम्हें आत्मसात कर
तुम्हारी रूह से मैं  एकाकार हो चुका हूँ
पर मेरी इसबात का,,,,,
मेरे पास प्रत्यक्ष कहाँ हैं साबूत
किशोर

रविवार, 12 अगस्त 2012

483-मौसम भी हैं खामोश

Kishor Kumar Khorendra द्वारा 11 अगस्त 2012 को 11:33 बजे · पर
पंखुरियों के अंक में हैं
नन्ही नन्ही ओस
भींगा भींगा सा ..
मौसम भी हैं खामोश
खोयी सी लगती हैं  पगडंडियाँ
रास्ते भी पथ भूले भूले से
लगते हैं जैसे वे सब भी
नींद में हो बेहोश
न जाने पर सुनहरी किरणे
किसे रही हैं खोज
सूनेपन की रेत बिछी हैं हर ओर
क़ाला अंधियारा धीरे धीरे छंट गया
धुली धुली सी लग रही हैं भोर
सागर में ..
आती  हुई तरंगे  कर रही हैं शोर
मन करता हैं बढ़कर ..
थाम लूँ लौटती हुई लहरों के
सिंदूरी आंचल का छोर
पंखुरियों के अंक में हैं
नन्ही नन्ही ओस
भींगा भींगा सा ..
मौसम भी हैं खामोश
किशोर

484-तुम हो वही ...

Kishor Kumar Khorendra द्वारा 11 अगस्त 2012 को 15:44 बजे · पर
मेरी सारी कल्पनाएँ ..
अधूरी हैं ...

तुम्हारे बिना
इसलिए साये की तरह मैं
किया करता हूँ ...

तुम्हारा पीछा


मैं ही वह ...

तिनका होता हूँ
जिसे तुम . तन्हाई में यूँ  ही
तोड़ लिया करती हो
मै ही वह ....

रेत हुआ करता हूँ
जिसे तुम मुट्ठी में भर

फिर गिरते हुए देखा करती हो
मैं समुद्र के मंझधार में फंसा
वह नाव  ....

हुआ  करता  हूँ
जिसके प्रति तुम
करुण  हो जाया करती हो

कभी कभी जब तुम्हारी इच्छा होती हैं

मुझे गुलाब की तरह
अपने जुड़े में ....

सजा लिया करती हो

तुम जिसे अपने कन्धों पर

फैला दिया करती हो

मै तुम्हारे आँचल का वही हूँ

प्रेम के

गाड़े रंग से रंगा एक सीरा



आईने के सामने जब भी तुम आती हो

प्रतिबिम्ब सा मै कह उठता हूँ

तुमसा सुंदर इस जहाँ में

मुझे कोई और न ..दिखा



तुम्हारी तस्वीर कों जब भी देखता हूँ

हर बार तुम नयी लगती हो

तुमसे बात करूँ  या न करूँ

मन में होती हैं

पर संकोच वश ..यही दुविधा


तुम न जाने मुझसे क्या ...

कहना चाहती हो

तुम्हारी ख़ामोशी के वृत्त से
मै केंद्र की तरह ....

सदा रहता हूँ घिरा



मेरे ख्यालों का तुम सावन  हो

जिससे रहता हूँ मै भींगा

मै यदि कहानी हूँ तो तुम हो

उसकी एक ..आदर्श नायिका


जिसे मै रोज लिखना चाहता हूँ
पर अब तक ..

नहीं लिख पाया हूँ
तुम हो वही ...

मेरी अदभुत कविता

किशोर