गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

१३५-अनगिनत ,अनन्त सितारे

रेत पर
पद-चिन्ह
छोड़ जाओ
कुछ दूर चल लूंगा
लहरों को
अपना नाम -पता
बता जाओ
ईसी धरती मे रहता हू
तुम्हें
धुड लूँगा
छांव मे
बैठी रह गयी है
तुम्हारी परछाई
बैठ कर धुप सा
तुम्हें
निहार लूंगा
अनगिनत ,अनन्त सितारे
जड़े है
तेरे आचल मे
जल बनकर उसे
नदी सा बिछा लूँगा
तुम्हारे प्रतिबिम्ब
को तुम मानकर
तुम्हें
न देख पाने का दर्द भुला लूँगा
मालूम है
फूल बनकर
तुम्ही खिली हो
मंजिल हो मगर
राह मे मेरे
पग -डंडियों सा
तुम्ही आ मिली हो
तुम्हारी बांहों के
अ -दृश्य घेरे से
घिरा हुवा होकर भी
तलाशता हू
मै
अपने स-दृश्य
एक् चेहरा
तुम्हारा
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

१३४-और मुझे कुछ कहना था

१-वहां कोई नही था
न भाई
न बहन
न माता -पिता
न ही कोई एक मित्र
सब अकेले थे
और मुझे कहना था कुछ
२-फेकी गयी जूठन मे से
किसी भिखारी को
मैंने
पेट भर खाना खाते देख लिया था
३-एक औरत को
नये कपड़े की तरह
खरीद कर
बाजार से जाते हुवे
मैंने
एक आदमी को
देख लिया था
४-रूप
या
धन
को पाकर
ख़ुद को बडा
सबको छोटा
समझने वाली नजर
को पढ़ लिया था मै
५- लोग नयी कार की तरह
दौड़ रहे थे
लिफ्ट की तरह चढ़ रहे थे
कांच के गिलास मे
नशे की तरह भर रहे थे
६-मुझे भी एक रंगीन चश्मा
खरीद लेना था
अब -तक
७-क्या भुलाना
लगातार लापरवाह
होते जाना
यही जिन्दगी है
८-
माँ
पिता
भाई
बहन
मित्र
पति या पत्नी
गुरु
ये सब केवल
क्या सीडियां है ?
९-क्या बुद्धीमान
वही व्यक्ति है
जो दुसरो को अपमानित
करना जानता है
१०-इन सारे प्रशनो के
उत्तर देने से बचने के लिए
लोग
जमीन खरीद रहे थे
नया घर बना रहे थे
या ख़ुद के गले मे
एक -मुखी
पंच-मुखी
रुद्राक्ष
के माले की तरह
लटक रहे थे

११-मै इस अंधेरे मे
दिए की तरह
जल रहा था
बस्
एकांत
सा
चुपचाप

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

शनिवार, 25 अप्रैल 2009

१३३-आपको शादी मे गलतिया दोहराने की जरुरत नही है

१-विवाह स्त्री और पुरूष का मेल है ,जो प्रेम की डोर से आपस मे बंधते है

उनके दिल एक होकर धड़कते है ,और वे आगे ,ऊपर तथा ईश्वर की तरफ़ बढ़ते है

२-मानसिक और आध्यात्मिक नियमो का अज्ञान- ही सारे वैवाहिक दुखो का

कारण है /

३-चिडचिडा जीवन साथी आम तौर पर ध्यान और सम्मान चाहता है /वह प्रेम और स्नेह का भूखा होता है उसे दिखाए की आप उससे प्रेम करते है ,और उसकी सराहना करते है /

४-वैवाहिक समस्याओ मे हमेशा विशेषग्य की सलाह ले /

५-एक साथ प्राथना करेंगे तो एक साथ बने रहेंगे /

६-आपको शादी मे गलतिया दोहराने की जरुरत नही है विश्वाश करे आपको जीवन साथी आपकी कल्पना के अनुरूप ही मिला है ...या मिलेगा /
{डाक्टर जोसेफ मर्फी ने बताया }
संकलन -करता ...किशोर कुमार खोरेन्द्र

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

१३२-अपना गाँव

१-बरसो बाद
लौटा हू
शहर से
अपने गाँव मे
२-नयी पक्की सड़क ने
मुझे घूर कर देखा
बिजली के खम्बो ने
ने
जैसे
रोक कर
पता मेरा पूछा
नयी बनी नहर
के पानी ने
मुझे चलने से रोका
दूकान मे
सजे नये सामानों ने
गमछा नही खरीदने पर
एतराज
अपना जताया
३-विकास अच्छा हूवा
परन्तु
वो वृक्ष
वो वृद्ध ......?
पीपल
बरगद
नीम
वे सब
अदृश्य हो
गये है
तालाब के पानी का
अब
मंदीर की सीढियों तक
बहाव नही रहा
मेरे घर के सामने का
ईमली
का वह पेड़ भी
धराशायी पडा है
मेरी यादो मे बसा
मेरा वह गाँव
बदल गया है
पर
मेरे लिए तो
खो गया है
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१३१-परछाई

१-तुम -
मेरी परछाई हो
और
मै
तुम्हारी परछाई हू

२-गाढी नीद
से जाग कर
तुमने
देखा होगा
आँख खोलकर
शायद
मै
लौट आऊ
सपनो की दुनिया से
तुहे
तन्हा -छोड़कर

किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१२९-महानदी के उदगम स्थल सिहावा मे

१-सिढीयां ...
और मै ...
चढ़ते गये पहाड़
२-कुछ और
दूर -दूर
जाता दिया दिखाई
नीला ...
आकाश
३-हाथ मिलाने को
उत्सुक
वृक्षो की
टहनियों से

पत्ते ...
आते रहे
हरे -हरे
बार -बार ,
पास -पास
४-थके नही मेरे पाँव
फैलती गयी मेरी दोनों आँख
देख कर
महा नदी का
समीप ही
अर्ध-वृताकार विस्तार
५-नीचे दूर
रेखाओ सी सडको के
या
फीर स्केल -पट्टी सी मेडो
या
पग -डंडी -यो -के
किनारे
कतार -बद्ध
घरो से घिरा
दिखाई दिया गाँव
६-महा-नदी
के इस
उदगम -बिन्दु पर
बिखरे
तितर -बितर
जल -बूंदों मे
स्व-समाहित था
आत्म-विशवास
दर्द
हर्ष
समुद्र तक
पहुचने के लिए
पहले मै
पहले मै
का जोश
उछल -कूद
पारस्परिक -व्यवधान
७-मेने शीश नवाया
प्रणाम
श्रंगी -रिर्षी
के पास था -ज्ञान
एकाएक
एसे लगा
समुद्र तक पहुची
महा नदी
लौट आयी हो
मुहाने से
मुझे
सौपने अपना प्यार
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

