बुधवार, 30 दिसंबर 2009

तुम



तुम विस्तृत आकाश हो


मै सिमित धरती



तुम उड़ते उन्मुक्त बादल हो


मै एक् लकीर पर बहती नदी


तुम सुन्दर स्वप्न हो


मै मन की शुभ antardrishtii



तुम बान्हे फैलाए तट हो


मै मंझदार मे


डगमगाती सी चिंतित खडी



तुम क्षितिज सा अप्राप्य हो


मै तुम्हें छूने के लीये


जिद्द पर हू अदि



तुम मिलन असंभव हो


मै विरह की जीती


अमिट जिन्दगी



तुम उदयाचल का सूर्योदय


मै अस्ताचल मे


अंतिम तम बन ठहरी



तुम निराकार अनश्वर सम्पूर्ण सत्य हो


मै साकार


देह बनी अधूरी



तुम महानगर मे सचमुच


गौरव पथ हो


वहां से इस


अबूझ गाँव तक की


मै हू अन्नत दूरी



किशोर



जाते जाते साल ने कहा



"इस वर्ष "
मैंने इस वर्ष कोई
गलती नही की है
जाते हुऐ साल से मैंने कहा -
मेरे हाथ से एक् भी
गिलास
गिरकर टूटा नही है
उसने ने -
आश्चर्य से मेरे टूटे हुऐ दिल कों देखा
साल ने फिर मुझे बताया
की वह -
उस जंगल से
उस पेड़ से
उस नदी से
उस व्यक्ति से ....
मिलकर आ रहा है
जिनसे मिलने
तुम गए नहीं
तुम्हारी डायरी मे लिखी
तुम्हारी कविताओ कों तुमसे शिकायत है
जाते जाते साल ने फिर मुझसे
आखरी बार कहा -
तुमने उन्हें लिखा पर जिया नही
प्यार जिससे किया
उसे बताया नहीं
किशोर कुमार खोरेन्द्र

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

सपनों के यथार्त ने मुझसे पूछा



सपनो के यथार्थ ने

मुझसे पूछा -

क्या तुम मेरे पास ही रहोगे

मैंने कहा -

तुम्हें देखते देखते

मै स्वप्न बन गया हूँ

तुम्हारा मन

तुम्हारे शब्द बन गया हूँ



तुम पढ़ सकती हो मुझे

अपने सौन्दर्य की आत्मा कों

निहार सकती हो मुझमे

लेकीन मै तुम्हारी आत्मा की देह तक

पहुच नही सकता

तुम्हारे ध्यान की रोशनी मुझे

आत्मसात नही कर सकती

क्योकि प्रेम सतत विरह है

तभी तक जीवन की चेतना मे

मै तुम्हें जीवित रख पाऊंगा

तुम्हें तलाश लेने के

पश्चात भी

तुम्हें खोये रहने की

मुझमे लगातार पीड़ा है

केवल मेरे पास

मेरी आँखे बंद हो

या खुली .........

