बुधवार, 30 दिसंबर 2009

तुम



तुम विस्तृत आकाश हो


मै सिमित धरती



तुम उड़ते उन्मुक्त बादल हो


मै एक् लकीर पर बहती नदी


तुम सुन्दर स्वप्न हो


मै मन की शुभ antardrishtii



तुम बान्हे फैलाए तट हो


मै मंझदार मे


डगमगाती सी चिंतित खडी



तुम क्षितिज सा अप्राप्य हो


मै तुम्हें छूने के लीये


जिद्द पर हू अदि



तुम मिलन असंभव हो


मै विरह की जीती


अमिट जिन्दगी



तुम उदयाचल का सूर्योदय


मै अस्ताचल मे


अंतिम तम बन ठहरी



तुम निराकार अनश्वर सम्पूर्ण सत्य हो


मै साकार


देह बनी अधूरी



तुम महानगर मे सचमुच


गौरव पथ हो


वहां से इस


अबूझ गाँव तक की


मै हू अन्नत दूरी



किशोर



जाते जाते साल ने कहा



"इस वर्ष "
मैंने इस वर्ष कोई
गलती नही की है
जाते हुऐ साल से मैंने कहा -
मेरे हाथ से एक् भी
गिलास
गिरकर टूटा नही है
उसने ने -
आश्चर्य से मेरे टूटे हुऐ दिल कों देखा
साल ने फिर मुझे बताया
की वह -
उस जंगल से
उस पेड़ से
उस नदी से
उस व्यक्ति से ....
मिलकर आ रहा है
जिनसे मिलने
तुम गए नहीं
तुम्हारी डायरी मे लिखी
तुम्हारी कविताओ कों तुमसे शिकायत है
जाते जाते साल ने फिर मुझसे
आखरी बार कहा -
तुमने उन्हें लिखा पर जिया नही
प्यार जिससे किया
उसे बताया नहीं
किशोर कुमार खोरेन्द्र

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

सपनों के यथार्त ने मुझसे पूछा



सपनो के यथार्थ ने

मुझसे पूछा -

क्या तुम मेरे पास ही रहोगे

मैंने कहा -

तुम्हें देखते देखते

मै स्वप्न बन गया हूँ

तुम्हारा मन

तुम्हारे शब्द बन गया हूँ



तुम पढ़ सकती हो मुझे

अपने सौन्दर्य की आत्मा कों

निहार सकती हो मुझमे

लेकीन मै तुम्हारी आत्मा की देह तक

पहुच नही सकता

तुम्हारे ध्यान की रोशनी मुझे

आत्मसात नही कर सकती

क्योकि प्रेम सतत विरह है

तभी तक जीवन की चेतना मे

मै तुम्हें जीवित रख पाऊंगा

तुम्हें तलाश लेने के

पश्चात भी

तुम्हें खोये रहने की

मुझमे लगातार पीड़ा है

केवल मेरे पास

मेरी आँखे बंद हो

या खुली .........