१२९-महानदी के उदगम सिहावा मे

२-महानदी के
इस
उदगम बिन्दु पर
तितर -बितर
कांच के छोटे -छोटे
टुकडो जैसे -
बिखरी बूंदों मे
स्व -समाहीत है .....
लम्बी यात्रा के लिए
भरपूर
उछलता हूवा
आत्म -विशवास
गाँवो का दर्द
शहरो का हर्ष
समुद्र तक पहुचने
के लिए
पहले मै
पहले मै
का प्रारम्भिक
बूंदों का ....
तीव्र -संघर्ष
उछल -कूद
परस्पर -व्यवधान
मै शीश नवाता हू

लगता है एक पल को --
अरब सागर से इस उदगम तक
जैसे
लौट आयी है
महानदी
श्रृंगी -रीशी को
पुन:-करने प्रणाम
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१२९-महानदी के उदगम सिहावा मे

१-मै
और
सीडीयाँ
एक साथ
चड़ते गये सिहावा -पहाड़
कुछ और दूर -दूर
जाता हूवा दिखायी दिया
नीला आकाश
हाथ मिलाने को ,वृक्षो की टहनियों से ,
उत्सुक पत्ते
हरे -हरे आते रहे
बार -बार
पास -पास
थके नही मेरे पाँव
नीचे
दूर
रेखाओं सी सडको
फ़िर
स्केल -पट्टी सी मेडो
और पग-डंडी -यो
के किनारे
कतार बद्धः घरो से
घिरा दिखाई दिया गाँव

१२८-आराम से

२- उस तरह
अचानक नही
ह्रदय -गति
रुकने जैसे-
बिन
बुलाए मेहमान की तरह
मृत्यु का आ धमकना ........
जीते जी क्या..?, मरने भी मे .....
मजा नही आ पाया था उसे
अब उसने सोचा है
मै मरुंगा तो
मृत्यु को ....
उसे
महसूस करते हुवे ..धीरे -धीरे
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१२८-आराम से

-मरने के बाद भी
आता होगा गुस्सा
मरने के बाद भी
होती होगी
सचमुच मे
मरने की इच्छा
बेटा
बेटी
मित्र
सब भूल जाते है
उसका मरना .....
कब्र के भीतर
और
एक कब्र सा
रहने मे
उसे अच्छा लगता होगा
उसे
उससे पहले मर चुके
साथी की
याद आती है
उसे फ़िर लगता है
वह
जीवीत ही कब था ॥?
उस घर मे
और
इस घर मे
अन्तर ही कहां है
तब भी
अदृश्य था
उसका नाम
वो भी.. संक्षिप्त....! -लोग जानते थे
जाती या धर्म
प्रान्त या देश
रंग या वेश
वह पुरूष है -बस् इतना ही
था वह
आज की तरह
वह
पहले भी अकेला था
पता नही
जीवीत लोग क्या काम करते है
प्यार बड़ता ही नही
कम होता जा रहा है
मनुष्य ...?
मन नही
धन ...होता जा रहा है
उन्हें
इसलिए मरने तक की
फुर्सत नही है
इसलिए उसने सोचा है
मरने के बाद
वह
एक बार फ़िर -
आ-रा-म - से ..... ? मरेगा !
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१२७-प्रथ्वी को उठाकर

१-मेरी पत्नी ,बर्तन
फ़िर फर्नीचर
या पुरे घर को
उठा कर
रोज
रखती है
सही जगह पर
उसे पता है सब्जीयों के बारे मे
चांवल वह
ठीक पकते समय
गिला होने से पहले उतार लेती है
वह जानती है
मै इस समय
अख़बार पढ़ रहा होउंगा
धुप सीडिया ....
कब चढ़ती है
और सीढिया ...?
बरसात से फिसलती कब है
इतनासब वह जानती है
रद्धी का भाव -
पुराने कपड़ो के बदले
नये गिलास कितने मिलेंगे
२-वह पढ़ लेती है
मेरा उतरा हूवा -चेहरा
या
इन्द्रधनुष से छूटने को आतूर -
मेरी आँखों के तीर
बच्चो की नींद
धडी की तरह
वह भी नही थकती
वह समय से आगे है
सूरज की परीक्रमा
वो भी कर रही है
एक माँ
एक पत्नी
बेटी ,बहू
बनकर
उसे इतना व्यस्त देखकर
कभी -कभी
मुझे लगता है
घर को भर देने वाली उसकी
यह ममता
किसी
एक दिन
पृथ्वी को उठाकर
अपने घर की छत
पर न रख ले {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

१२६-सागौन वृक्षो के पास

२-दोनों हाथ पडे रहते है
दफ्तर मे फाईलो के पास
किसी की आँखों के आईने ने
मेरा चेहरा चुरा लिया है
गाँव से आए पिता
के पांवो को छूने से
कैसे मना कर देगा मेरा कोट ॥?
पडोसी को शायद मालूम नही
की
गुडहल के फूल की
पंखुरीयो
सा .....
मै ही गिर जाया करता हू
अक्सर
अपने आँगन से
उसके आँगन -द्वार
मै ठहरा हूवा शरीर हू
इसका अहसास कभी नही होता मुझे
लगता है मेरा कद मेरी देह से बडा है
किसी डिब्बे मे बैठा हवा
मेरा शरीर भागता चला जाता है ...
रेलगाडी के साथ
और .....
.मै .........
छूट जाया करता हू
प्राय:
किसी न किसी
जंगल मे उगे हुवे
हजारो -सागौन वृक्षो के पास
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१२६-सागौन वृक्षो के पास

१-मै नही
सड़को पर घूम आती है
मेरी चप्पले
झोला ले आता है
बाजार से खरीद कर
सब्जी
लोगो को देखता
नहीं
मेरा कला चश्मा
कपडे की जगह
कभी -कभी
मै टंगा होता हू
धुप मे सूखता हूवा
लोग मुझे नही -
पहचानते है मेरी कमीज को
मै
एक
पुरे आदमी की तरह
कभी भी
लोगो के सामने नही आ पाता
इसलिए
हर मित्र की जेब से
मै
बरामद किया जा सकता हू
हर बार -अलग -अलग रूप मे