हर परिस्तिथि मे

तुम्हारे परछाई की साकार देह की

महक है मेरे पास

केवल ..महक



किशोर

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

ईश्वर संबंधी मेरे मन की सच्ची बाते


१-मनुष्यों के पास समय नहीं है


२-अपने अपने काम मे इतना व्यस्त हो जाते है की फुर्सत ही नहीं मिलती

अपने लीये समय निकलना पडेगा ,तभी तो भगवान् की पूजा कर सकेंगे


३-गीता मे लिखे ज्ञान कों दूर या बाहर से सभी बताते एवं सुनाते है

मगर उस ज्ञान के अनुसार चलना कठिन है ,श्रोता तो हर कोई बन जाता है

४-मीठा मीठा सुनकर केवल समय कों व्यतीत करने से क्या लाभ

वातावरण कों असत्य बोलकर ,हम जहर घोलते है

५-मै आशावादी हू

ब्रम्हांड तो ओम नमः शिवाया मय है

इसलीये सम्पूर्ण जगत या संसार निराशावादी नहीं हो सकता

न है

६-युग के आरम्भ से ही सकारात्मक शक्ति की सरंचना हो चुकी है

७-ईश्वर हमारे भीतर ,बाहर ,चारो ओर है ...ईश्वर ने हमें सा कुछ दे रखा है

चाँद ,सूरज ,वर्षा ,फल ,फूल ,जीवित वृक्ष ..ये सब इत्यादि

८-यह महसूस करने पर पता चलता है की -

हममे आत्मा है

लोग ....सन्यासी ,संत के प्रवचन सुनते है ...जिनमे अधिकाँश धनवान और

सक्षम लोग ही होते है


९-विदेश घूमकर आये संतो कों बड़ा माना जाता है ,

१०=हमें आडम्बर ,प्रापंचो से दूर रह कर केवल ईश्वर का ही ध्यान और

स्मरण करना है

गुरु भगवान् स्वयं है ...केवल उसे याद करने भर से वे प्रकाशित हो जाते है


११-मेरा खुद का अनुभव यह है की -मुझे सतत ईश्वर के साथ रहना पड़ता है

वे प्रकाश के रूप मे मेरे भीतर ,बाहर ,चारो तरफ हरदम रहते है


सुनाने मे तो यह सरल लग रहा है या आश्चर्य मौ भी .........लेकीन

हर कोई उन्के सामीप्य मे रह सकता है

मन की आँखों से उन्हें देखना

अ-बहुत सुन्दर लगता है


शिव शिव कों प्रणाम करती हू

और अपनी बात कों विराम देती हू

ओम नमः शिवाया


आपकी बहन -

बरखा ग्यानी

रायपुर

२८-१२-09

रविवार, 27 दिसंबर 2009

समय का प्रेम



मेरा ना मेरीजाति ....मेरा धर्म

लोगो की तरह

मुझे पुकारते रहें ...

मै उन्हें छोड़ आया

करोडो चेहेरों की भीड़ से

बनी

इस अजनबी दुनिया के

सबसे लम्बे फुटपाथ पर

मै और मेरी यात्रा साथ साथ चल रहें है



मेरी यात्रा -

जिससे मुझे बेहद प्यार है

हम दोनों के मन एक् से है

कभी यात्रा मुझे तलाश करती है

और

कभी मै उसे खोजता हू

लेकीन

हम दोनों

सदियों से बने ..इस धरती पर

अकसर मिल ही जाया करते है

वो मेरी सुन्दर यात्रा है

और .....मै उसका हमसफ़र यात्री



किनारे से लगे ...

मचल रही लहरों के

समुद्र ने हमें देखा

थोड़ी दूर पर खड़े

सबसे ऊँचे पहाड़ ने हमें रोका

बादलो की तरह उड़ता हुवा

आकाश हमें ....छूने के लीये झुका

संसार के सबसे बड़े आँगन की तरह ...

इस घुमती हुवी धरती ने

हम दोनों से पूछा -

कहाँ जा रहें हो ॥?

हम दोनों ने कहा -वही जहां तुम जा रही हो

लोगो की भीड़ से निर्मित -सुनसान इलाके मे

टहलते हुवे लापता ने -

हाँ मे सिर हिला कर ..हमारा साथ दिया

चन्द्रमा झरी रजत किरणों कों

सूरज की तपिश से बचकर भाग आयी स्वर्णिम धूप कों

वृक्षों के नीचे विश्राम कर रही शीतल छाँव कों

नदी के संग मुड़ते हर लचीले मोड़ कों

थकी हुवी सडको कों

जंगल की खुली हवा मे सांस लेती चन्दन की महक कों

हवा के साथ लहलहाती फसल कों

रात मे जलती हुवी लालटेन की तरह ,..दिखायी देते

उस

प्राचीन गाँव कों ..................

सभी कों -हम दोनों का पता था

हम दोनों उन्हें जानते थे

वे सब हम दोनों कों करीब से पहचानते थे

और हम दोनों के अमर प्रेम कों भी ....



परन्तु

मनुष्यों के पास ..............

बड़े बड़े मकान थे

बड़ी बड़ी गाडिया थी

या उनसे भी बड़े बड़े सपने थे

उन्के पास

प्यार करने के लीये समय नही था

अपनों से या अपने आप से मिलने के लीये

वक्त नही था

इसलीये

वक्त के पास मनुष्यों कों सच बताने के लीये

समय नही था

मै और मेरी यात्रा समय के साथ है

समय का प्रेम .....

हम दोनों के साथ है

किशोर






महत्त्व

जीवन मे पूजा पाठ का बहुत महत्त्व है

सत् चित आनंद


शिव योग


१-जीवन मे पूजा पाठ यथाशक्ति करे


२-ज्योतिष ज्ञान है लेकीन उसके जानकार कुछ ही लोग है अत:


अपने अपने भाग्योदय के बारे स्वयं ही मन की शक्ति से


उस सौभाग्य कों जान सकते है


३-ओम नमः शिवाया ..मन्त्र का जाप करते हुवे


शांत बैठ कर ध्यान करना चाहिए


४-सुबह १/२ घंटे तक एकाग्र चित्त से आखे बंद कर प्रतिदिन नियमित रूप से


शंकर जी का ध्यान करने से शीघ्र ही ....लाभ मिलता है सत् चित आनंद की प्राप्ति होती है


५-इस पूजा मे फूल ,अगरबत्ती .दीप ..जरुरी नही है


६-कृपया इसका प्रयोग कर के देखे ,मन्त्र साधने के लीये घर मे ही एकांत ढूंढ़ ले

बाहर जाने की आवाश्यकता नही है /


बरखा दीदी




शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

मै बोल नही पाता...