हर परिस्तिथि मे

तुम्हारे परछाई की साकार देह की

महक है मेरे पास

केवल ..महक



किशोर

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

ईश्वर संबंधी मेरे मन की सच्ची बाते


१-मनुष्यों के पास समय नहीं है


२-अपने अपने काम मे इतना व्यस्त हो जाते है की फुर्सत ही नहीं मिलती

अपने लीये समय निकलना पडेगा ,तभी तो भगवान् की पूजा कर सकेंगे


३-गीता मे लिखे ज्ञान कों दूर या बाहर से सभी बताते एवं सुनाते है

मगर उस ज्ञान के अनुसार चलना कठिन है ,श्रोता तो हर कोई बन जाता है

४-मीठा मीठा सुनकर केवल समय कों व्यतीत करने से क्या लाभ

वातावरण कों असत्य बोलकर ,हम जहर घोलते है

५-मै आशावादी हू

ब्रम्हांड तो ओम नमः शिवाया मय है

इसलीये सम्पूर्ण जगत या संसार निराशावादी नहीं हो सकता

न है

६-युग के आरम्भ से ही सकारात्मक शक्ति की सरंचना हो चुकी है

७-ईश्वर हमारे भीतर ,बाहर ,चारो ओर है ...ईश्वर ने हमें सा कुछ दे रखा है

चाँद ,सूरज ,वर्षा ,फल ,फूल ,जीवित वृक्ष ..ये सब इत्यादि

८-यह महसूस करने पर पता चलता है की -

हममे आत्मा है

लोग ....सन्यासी ,संत के प्रवचन सुनते है ...जिनमे अधिकाँश धनवान और

सक्षम लोग ही होते है


९-विदेश घूमकर आये संतो कों बड़ा माना जाता है ,

१०=हमें आडम्बर ,प्रापंचो से दूर रह कर केवल ईश्वर का ही ध्यान और

स्मरण करना है

गुरु भगवान् स्वयं है ...केवल उसे याद करने भर से वे प्रकाशित हो जाते है


११-मेरा खुद का अनुभव यह है की -मुझे सतत ईश्वर के साथ रहना पड़ता है

वे प्रकाश के रूप मे मेरे भीतर ,बाहर ,चारो तरफ हरदम रहते है


सुनाने मे तो यह सरल लग रहा है या आश्चर्य मौ भी .........लेकीन

हर कोई उन्के सामीप्य मे रह सकता है

मन की आँखों से उन्हें देखना

अ-बहुत सुन्दर लगता है


शिव शिव कों प्रणाम करती हू

और अपनी बात कों विराम देती हू

ओम नमः शिवाया


आपकी बहन -

बरखा ग्यानी

रायपुर

२८-१२-09

रविवार, 27 दिसंबर 2009

समय का प्रेम



मेरा ना मेरीजाति ....मेरा धर्म

लोगो की तरह

मुझे पुकारते रहें ...

मै उन्हें छोड़ आया

करोडो चेहेरों की भीड़ से

बनी

इस अजनबी दुनिया के

सबसे लम्बे फुटपाथ पर

मै और मेरी यात्रा साथ साथ चल रहें है



मेरी यात्रा -

जिससे मुझे बेहद प्यार है

हम दोनों के मन एक् से है

कभी यात्रा मुझे तलाश करती है

और

कभी मै उसे खोजता हू

लेकीन

हम दोनों

सदियों से बने ..इस धरती पर

अकसर मिल ही जाया करते है

वो मेरी सुन्दर यात्रा है

और .....मै उसका हमसफ़र यात्री



किनारे से लगे ...

मचल रही लहरों के

समुद्र ने हमें देखा

थोड़ी दूर पर खड़े

सबसे ऊँचे पहाड़ ने हमें रोका

बादलो की तरह उड़ता हुवा

आकाश हमें ....छूने के लीये झुका

संसार के सबसे बड़े आँगन की तरह ...

इस घुमती हुवी धरती ने

हम दोनों से पूछा -

कहाँ जा रहें हो ॥?

हम दोनों ने कहा -वही जहां तुम जा रही हो

लोगो की भीड़ से निर्मित -सुनसान इलाके मे

टहलते हुवे लापता ने -

हाँ मे सिर हिला कर ..हमारा साथ दिया

चन्द्रमा झरी रजत किरणों कों

सूरज की तपिश से बचकर भाग आयी स्वर्णिम धूप कों

वृक्षों के नीचे विश्राम कर रही शीतल छाँव कों

नदी के संग मुड़ते हर लचीले मोड़ कों

थकी हुवी सडको कों

जंगल की खुली हवा मे सांस लेती चन्दन की महक कों

हवा के साथ लहलहाती फसल कों

रात मे जलती हुवी लालटेन की तरह ,..दिखायी देते

उस

प्राचीन गाँव कों ..................

सभी कों -हम दोनों का पता था

हम दोनों उन्हें जानते थे

वे सब हम दोनों कों करीब से पहचानते थे

और हम दोनों के अमर प्रेम कों भी ....



परन्तु

मनुष्यों के पास ..............

बड़े बड़े मकान थे

बड़ी बड़ी गाडिया थी

या उनसे भी बड़े बड़े सपने थे

उन्के पास

प्यार करने के लीये समय नही था

अपनों से या अपने आप से मिलने के लीये

वक्त नही था

इसलीये

वक्त के पास मनुष्यों कों सच बताने के लीये

समय नही था

मै और मेरी यात्रा समय के साथ है

समय का प्रेम .....