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

१२५-सागर तो बन ही जाओगे

{" सागर तो बन ही जाओगे "}

१-लिखते -लिखते
मै
अक्षर
बन गया
मुझे
दुन्डो
अब ,...
शब्दों मे
खोजो
किताबों मे
पन्नो के बीच
कही दबा रह गया
२-लोग चलते रहे बस्
सा
सडको पर
हंसते रहें
ग्रामीण
लडको पर
मुझे तलाशने

उतरा कोई
स्कुल के पास ...
मै अन -पढा रह गया
३-लिखते -लिखते
मै
अक्षर बन गया
४-मुझे किसी ने
जाना नही
मै
नीड़ मे
तिनको सा
रह गया
लोग उंघते ही
रह गये
ट्रेन मे ......
मै
छोटे से गाँव के अंधेरो सा
गुजर गया
६-मै अगर
मिल जाऊ ....?
तो
उसे
"बीज -मन्त्र "

समझना
मै
एक् बूंद
उदार
प्यार हू
मुझे अगर
छू लीये
तो
बूँद
से
...

सागर तो बन ही जाओगे {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१२४-दुःख;का निवारण भी है

१२४-मिला दो पहले
रेत सी
महीन
भावनाओं मे
अपने सच्चे इरादों को
सीमेंट की तरह
और
उठा ले आओ
अच्छे शब्दों की तरह
पक्की ईटो को
रेत
सीमेंट
और ईटो से
शायद
इस बार
एक् मजबूत कविता बन जाये
हर बार
टूट कर गिरे पत्तो से
गौरेया से दुबके कोने से
झरी पंखुरियों की रंगोली से
जूतों से बचकर ,भाग नही
पायी चिटीयों से
---महगाई मे घर
बनाने की तरह
कठीन हो गया है
कविता लिखना
रेत और सीमेंट मे
दर्द
को
पानी की तरह
मिलाना भी तो बचा है
लेकीन दर्द कहां से लाऊ
किसान का बैल हो
या
गरीब की गईया
सबकी आँखों का कुवा
सुख चूका है
आंसू पुरे बह गये
लोग कहते है
सागर मे
फ़ीर भी -जल कुछ कम हो गये ....?
इस कवीता के मेरे पक्के घर मे
क्या
चमकदार
लोग ही आ पायेंगे
धोती
बनियान
नंगे -पाँव
एक् भी ग्रामीण
भीतर प्रवेश न कर पायेंगे ...?
कहते है दुःख: है
दुःख का निवारण भी है
मै कहता हू
दुःख -समाज की कुप्रथाओं का परिणाम है
क्या
आप
मै
हम
मिलकर
सागर से नमक अलग कर
जल को
सारे
कब तक
मीठा कर पायेंगे ..?
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१२३-वर्तमान के विषय मे

{"वर्तमान के विषय मे "}

१-कवीता
लिखने मे
कितने ...
पन्ने लगे
कितनी उम्र
कितने दर्द ....
छने लगे
२-कई
जन्मो की
तपस्या ...
के बाद
जैसे
वो
मेरे अपने
लगने लगे

३-स्याही मिली
कलम मिला
कविता को
फ़ीर तुमसा
या
मुझसा
एक्
पारखी
दुड्ना पडा

४-आंसुवो के दर्पण
मे
तब
करूणा के अक्स
उभरने लगे

५-कोई
कितना भी
कहें ...
लिखा जा चुका है सब
पर
रोज
हर शख्स ...
वेदना की
नयी -नयी
किताबो
सा
छपने लगे

६-लिखने से
पहले
सबको ...
कितना रटू
या
खुद को
सार्थक पंक्तियों सा
कब
कैसे
रचू

७-वर्तमान के
विष
मे
अमृत सा ...
एक
बूंद-श्ब्द
मै ,तुम
या
हम दुड़ने लगे

८-कुवो के
प्यासे अधरों को
सूखी माटी मे धसे
अन -अंकुरीत बीजो को
यह
देकर आश्वासन की -
मुहाने से भी लौटा लायेंगे
पुरी ...
भागती नदी को

९-उग्गम से ही
अनाम
अथक
अन्तरंग
शाश्वत
प्रवाह के संग
मै
तुम
या हम सब
एक -एक
सजीव -तिनका
बन
बहने लगे ...
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

१-Bhoomi:

Hello .............

Send your more poetries to me i like that........


२-Bhagvandas:

Kishor, tera javab nahi...

३-Nanda:

क्षमा कीजिये किशोरजी मैं वक्त पर आपके स्क्रेपों का उत्तर नहीं दे सकी
आशा हैं आप सकुशल हैं
आपकी कविताएँ वाकई में कबीले तारीफ हैं
लिखते रहिये और मुझे भेजते रहिये
जय श्री रामकृष्ण

तुम्हारा ही -पर प्रतिक्रिया

१-Advocate Subhash:

शानदार श्रीमान




२-Mangala:

वाह! बहोत खूब तरीकेसे स्रुष्टिमाता का अमृतपुत्र बनना चाहते हो ...शुभरात्री !


३-Jaya :what can i:

aap ki bheji huee sari kavitaye....baht achi hoti hai.....good night sir

तुम्हारा ही -पर प्रतिक्रिया

१-VINOD BISSA:

बहुत शानदार ..... भावनाओं का अच्छा स्पंदन है ... किशोर जी शुभकामनाएं...

२-Girish:

मुझे अपनी
कोख से
जन्मने दो......very good.


३-Anil:

सर जी रचना बहुत अच्छी लगी

तुम्हारा ही पर -प्रतिक्रिया

१-काफ़िर:

khoobsoorat kavitaayen thi hamesha ki tarah

२-ratnesh:

शुप्रभात गुरु जी कैसे हैं
आपकी यह नई रचना बहुत ही खुबसूरत है खाश कर के एक अजन्मे बेटे का माँ से संवाद तो मार्मिक है यह पंक्तिया उन लोगो के लिए मार्गदर्शक हो जो एक अजन्मे संतान को मार देते हैं

३-

PAWAN ARORA:

aap ko parnaam bahut khub sir मै तुम्हारा ही अंश
सदेह
सदैव
के
लिए होना चाहता हू
मै तुम्हारा
अमृत पुत्र
प्रतिरूप
होना चाहता हू .{

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

११९-रास्ते लौटने लगते है

raaste lautane lagate hai

जो भी मेरे पाठक है .मेरी कविताओं को पढ़ते है उन सबका मै आभारी हू ,-मेरी कविताओं मे चेतना के ,अचेतना के विभिन्न रंग होते है ...आशा है मै आपको इसी तरह से मानसिक यात्रा पर कविता द्वारा लेजाने मे सक्षम रहूंगा ...आप सबके स्नेह एवं विशवास के लीये शुक्रिया .........