मै बोल नहीं पाता ज्यादा कुछ
इस बात पर
नाराज न होना कभी तुम
प्रेम के उपवन से उड़कर आते
बहुरंगी ..
शब्दों की तितलियों कों
खुश हो ....
देखता रह जाता हूँ पा सम्मुख
चाहता हू इसी तरह जीवन
चलता रहें
मौन हो
मौन ....
मौन कों सुनता रहें सम्पूर्ण
जीऊ उन्हें कभी न भूल
उसकी अनुभूति से
मेरा हर पल महके
जैसे सुगंधित पुष्प
किशोर

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

वे कहते है मुझसे

कोरे पन्ने मुझे
देखते ही
हो जाते है
कभी कभी प्रसन्न
वे कहते है मुझसे
आओ मेरी पीठ पर
लिखो एक् कविता अपनी मन पसंद
तुम्हारी स्याही का है
दुखमय या सुख मय रंग
तुम्हारे शब्दों के होते है
सुलझे सुलझे या
कभी बिखरे बिखरे से ढंग

मुझे लुभाते है कहते पन्ने
सांस रोक कर लिखती हुवी
तुम्हारी उंगलियों का संग
और
तुम्हारे बोलते मन का सत्संग
मुझे मालूम है -
लेखकीय क्षणों मे अन्तर्निहित
तुम्हारे हिरदय के मूल करुनामय
भावो के दृश्य सप्रसंग
इस जग मे
केवल लाठी ने साथ निभाया
जब हुवा
ठंडी रात मे
एक् भिखारी की देह का अंत

प्लेटफार्म की सीढियों पर बेहोश पडा
रह गया एक् युवक
बैठ बोगियों मे भीड़
ऐसे हुवी गायब
जैसे रेल के पहीयो मे ऊग आये हो पंख

ढाबे से फेंकी गयी जूठन कों
चाव से -
खाते देख एक् मानव कों
छोड़ गए आंसू तनहा मेरी आँखों कों
देख
सत्य का ऐसा कटु दर्शन

किशोर



रविवार, 20 दिसंबर 2009

एक् खुबसूरत भोर

अपनी अपनी देह कों छोड़
रहते मै और तुम
एक् दुसरे के मन मे हो आत्म -विभोर
बीच मे अनाम रिश्ते की है
यह अदृश्य सी ..दृढ महीन डोर
ढूढते है हमें ..
इसके दोनों अंतहीन छोर
विलुप्त सा लगता एक् दूजे मे
हमारे अस्तित्व का हर मोड़
जानना संभव नही है
आखिर मै और तुम
रहते कहाँ कब किस ओर
वियोग मे संयोग का लगता
यह जोर बेजोड़
jaise
चेतना बहती सर्वत्र
चुपचाप ..किये बिना शोर
निशा के आते ही
जब मै प्रकृति सा -
हो जाता हू निराकार और गौण
तब
तुम किरणों के जल बूंदों की छिटो से
करने आती हो
मुझे साकार और पुनर्जीवित ...
बन कर
धवल एक् खुबसूरत भोर
हर रोज
किशोर

तुम मुझे पढ़ती हो

मै लिखता हूँ
तुम मुझे
एक् किताब सा
फिर पढ़ती हो

मेरे दर्दो कों जैसे
इस तरह तुम
शब्द शब्द सहती हो
सूने जग मे
दिन के जाते ही
लगता है मुझे
रात भर शमा सी
संग मेरे देने
तुम जगती हो
किशोर






शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

झरती हुवी पत्तियों सा



तुम्हारी मुस्कराहट की तरह
लगा मुझे
छाँव का शीतल स्पर्श

झरती हुवी पत्तियों सा
लगा मुझे
देह के स्वर्णीम रंग की aabhaa saa
मुझे tumharaa संग

वृक्ष की सघन उचाईयो से
निहारते से लगे
किरणों से भरे
तुम्हारे नयन





ठंडी रेत पर अंकित
हो तुम
मानो
लहरों के द्वारा
छोड़ गयी हो एक पद चिन्ह
दिखलाने पथ
जिस पर चलू मैसाथ
तुम्हारे हो स्वछंद

किशोर