हम दोनों के साथ है

किशोर






महत्त्व

जीवन मे पूजा पाठ का बहुत महत्त्व है

सत् चित आनंद


शिव योग


१-जीवन मे पूजा पाठ यथाशक्ति करे


२-ज्योतिष ज्ञान है लेकीन उसके जानकार कुछ ही लोग है अत:


अपने अपने भाग्योदय के बारे स्वयं ही मन की शक्ति से


उस सौभाग्य कों जान सकते है


३-ओम नमः शिवाया ..मन्त्र का जाप करते हुवे


शांत बैठ कर ध्यान करना चाहिए


४-सुबह १/२ घंटे तक एकाग्र चित्त से आखे बंद कर प्रतिदिन नियमित रूप से


शंकर जी का ध्यान करने से शीघ्र ही ....लाभ मिलता है सत् चित आनंद की प्राप्ति होती है


५-इस पूजा मे फूल ,अगरबत्ती .दीप ..जरुरी नही है


६-कृपया इसका प्रयोग कर के देखे ,मन्त्र साधने के लीये घर मे ही एकांत ढूंढ़ ले

बाहर जाने की आवाश्यकता नही है /


बरखा दीदी




शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

मै बोल नही पाता...

मै बोल नहीं पाता ज्यादा कुछ
इस बात पर
नाराज न होना कभी तुम
प्रेम के उपवन से उड़कर आते
बहुरंगी ..
शब्दों की तितलियों कों
खुश हो ....
देखता रह जाता हूँ पा सम्मुख
चाहता हू इसी तरह जीवन
चलता रहें
मौन हो
मौन ....
मौन कों सुनता रहें सम्पूर्ण
जीऊ उन्हें कभी न भूल
उसकी अनुभूति से
मेरा हर पल महके
जैसे सुगंधित पुष्प
किशोर

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

वे कहते है मुझसे

कोरे पन्ने मुझे
देखते ही
हो जाते है
कभी कभी प्रसन्न
वे कहते है मुझसे
आओ मेरी पीठ पर
लिखो एक् कविता अपनी मन पसंद
तुम्हारी स्याही का है
दुखमय या सुख मय रंग
तुम्हारे शब्दों के होते है
सुलझे सुलझे या
कभी बिखरे बिखरे से ढंग

मुझे लुभाते है कहते पन्ने
सांस रोक कर लिखती हुवी
तुम्हारी उंगलियों का संग
और
तुम्हारे बोलते मन का सत्संग
मुझे मालूम है -
लेखकीय क्षणों मे अन्तर्निहित
तुम्हारे हिरदय के मूल करुनामय
भावो के दृश्य सप्रसंग
इस जग मे
केवल लाठी ने साथ निभाया
जब हुवा
ठंडी रात मे
एक् भिखारी की देह का अंत

प्लेटफार्म की सीढियों पर बेहोश पडा
रह गया एक् युवक
बैठ बोगियों मे भीड़
ऐसे हुवी गायब
जैसे रेल के पहीयो मे ऊग आये हो पंख

ढाबे से फेंकी गयी जूठन कों
चाव से -
खाते देख एक् मानव कों
छोड़ गए आंसू तनहा मेरी आँखों कों
देख
सत्य का ऐसा कटु दर्शन

किशोर



रविवार, 20 दिसंबर 2009

एक् खुबसूरत भोर

अपनी अपनी देह कों छोड़
रहते मै और तुम
एक् दुसरे के मन मे हो आत्म -विभोर
बीच मे अनाम रिश्ते की है
यह अदृश्य सी ..दृढ महीन डोर
ढूढते है हमें ..
इसके दोनों अंतहीन छोर
विलुप्त सा लगता एक् दूजे मे
हमारे अस्तित्व का हर मोड़
जानना संभव नही है
आखिर मै और तुम
रहते कहाँ कब किस ओर
वियोग मे संयोग का लगता
यह जोर बेजोड़
jaise
चेतना बहती सर्वत्र
चुपचाप ..किये बिना शोर
निशा के आते ही
जब मै प्रकृति सा -
हो जाता हू निराकार और गौण
तब
तुम किरणों के जल बूंदों की छिटो से
करने आती हो
मुझे साकार और पुनर्जीवित ...
बन कर
धवल एक् खुबसूरत भोर
हर रोज
किशोर