रास्ते लौटने लगते है "
किसी
उपन्यास
के
सुखद अंत को
कोई
नही जी पाता
हर पल
कौरवो की भीड़ के साथ -
हमे
रौंदता हुवा
निकाल जाता है
सचमुच
सच के करीब
पहुचने से पहले
ही
रस्ते लौटने लगते है
सच
एक् जंगल की तरह है
जहां
टूटकर
गिरते हुवे किसी पत्ते की आवाज
साफ सुनायी देती है
जहां
उगता हवा
नन्हा
पौधा
सूरज को प्रणाम करते ही
यह जान जाता
है -की
इस
उजाले पर
सबका एक् सामान अधिकार है
सच
जंगल की एक्
अनाम पग -डंडी
की तरह है
जहा पर पहुंच कर
सारे आकार
निराकार हो जाते है
नाम ,न धर्म .....
यहाँ तक की मनुष्य
अपने कपडो की तरह
अपनी देह को
भी
उतार कर
मुक्त होने लगता है
सबसे वह प्रेम करने लगता है {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

११८-तुम्हारी मुस्कराहट धुप की तरह

तुम्हारी मुस्कराहट
धुप की तरह
दिन -भर
मेरे साथ
रहती है
बिखरा -बिखरा
हवा की तरह
अब
नही घूमता
सडको पर
किसी पेड़ की छांह मे
तुम्हारे स्पर्श का
अहसास
होता है मुझे
सो रहे से
प्लेटफार्म मे
बैठा हुवा
मै
अक्सर
सुना करता हू
मिलो दूर से आती हुवी
उस
ट्रेन की आवाज
जिसमे तुम
बैठी हुवी
अनमनी सी
शायद
किताब के पन्ने
पलट रही होती हो
केवल एक नाम पुकारती सी
लगती है
नदी
और
मै
पहाड़ की चोटी
पर
अटके हुवे बादल सा
प्रति-उत्तर मे
तुम्हारे
नाम से
गूंज
जाया करता हू
रस्मो -रिवाजो से बनी
तुम्हारी देह तक
या संस्कारों के रंग से
पुते तुम्हारे
घर तक
पहुचना कठीन है
इसलिए
मैंने
मौन -व्रत ले रखा है
शायद प्यार
अंधा नही .......guunga
होता है {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

११७-मन की आंतरिक यात्रा

मन की आंतरीक यात्रा१
-मन के गाँव मे
,शहर मे ,
मन्तव्य मे ,
मै ही सड़क ,
यात्राऔरगन्तव्यहोता
हूकिसी को पुकारतीबिछोह मे रोतीब्याकुल सी भावनाओं कीइसयात्रामेमै
कभी भिखारी केभूख साकराहता हूकभी आकर्षण के वियोग कोपल भर मेयुगों सासह जाताहू

कभी ज्योती के खातिरबाती सा जल कर विशुद्ध हो जाता हूफ़िर भी पानी के बाहर
निकली मेरी दो -चार उग्लिया तट को या तिनको को थामने की आखरी तक कोशिश करती ही है
और इस यात्रा मे मै इस तरह शेष रह जाता हू

मन की आंतरिक यात्रा

चाहे वह सपना
या
जागरणहर समय
एकांत केअंतहीन घेरे से
बाहरकोई न कोईहरा -भरा वृक्षयापना सा लगता व्यक्तीमेरी तरफ
दौड़ताहुवा -मेर पास आना चाहता
है पर ठीक उसके छूते ही यथार्थ हो यासपनादोनों मे ही
मुझे घेरा हुवावहपार -दर्शी बुलबुला फुट जाया करता
हैजैसे hi मै संतुष्टी के साँसों को
लेना चाहता हून यथार्थ रहता न सपना
बस् रह जाता हूनवजात शिशु साफ़िर इस जग मेतन्हा और अकेला
३-हर बार याकितनी बारफ़िर पढ़ता हूजिसे ज्ञान कहते
हैफ़िर भोगता हूजिसे अज्ञान- कहते
हैफ़िर लड़ता हूजिसे न्याय कहते है
इस तरहसरोवर केहल -चल मे
फैलते जातेवृत्त-जलमेएक -एक बूंद जीवन
जीता हूपल पलमे ....{किशोर कुमार खोरेन्द्र }
मन की आंतरीक यात्रा
१-मन के गाँव मे ,
शहर मे ,
मन्तव्य मे ,
मै ही सड़क ,
यात्रा
और
गन्तव्य
होता हू
किसी को पुकारती
बिछोह मे रोती
ब्याकुल सी भावनाओं की
इस
यात्रा
मे
मै कभी भिखारी केभूख साकराहता हू
कभी आकर्षण के वियोग को
पल भर मे
युगों सासह जाताहू
कभी ज्योती के खातिर
बाती सा
जल कर
विशुद्ध

हो जाता हू
फ़िर भी
पानी के बाहर निकली मेरी दो -चार उग्लिया
तट को
या
तिनको को
थामने की आखरी तक कोशिश करती ही है
और
इस यात्रा मे
मै इस तरह
शेष
रह jata हू

११७-मन की आंतरिक यात्रा

३-हर बार
या
कितनी बार
फ़िर पढ़ता हू
जिसे ज्ञान कहते है
फ़िर भोगता हू
जिसे अज्ञान- कहते है
फ़िर लड़ता हू
जिसे न्याय कहते है
इस तरह
सरोवर के
हल -चल
मे
फैलाते जाते
वृत्त-जल
मे
एक -एक बूंद जीवन जीता हू
पल पल
मे ....{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

११७-मन की आंतरिक यात्रा

२-चाहे वह
सपना या जागरण
हर समय
एकांत के
अंतहीन घेरे से बाहर
कोई न कोई
हरा -भरा वृक्ष
या
अपना सा लगता व्यक्ती
मेरी तरफ दौड़ता
हुवा -
मेर पास आना चाहता है
पर ठीक उसके छूते ही
यथार्थ हो
या
सपना
दोनों मे ही मुझे घेरा हुवा
वह
पार -दर्शी
बुलबुला फुट जाया करता है
जैसे ही मै
संतुष्टी के साँसों को
लेना चाहता हू
न यथार्थ रहता न सपना
बस् रह जाता हू
नवजात शिशु सा
फ़िर इस जग मे
तन्हा और अकेला

