रविवार, 27 सितंबर 2009

शाश्वत तथ्य

यू तो खुल जाते है माँ गीता कों पढ़कर ही जीवन के सभी गूढ़ रहस्य फ़ीर भी सोच रहा हूँ अपने लीये ढूढ़ लू एक नूतन आदर्श मै आकर्षित हो जाता हू देख प्रकृति का मोहक सौन्दर्य मन के एक आँगन मे जानकार मनुष्यों का विभिन्न निजत्व अलग अलग सबकी बोली रंगों कों भर कर बादल बना रहें धरती के द्वार क्षितिज पर खुबसूरत रंगोली अनुभव करती चेतना के संग बस बहता जाऊ यही लगता सत्य तुम भी अपना दुःख हर लो हो कर स्वात्मा सा अभिव्यक्त मै देखता हूँ सब दृश्य मै हूँ एक मनुष्य लेकीन भ्रम वश भूल सम्पूर्णता कों सच लगता निज स्वार्थ वश केवल अपने दृष्टीकोण का सामीप्य बिना करुणा के प्रेम नहीं उपजता हम सब एक है यही है -शाश्वत तथ्य

सोमवार, 21 सितंबर 2009

मै एकाकार हुवा हूँ

लघु तन
वृहद् मन
अति सामान्य
पर
प्रेम भावः लिए
सुविचार हुवा हू

हर पत्ता
trin तक
कण कण सहित सब
हर क्षण लगते अपना
ओस बूंद का एक सपना
मानो
महा आकाश हुवा हूँ

सब मुझं मे
मै सब मे
छाँव धुप
सुख दुःख
निहित मुझमे
मै एकाकार हुवा हूँ

{किशोर }

शनिवार, 12 सितंबर 2009

विस्तृत वन

विस्तृत वन
मे
पथ के
बहके हुवे है कदम

चुपचाप बह रहे है
निर्जन के क्षण

सहित
झर रहे है
मौन - शब्द

पीले भूरे रंग
वृक्ष से पत्तो के संग

बह रहा समीर मंद

स्थिर लग रहे दृश्य

ठिठकी हुवी सी
है परछाईया सब

बाहों मे धुप के
छाया की नर्म देह भी
आलिंगन के आंच से
हो गयी है गरम

स्रोत का मोह त्याग
पहाड़ से उतरकर
प्रेम मे डूबी
सागर की तरफ़ जा रही
नदिया कह रही
मुझसे
आओ पास मेरे
यही है अवसर
मुझमे डुबाकर अपना चेहरा
उतार लो madhaa
mukhautaa saa aadmbar
mera jal hae

mithaa
पवित्र
और निर्मल

{किशोर }

सोमवार, 7 सितंबर 2009

सबको तस्वीर सा देखता हूँ

वर्षा की बूंदों से

मै

भींगा भींगा हूँ

ठंडी पुरवाई से

मै

घिरा घिरा हूँ

पर मेरे मन मे

क्यो है रेगिस्तान की बेचैन रेतो की

तन्हाईया

जैसे

लहरों की भीड़ पाकर भी

सागर का तट

रहता है तनहा

कमल खिलाकर

असंख्य

सरोवर के जल को

विस्तृत निज दर्पण

मौन और सूना है लगता

हर तरफ़ दृश्य है

सबको तस्वीर सा देखता हूँ

पर

कहाँ दूब पाता हूँ

झील की आँखों मे

कण कण जन जन

के मन की अथाह है

गहराईया

मुझे भी चित्र सा

निहारती होंगी

चिडिया

आते जाते देखकर

किनारे पर खड़े

घने वृक्षो से

मेरे बारे भी

पूछती होंगी

पग्दंदिया

{किशोर }

प्यार की क्या कमी है

हरी पत्तीयों से लदी हुवी है टहनिया

शाखाओं को अपने शीश पर उठाये दरख्त

के तने से उतरकर

उछल कूद कर रही है गिलहरिया

हर तरफ़ रंग है

आसमान नीला है

सूर्य किरणों को पीकर

अनेक रंगों मे खिली पंखुरियों सा पंख

लिए उड़ रही है तितलिया

उगी हुवी दूब की प्यास

ओस की एक बूंद नमी है

खुशियों को लेकर साथ चली धरती के पास

प्यार की क्या कमी है

{किशोर }

मुझे अपनी शरण मे रखो

हरी पत्तियों से लदी हुवी है टहनिया

शाखाओं को अपने शीश पर उठाये दरख्त

के तने से उतरकर

उछल -कूद कर रहीं है गिलहरिया


हर तरफ़ रंग है

आसमान नीला है

सूर्य किरणों को पीकर

अनेक रंगों मे खिली हुवी है पंखुरिया


उगी हुवी दूब की प्यास

ओस की नामी है

खुशियों को लेकर संग चली

इस धरती के पास

प्यार की क्या कमी है


वर्षा की बूंदों से मै भींगा भींगा हूँ

ठंडी पुरवाई से मै घिरा घिरा हूँ


पर ....

मेरे मन मे

क्यो है रेगिस्तान के बेचैन रेतो की तन्हाई

लहरों की भीड़ पाकर भी

सागर का तट रहता है तनहा

कमल खिलाकर

असंख्य

सरोवर के जल को लगता

अपना दर्पण फ़िर भी

मौन और सूना


हर तरफ़ दृश्य है

सबको तस्वीर सा देखता हूँ

मई पर ....

कहा दूब पता हूँ ...?>

किसी झील की गहरी आँखों मे

कण कण

जन जन

के मन की

अथाह है गहराईया


मुझे भी एक चित्र सा निहारती होगी चिडिया

मुझे आते जाते देखकर

किनारे पर खड़े

घने वृक्षो से

मेरे बारे मे भी पूछती होंगी पग्दंदिया


इसलिए तुममे

और तुम्हारे चित्र मे मै

अन्तर नही कर पाता

तन को भेदकर तुम्हारे मन का सामीप्य पाकर

मुझे

ऐसा लगता है

जरुर घटी हर

हमारे बीच की दुरीया


इसलिए मै कहता हूँ

सम्पूर्ण जगत है

प्यार के फ्रेम मे जड़ा

सजीव सा ....

लगता एक चल चित्र

यही सच है मेरे मित्र


हम सब है

एक ही सत्य की

अनंत -नदी के आईने मे

प्रगत हुवी असंख्य परछाईया


मई निहारता तुममे

प्रकृति का सम्पूर्ण सौन्दर्य

अभिभूत होता तुमसे

विचार कर

तुम्हारा सामीप्य


प्रेम स्मरण की अंतहीन श्रृंखला है


रखो मुझे अपनी चेतना के

सरस अंश मे

मै पथीक थका धरती की घुमाव दार राह मे

मुझे अपनी शरण मे रखो

त्याग सभी भ्रांतिया


(किशोर}