तुम मुझे पढ़ती हो

मै लिखता हूँ
तुम मुझे
एक् किताब सा
फिर पढ़ती हो

मेरे दर्दो कों जैसे
इस तरह तुम
शब्द शब्द सहती हो
सूने जग मे
दिन के जाते ही
लगता है मुझे
रात भर शमा सी
संग मेरे देने
तुम जगती हो
किशोर






शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

झरती हुवी पत्तियों सा



तुम्हारी मुस्कराहट की तरह
लगा मुझे
छाँव का शीतल स्पर्श

झरती हुवी पत्तियों सा
लगा मुझे
देह के स्वर्णीम रंग की aabhaa saa
मुझे tumharaa संग

वृक्ष की सघन उचाईयो से
निहारते से लगे
किरणों से भरे
तुम्हारे नयन





ठंडी रेत पर अंकित
हो तुम
मानो
लहरों के द्वारा
छोड़ गयी हो एक पद चिन्ह
दिखलाने पथ
जिस पर चलू मैसाथ
तुम्हारे हो स्वछंद

किशोर

शनिवार, 28 नवंबर 2009

चलो तकरार करते है

प्यार नही आज कर पाए
चलो तकरार करते है
किसी बात की नोक सा
बेवजह
एक दुसरे के मन में
वार करते है
कितनी बार कहें -
वो मुझसे की
मुझे वो याद -करते है
फिर भी चलो
आज उनसे पूछते है -
कि क्या वे मुझे भी याद -करते है ....?
चुपचाप सी
बहती नदी की लहरों ने
हमें आकर् रोका हो
लेकिन नदी से फिर भी -
चलो अब हम सवाल -
करते है
प्यार में न किसी की जीत है न हार
फिर भी मंझधार में धार और पतवार सा
एक -दुसरे को मात करते है
प्यार नही आज कर पाए
चलो तकरार करते है

किशोर

बुधवार, 25 नवंबर 2009

धुप सा पढ़ता रहा

ऑटो की तरह तुम आयी
मै ..धूप
तुम उड़ते हुवे समय को
चुनरी सा
जाते हुवे ...
चौक मे खड़े शहर सा
दूर तक ..देखता रह गया

घड़ी के कांटे की तरह
एक लम्बी सड़क सा बाजार मे
घूमता हुवा
कभी -
केले के छिलकों
या
टोकरी से बाहर
लुड़क आए
ताजे संतरे की तरह
लोगो की निगाहों से भी बचता रहा

पैरो के पहियों से
बनी भीड़ को
नहर सा एकसार बहते हुवे
कभी -
खम्बे मे टंगे पोस्टर
पर बनी चित्र की -
दो घूरती आँखों की तरह
निहारता रहा

किसी टाकीज मे
अकेले ही
पिक्चर देखने वाले
एक मात्र दर्शक की तरह
अपना मन भर बोझ ..सहता रहा

खाली गिलास की तरह
किसी ठेले के स्टूल पर
बेफिक्र सा बैठा हुवा
कभी -
अखबारों के पन्नो मे
कड़ी मीठी चाय की चुस्की सा
एक ख़बर
तलाशता रहा

इस तरह
भीड़ के मनुष्यों मे
शब्दों की तरह बिखरी एक एक
कविता को
दिन भर
धूप सा पढ़ता रहा

किशोर

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

३-कपास सी हलकी परछाई की तरह
मन आकाश मे
बादलो की तरह तैरती हुवी
तुम
अर्थवान विचारों मे
जीवन का सच खोजती हो
वो एक लड़की
जिसे अपने जैसी
ही एक एकांत के परछाई से
मिलना है
इस एकांत मे
सुखो के दुःख है
दुखो के सुख है
मृत्यु के बाद जीवन है
जीवन के बाद मृत्यु है
कुरूपता का सौन्दर्य है
सौन्दर्य की कुरूपता है
अस्थायी से लग रहे
जीवन मे
कहाँ पर स्थिरता है
स्थिरता के भाव के समुद्र मे
क्या ...
स्थिरता की लहरे भी है
इन सब विचारों की
भीड़ मे तुम
खोयी हुवी हो
और मई तुम्हे ढूढ़ रहा हूँ
वही एक लड़की हो न ..तुम
किशोर