रविवार, 12 अप्रैल 2009

११६-नये अक्षर ,नयी कवीता

४-जलने दो
जंगल को
फीर आयेगा
मौसम
लिख जायेगा
नदी की रेत
पर खिची हुवी
पानी की लकीरों मे
नये अक्षर
नयी कविता
उसे मत रोको
जो
पहाड़ से
उतर रहा है {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

११६-नये अक्षर ,नयी कवीता

३-नदी से कह दो
कि
वह
उसके रास्ते से हट जाए
उसका
तपा हवा मन
फ़ीर
कही पानी की तरह न बह जाए
उसे आने दो नदी के इस पार
सदीयों बीत गये
अब
उसकी आंच से सुलगने दो
जुटी हवी पत्तीयों को
और एक् बार
समूचा
जल जाने दो जंगल को
पत्थरों की हीरे -जडीत आँखों को
उसकी आँखों के तेज से टकरा कर
चूर -चूर हो जाने दो
मनुष्यता को पराजित करते आये
पत्थरों के आशीर्वाद को
धुंवा बनकर उड़ जाने दो
राख हो जाने दो
इस
सभ्यता को
समूल ढहने दो बरगद को
सुंदर दिख रहे
कीमती
सुरक्षित
सागौन के वृक्षो को
मत रोको उसे
वह
स्वयम ही एक् सही रास्ता है

११६-नये अक्षर ,नयी कवीता

२-नदी के इस पार की
सारी पग-dndiyo पर
बिछे हुवे
करोडो
प्यास से सूखे
भूख से पीले
ldkhdate
पत्तो को
इसी आदमी का इन्तजार है

जीसे
सैकडो वर्ष पूर्व
पहाड़ कीचोटी की एक् गुफा मे
मुखियो ने
कैद कर दिया था

११६-नये अक्षर ,नयी कविता

१-मत रोको उसे
उस आदमी को
जो दर्द के पहाड़ से
लावे की तरह उतर रहा है
उसके
ओंठ सील हुवे है
हाथ कटे हुवे है
पांवो मे बेडिया है
उसकी देह मे दुःख के कांटें उग आये है
सारे अँधेरे को एकाकी होकर पीते आये
उस रक्त-तप्त आदमी को -मत रोको

११५-मै भी जी रहा हू

दीपक कहता
मै जल रहा हू
फूल कहता
मै खिल रहा हू
जल कहता मै बह रहा हू
रास्ता कहता मै चल रहा हू
मै भी
तो
कहता हू
जी रहा हू
चेतना के
सम्पूर्ण चित्रको
क्या
किसी ने देखा नही है
मैंने जब भी देखा
फल को
व्रक्ष पर लटके हुवे ....
क्या - जड़ ,तना .
pttiyaa
vhaan nhi hai ...?{kishor kumar khorendra }

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

अनुगामी अन्नंत विचार

"अनुगामी अनंत विचार "तुमसा किनारा हू या अपना सा मंझधार बह रहा प्रवाह मे स्वयम ही क्या बन नाव और पतवार मै नही जानता कुछ भी शायद मेरा यह जन्म हो एक् लघु विराम प्रश्न एक् है अनुगामी अनंत विचार तुम कहते बहते जाओ लेकीन सागर करता हाहाकार पानी हवा माटी आग तुम सब मुझमे और इसलीये मै सबमे तुममे आकाश से दिखती धरती एक् सार इस बिंदु के वृत्त की परिधि के बाहर भी क्या मुझसा तुमसा बुझता -चमकता है कोई संसार जैसे दर्द की चांदी मे लिपटा जैसे कंचन सा हो प्यार .{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

स्मरण

"स्मरण "
पुल
घाट
और मन्दिर
के
दृश्यों को
नदी मे
झिलमिलाता हुवा तैरा -आया हू
मै
लौट आया हू
खोये हुवे
चेहरे की
जगह
उग आये
हरे -भरे
वृक्ष की -हरी पत्तीयों का स्पर्श
लीये
पत्थरो पर लेटे हुवे
मौन से
भला
मै
क्या पूछता
ढह चुके खंड -हरो मे













































"स्मरण "
पुल
घाट
और मन्दिर
के
दृश्यों को
नदी मे
झिलमिलाता हुवा तैरा -आया हू
मै
लौट आया हू
खोये हुवे
चेहरे की
जगह
उग आये
हरे -भरे
वृक्ष की -हरी पत्तीयों का स्पर्श
लीये
पत्थरो पर लेटे हुवे
मौन से
भला
मै
क्या पूछता
ढह चुके खंड -हरो मे
















































"स्मरण "
पुल
घाट
और मन्दिर
के
दृश्यों को
नदी मे
झिलमिलाता हुवा तैरा -आया हू
मै
लौट आया हू
खोये हुवे
चेहरे की
जगह
उग आये
हरे -भरे
वृक्ष की -हरी पत्तीयों का स्पर्श
लीये
पत्थरो पर लेटे हुवे
मौन से
भला
मै
क्या पूछता
ढह चुके खंड -हरो मे
बीते हुवे कोलाहल को
कही पर
घायल
आदमी सा
अनदेखा कर
मै -
लौट आया हू
वहां
कांच के टुकडो
की तरह
फीकी
पड़
गयी
पुरानी धुप को
केवल
खोजता भर रह गया
पुराने से भी पुराने लग रहे
नए से -इस दर्द -को
छूकर
अपना
ही
घाव
हरा कर आया हू
चीर -निंद्रा मे लेटे
उस
संग-मरमरी देह
के
ऊपर
पंखुरियों सा
कुछ -कुछ
बिखर आया हू
और

इस्मरण मे
मित्र
के .............
अपनी आँखों के भीतर
अश्रूओ
सा
भरा -भरा ..रह आया हू {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

सामान्य प्रतिक्रिया

Anita:

Jaroor padungi ... mujhay aacha lagta hai ... aajkal thodi busy hun isiliye nahi padh rehi ... jaldbazi me padhe se poems ka aanand nahi mil pata ... main padhungi kutch dino m

प्राचीन मन्दिर मे,पर प्रतिक्रिया

१६-

काफ़िर:

teeno ki teeno rachnaayen behad pasand aayi.....

१७-

Friend:

अच्छा काव्य था यह।
१८-

bhavana:

wow a v v v lovely dear. thanks for the lovely encouragement. good day. om namah shivay

प्राचीन मन्दिर मे ,पर प्रतिक्रिया

१३-

Mangala:

Wah! Bahothi khub! Suprabhat! Hanuman Jayantiki शुभकामनाये


१४-ruplekha:

thanx for yr sayeri, if i'm not wrong...

मेरा मुझ में:

adbhud.... bahut achchi.....
kishor ji aaj din ki shuraat bahut achchi hui .....
aapne fir yaad dilaya ki woh boondein amrit ki bheetar hi hain unhein khojne ke liye is kahin aur nahi jana , apne bheetar ki seediyan hi utarna hoga :)
bahut bahut dhanyavad

प्राचीन मन्दिर मे ,पर प्रतिक्रिया

११-

Anita:

Aapki kavita padhkar, ek minute ke liye aisa laga ki , jaise main kisi prachin mandir me pahunch gayi hun... bahut badhiya!!



१२-vandana:

hare krishna..........


lovely composition prabhuji.

१३-rekha:

ye kavita bahut hi achchhi hai

प्राचीन मन्दिर मे ,पर प्रतिक्रिया

८-

Jenny:

किशोर जी,
बेहद सारगर्भित रचना है, बधाई |

९-arvind sharma हर:

बहुत शानदार रचना

१०-PAWAN ARORA:

bahut khub sir

प्राचीन मन्दिर मे ,पर प्रतिक्रिया

५-

मेरा मुझ में:

kishor ji ek baar fir se kavita padi.....
abki baar aankh mein aansoon hain....
bahut bahut shukriya... mujhe apni mitrta ke yogya samajha aapne ....


६-Nanda:

नमस्कार किशोर जी .............आपकी कवितायेँ वाकई में बहुत अच्छी है.....

७-๑ Ma Nirav:

आभारी सुंदर बच्चा संदेश के लिए.
अपनी मीठी दिल पर चुम्बन.
भगवान के साथ रहो, कि वह तुम्हें हमेशा खुश रखे.
अपने दिल के अंदर वहाँ एक सुंदर मंदिर है.
प्यार

पाचं मन्दिर मे -पर प्रतिक्रियाये

१-

Anil:

bahut achhi rahi kavita sir ji

२-

♥Kumudham..i luv:

thanks....

३-~ RadheyKrishan~:

kishore ji mein apki kavitao se ati prasann hun..
nice msgs...



४-$un!L:

बहुत खूब....पसंद आयी मुझे ..........

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

११२-प्राचीन मन्दिर मे

१-"प्राचीन मंदीर मे " धरती के इस बहुत प्राचीन मन्दिर के भीतर जर्जर हो चुके अंधेरो मे उतरकर सीडीया गर्भालय मे उजालो की हो ,कहीं पर कुछ बुँदे पडी यह खोजता हू मै श्लोको की अनुगूँज अमृत सी सहेजी भरी पडी हो किसी स्वर्ण -कुम्भ मे यह खोजता हू मै
२-शुभ आशीर्वादों को जिसके हाथो ने दीये उस भगवान के बिखरे भग्न -अवशेषों मे प्राण खोजता हू मै लौट कर गए पद -चिह्नों मे लोगो की श्रद्धा के ठहरे हुवे आभार खोजता

३-छूते है मूर्तियों के हाथ उन हाथो की उंगलियों मे सबकी पूजा मे समर्पित अटके अश्रु से भरे नयन खोजता हू मै वह देह रहित अजन्मी शाश्वत मगर इन्तजार मे मेरे ध्यानस्थ चहु ओर व्याप्त -बाहुपाश खोजता हू मै जलते दीपक की ज्योति की जलती -प्रतिछाया का चिर -आभास खोजता हू मै बहुत प्राचीन ,धरती के इस मन्दिर के भीतर जर्जर हो चुके अंधेरो मे उतार कर सीडिया गर्भालय मे उजालो की हो कुछ बुँदे पडी यह खोजता हू मै .{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

१११-सर्वश्रेष्ठ है मनुष्य

१-१-कविता !
हमें लिखाती है
या
हमें लिखती है
मै उसके लीये हू
मात्र एक् शब्द
इसलीये पढना है
हमें
खुदको
और
अब तक की सब कविता
सब कहानिया
सब उपन्यास
सारे नाटक
सुन लेना है -संगीत
देख लेना है सारे चरित्र
सचित्र
जीवन के रंग-मंच पर हो रहे
तमाम -नृत्य

१११-सर्वश्रेष्ठ है मनुष्य

२2-वृक्ष के रंग
या
रंगों से
सरोबार
हर दृश्य
क्योकि -मै ,तुम ,हम ,वृक्ष .....
हम सब है
अक्षरों से अंकित
केवल एक् सजीव पृष्ठ
यहाँ
पर
सच
खुले आम प्रस्तुत है
इस्त्री हो या पुरुष
शब्द हो या व्यक्ति
रंग हो या अभियक्ति
लौट आओ -
सब समीप
बहुत समीप










































































प्रेम या भूख
दोनों मे दर्द का -एक् सामान रूप
कला है ठीक उसके
अनुरूप
एक् गीत
बिखरे हुवे रंगों को समेटो .....
किसी अनाथ
का कौन है नाथ ...मै या तुम ..
किसी को लाठी पकडा दो ,किसी को कम्बल ओढ़ा दो
किसी के लीये पुस्तक ला दो
और अब -
तो
छोटा हो चूका है विश्व

१११-सर्वश्रेष्ठ है मनुष्य

३-सबका हित
हो संग साहित्य
लेकीन हर हाल मे सर्वो -परी
सर्व -श्रेष्ठ है मनुष्य {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

रविवार, 5 अप्रैल 2009

प्रतिक्रियाये

VINOD BISSA:

सादर वन्दे किशोर जी .......... शुभकामनाएं.....
सच्ची और अच्छी रचना है .....

ratnesh:

बहुत ही खुबसूरत सर बहुत ही खुबसूरत

Mangala:

wah! bahot khub! shubharatri!

प्रतिक्रियाये

Jenny:

बहुत अच्छा किशोर जी| आशा है शायर फॅमिली पर भी इसे पढ़ पाऊँगी|

vandana:

dandvat pranam
prabhuji u'r beautiful poem has touched my heart. thanx fr the lovely verse.

deepak:

वाह वाह सर ...

प्रतिक्रियाये

sirjee mujhe aapki kavita sach me bahut pasand aayii hai

asal me itne log bhejte hain or sab chahte hain kii acha kahe unke likhe hue ko isliye ab sachi tarif karte waqt batanaa padta hai kii

sahii me achii lagii

weldone .....

* Seema:

hari om ji.
bahot acchi lagi aapki kavita.

प्रतिक्रियाये

DURG SINGH:

Respected Kishor Ji sir,
Your creative work is superb indeed . I appreciate it from the core of my heart. I salute you and your litterary work. Sir I request you to write some spiritual and more educative poems. Which is the need of the hour. And that will more beneficial to the masses.
Thank you sir for sending your invaluable work to me। kyaa baat hai

ye baat to main kehta rehta huun

aapko pata hai pehle main orkut par apna naam rakhta thaa


"the last poem is the last desire "

sir aisa lag raha hai aapse meri bahut patne waali hai ..

प्रतिक्रियाये

Mukundrai:

किशोरजी.
काश, आपकी कविताओंको वह लोग मील जाय जो सचकी खोजमें हो, और उन्हें वह स्कूल मिले जन्हा कविता सचकी पहेचान कराए!
बहूत सुन्दर रचना है ।

Mangala:

Dhanyavad! mai samanya stri hu,jo kuch manme ata hai,vo likh deti hu. Aap acha likhate ho. shubharatri!

pratikriya

Anita:

Dhanyawaad Kishor Ji !! aapki kavitayen kaafi aachi hain, padhkar kaafi aacha lagta hai ... Jai Sri Krishna!!

kapil:

kishor sir wah sir wah.........

Satyawan:

bahut khub kishor ji .. pata hai aapki kavitaon ki sabse khash baat kyaa hai??? aap tukbaazi pe yakin nahin karte ... kavitaa ek satah se shuru hoti hai aur gahrayi me chlti jaati hai ... ur style is unique in itself..

"सुरक्षित रहे यह दुनिया " पर प्रतिक्रियाये

१-"सुरक्षित रहे यह दुनिया "---------

Gaurav vashist:

gud morning Sir

कवि धीरेन्द्र:

atyant sundR KAVITA WAH sundar kavita hai wah wah kya keh gaye sir

Jenny:

किशोर जी, मन तक सहज हीं पहुँच गई ये रचना, बहुत अच्छा लिखा है आपने| शुभकामनाएं|

प्रतिक्रियाये

१-सब दिल्प मे एक सार ----

"अभिषेक":

सादर नमस्कार महोदय,
बहुत खूब, क्या बात है।

*** Vibha:

JSRK
hru?
ya aapki likhi kavita padhi maine achhi hai par thodi mushkil hai

प्रतिक्रियाये २७-०३-09 से ०५-०४ -०९ तक

१-"सबके दिलो मे एक् सार----aapki kavitha tho bohoth hi acche hain ji .......iskatho koi jawab hi nahi
२-हथेली सी पत्तीया----

२-Girish:

sunder abhivyakti hai।

१-~Rashmi.rathee~:

wahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh...bahut sundarrrrrrrrrrrr

२-Jenny:

बहुत खुबसूरत सर।

२-kapil:

nise peom sir

११२-चाँद पर जरुर जाना

"चाँद पार जरुर जाना "

नही कहता





















































































































































































































































































































































































































































































मेरी या उसकी पढो कविता मै कहता हू पढो केवल कविता कालिदास से टैगोर तक मुक्ति बोध से अब -तक सब कविताएं सब कहानियां सभी उपन्यास सारे नाटक सुन लेना संगीत और देख लेना सारे चरित्र -सचित्र चाँद पर जाने या फ़ीर पहुचकर रहने से पहले रच लेना मन मे एक् सु -सभ्यता इस धरती पार साकार न कर पाए जो सपना चूता राह गया हो किसी कारन कोई अपना साथ उन्हें भी ले जाना सब अपाहिज सब अंधे सब अनाथ और मन के रंगो से अपरिचित इन सबको चाँद दिखाना उनके लीये एक् बस्ती बसाना फ़ीर प्रेम का एक् दिया जलाना तब -अपने लीये एक् घर वहां बनाना शर्त ...?मंजूर हो तो चाँद पार जरुर जाना ।{किशोर कुमार खोरेन्द्र }























































































































शनिवार, 4 अप्रैल 2009

१११-रोज टिमटिमाता हू

रोज टिमटिमाता हू
सितारों सा
झांकता है
अपना चेहरा
चाँद
जिसमे
वह धरा -जल हो गया हू
इस चित्र मे
वन ,पर्वत ,निर्झर , -
सब है
मगर तुम
नही .....
तो
मै तन्हा -पल हो गया हू
सुब्हह ,दो-पहर ,शाम
या रात -भर
हर समय
अंधेरो को पता नही ,उजालो का ......
उजाले को पता नही ,अंधेरो का ....
यह जान कर
कितना ...सहमा -मन
हो गया हू
देखो तो सही
किसी ओर
पकडो तो मुझे
किसी छोर
तुम मुझसे दूर हो
किस मोड़ ?
लेकिन
आईने से बाहर
न मेरा - न तुम्हारा
कहाँ ,कब चला है
कोई जोर
यह जान कर
मै
यही पर
ठहरा -पल
हो गया हू
नीड़ मे तुम ,जागरण मे तुम
इस स्वप्न -दर्शन से बाहर
आकर
तुम्हारे बिना
निर्जन -वन हो गया हू
मै
धरा -जल

tanha -पल
सहमा -मन
ठहरा -thal
इस तरह
निर्जन -van मे
vichrtaa
ekaant भ्रमण -हो गया हू {kishor kumar khorendra }

११०-बात पते की

बात पते की
कहते क्यो नही
सीधे सीधे
चढते रहते ही सीढिया
इस मन्दिर की ,उस मन्दिर की
बजते -बजते
क्या थकी नही अब तक
स्वर्ण घंटिया
पढ़ते रहते हो किताबे
इस किताब को ,उस किताब को
अब तक
ख़त्म नही हुवी क्या
वही दुहराती हुवी सी कहानिया
लिखते रहते हो कविताएं
इस कविता को ,उस कविता को
और कितनी लम्बी हैं
मन की अव्यक्त गलिया
मिलते रहते हो
इस व्यक्ति से ,उस व्यक्ति से
कितनी मधुर है मानव तन
की ग्रन्थिया
चलते रहते हो अनेक पग -डंडिया
इस पग -डंडी पर ,उस पगदंडी पर
मंजिल के पास है
क्या है
ढेरो खुबिया
लेते रहते हो अनेक जनम
पूर्व जन्मो से इस जन्म तक
थकी नही
क्या
बनती -बिगडती आकृतिया
बात पते की -
कहता हू
sunane को
क्या हो तुम आतुर -
देश ,काल ,आकाश,
सब अन्नत है
और कामनाये भी
इसलिए अंत -हिन्
न चाहो तो नही कोई भीड़
एकांत मे शांत सी
मन की नीरव होती
चेतना -मयी झील
anythaa vasnaaye - फैली दिखती
दूर दूर तक
मिलो -मील {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

हथेली सी पत्तिया

कविता के शब्दों को दानो की तरह
बिखेर जाती है मेरे आँगन मे
हर सुब्हह
बहुत सी चिडिया
कविता की पंक्तिया
आप से आप
बनती जाती है जैसे
किसी पौधे की नार पर ऊग आती है
आप से आप
मेरे घर की छत पर
हथेली सी पत्तीया .{किशोर कुमार खोरेन्द्र } ....

१०७-शाश्वत अभिव्यक्ति

हर पुरूष के भीतर
अदृश्य -स्त्री की आश सा
हर स्त्री के भीतर
निराकार पुरूष की चाह सा
आदिम -मगर प्रेम की
शाश्वत -अभिव्यक्ति
सदैव
आँखों से बहती पीडा -मय
अश्रु -धारा सी अविरल
और
इसीलिए स्व-एकांत मे
हुवा है -करुना का
का उदार अवतरण
विरह -ज्योति मे जल ,जल ,
इसलिए नित्य करता
भोर से संध्या तक -छाया सा .....
सत्य -चेतना का सजीव अनुकरण
धुप के संग चल ,चल
नही मिलता वह -डूमर की टहनियों से लापता
अदृश्य फूल मे
निहारता उसे बसमै
झरी पंखुरियों सा -पुरे हुवे सिंदूर मे
उगे हरे कच्चे गेंहू -ओ ,पर
bathi chidiyo के sur me
jnm -mriyu ke bich
bahate man jal
me duba ho jaise
vah
dhudata use
baith-kar is dagmagate
jivan -pul me {kishor kumar khorendra }

१०७-प्यार के आठवे रंग से

जड़ो से लिपटा ,माटी सा -संग हू
हर तिनको के ,बड़े सपनो का -अंग हू
न लम्बी गली ,न महा नगर हू
न बड़े नाम सा -असर हू
सबमे एक सार प्रवाहित -सचेतन मन हू
प्यार के खातिर स्व -विसर्जित हुवा कई बार -वही तन हू
न स्वर्ण -रथ का पहिया
न सुरक्षित पहर हू
न इतिहास ,न कोई छल -अमर हू
प्यार के आठवे रंग से खिला हुवा -वर्तमान सुमन हू
पोखरों मे भरा हुवा ,बस मीठा जल हू {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१०६-सब के dilo me एक saar

१-"सबके दिलो मे एक् सार "
गुलाब की शाख मे खिलने से
पहले जड़ ,तना ,शाखाओं ... से होते हुवे
हथेलियों की तरह ,सारी पत्तियों का
आशीर्वाद भी तो लेना है मुझे
आखिर हू तो मै तुमसा मिटटी मे उभरा जल-तरंग ही
रंगो से सजा एक् पल
ही हर चेहरे मे उगे जैसे ,दो नयन सजल होऊ
आँख मुदने से पहले सब देख लेना है मुझे
हो सकता है - तुम्हारे जुड़े मे सजकर और खिल जाऊ या ...
किसी के हाथो सप्रेम उपहार सा मिल जाऊ
या
सीधे तुम्हारे हाथो ही तोडा जाऊ
२-अंत तो मेरा होना ही है
हे संध्या ....स्वागत मे तेरे कदमो पर पंखुरियों सा ,बिछना ही है
लेकीन ....
उससे पूर्व
और लाल ,पीला ,गुलाबी ,हरा ...या सतरंगी होना है मुझे
मुझे अपनी महक की सीमा मे असीमित होना है
दुश्मनों को भी दोस्तों सा घेर लेना है
पैसा या प्यार
पैसे से प्यार नही मिलेगा
तो क्या प्यार से पैसा मिल जायेगा ॥?
मै कैसे समझाऊं
तुम तो मुझे फूल समझते हो
वह
अपाहिज एक् पैर वाला ॥
भिखारी एक् आँख वाला
पुजारी केवल एक् धर्म वाला
वह वेश्या जो करती है केवल देह से तपस्या
इस प्यार मे सब शामिल है
मेरी महक से ,झोपडी क्या महल
प्रसन्नता सबको हासिल है
शरीर से छुवो या पैसे से ---मै रंग हू
आत्मा मे भरो या प्यार की खुली पारदर्शी - शीशी मे
3-मै गुलाब के फूलो की महक हू इस पार -उस पार आर -पार सब जगह
,सबकी सांसो मे -"एक् सार"{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

सुरक्षित रहे यह दुनिया

पग- डंडिया जहाँ पर थक-कर
आकर ठहरती है
शुरू होती हैं
वहाँ से मेरी कविता
मै एक वृक्ष की छाँव सा
पग -डंडियों से पूछता हू
उनका दर्द
हर मोड़ के प्रति
उनका आकर्षण
उनकी धूल को किस -किस ने
माथे पर
लगा कर किया यात्रा का शुभारम्भ
कौन चल नही पाया
क्या किसी की कामना पुरी हो गई ?
कर मन्दिर का दर्शन
लोगो से मिलते -मिलते
कईयों का हो गया होगा
हिरदय परिवर्तन
जब पग- डंडिया
लौटती है
उस पार पहाड़ के उतरती है
मेरी पत्तिया टूट -टूट कर दौड़- ती हुवी
उनका पीछा करती है
बदले मे लौट कर आए पंछियों से
भर जाता हू मै
और देखता रह जाता हू
तिनको का जमाव
घोसलों से अंडो का लगाव
कई बार मुझे लगने लगता है
चिडियों की जगह मै बैठा हू
अंडो को सेने के लिए
लेकिन
मुझसे टूट कर गिरे एक पत्ते की तरह
कभी न कभी कोई एक
नया बच्चा
घोसले से बाहर गिर ही जाता है .... मानो
मेरी हथेली से मै ही फिसल गया होऊ .....
तब
ऐसा लगता है मुझे ...मुझसे कोई अपराध हो गया हो
पता नही घोसले कोपछ-तावा हूवा या नही
मगर चिडियों की तरह
मेरी भी चीख निकल जाती है इसलिए
मै कर रहा हू आत्म समर्पण ......
क्योकि मेरा ,हर मनुष्य का -
यह दायित्व है
की
सुरक्षित रहे यह दुनिया {किशोर कुमार खोरेन्द्र }