वही एक लड़की हो न तुम

२-अपनी देह की आत्मा मे
अपनी आत्मा की देह मे
जाकर छिप जाना चाहती थी
लोग पुकारते रहे तुम्हे
और
तुम ॥
देह के घर के दरवाजो को
बंद कर
उसके भीतर शंकुंताला सी
ख्यालो के ध्यान मे
निमग्न हो जाना चाहती थी
वही एक लड़की हो न तुम

वही लड़की तुम हो न

1-वो एक लड़की
जो सायकल चलती थी
दुपट्टे से सबकी नजरो के
तीरों के वार
बचाती थी
किताबो को छाती से लगाए
दिल मे अपनी ही छवि को
निहार मुस्कुराती थी
कभी किताब उसे पढ़ते
कभी वह किताबो को पढ़ती थी
सडको पर ॥
शहर को बस सा गुजर जाने देती थी
ठहर कर किसी उपवन मे
किसी गुलमोहर की छाँव मे
अपनी आँखों मे
एकांत के जिस्म को भरकर
मन ही मन ख़ुद से बाते करती थी
हरी हरी घास से
एक तिनका तोड़कर
वह उससे अपने
जीवन का अर्थ पूछती थी
पढ़कर सभी कक्षाए उतीर्ण होकर
ख्यालो को साथी बनाकर
उन्के संग जीना चाहती थी
वही लड़की तुम हो न

सोमवार, 23 नवंबर 2009

tum sun leti ho


मै चुप हो जाता हूँ

तुम सून हो जाती हो

मै गीत गाता हू

तुम मीठी धुन हो जाती हो


मै इस जग की सुबह में -

उग आता सूर्य सा

तुम धूप बनकर बिखर जाती हो


बहते समय को

समेट नही पाता हू अपनी बाहों में

पर हर पल तुम -

आरम्भ बन जाती हो

पाकर दुःख कभी कभी यह जीवन लगता निरर्थक

तब तुम सुख बन जाती हो

पढ़ रही जो कविता मुझे निरंतर ॥

तुम उसे सुन लेती हो


किशोर

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

कविता

रश्मी जी की कविताएं
,आदमी वही है ,
बहुत देर हुवी ,
मेरी भावनाए -जाने कहा गए -
सत्य -जरुरी है
समझौता -मुश्किल है ,
-बहुत देर हुवी -उससे पहले -
ओस से रिश्ते -जाने कहाँ गए -
बुनियाद -
मूल्यांकन
इसे जानो
अनभिग्य ....?
विश्वाश करो
siikh
लोगे


रश्मी जी की कविताएं

मेरी भावनाए ,आदमी वही है , बहुत देर हुवी ,

बुनियाद , जरुरी है ,समझौता , मुश्किल है

सत्य ,अनभिग्य , कशिश ,मूल्यांकन

विरक्ति ,..मुजरिम , निस्तेज ,

{उससे पहले ,}इसे जानो ,ओस से रिश्ते

कुछ हुवा है ,विश्वाश करो

जाने कहाँ गए

तलाश

विश्वाश

प्रभु की बारी

माँ तुमने क्या किया

एक लड़की

एक बेचारा आदमी

सीख लोगे

एक प्रश्न

सोमवार, 16 नवंबर 2009

मुक्तक

जिंदगी हररोज तेरा नया रूप दिखाती हो,
कभी आशिक, कभी रकीब बनकर आती हो

एक टुकडा आसमान का जीने के लिए मिला
सितारे आते जाते है, अब तक चाँद नहीं मिला

गिरीश जोशी

पता

मेरे घर का पता वैसे तो हम भोपाल से एक साथ ही चलेंगे और मैं आपको १-२ दिन में वो सब जानकारी दे दूंगी फ़ोन न। आपको दे ही दिया है
मगर किसी कारण वश हमारी बात न हो पायी तो आपके पास मेरे घर का पता और फ़ोन न। होना ज़रूरी है
इसीलिए ये सेव कर लें डॉ विनोद जैन श्वेताम्बर जैन मंदिर के पास किरी मोहल्ला विदिशा घर का फ़ोन न. -07592 - 235301पापा का मोबाइल न. - 9827213001

रविवार, 15 नवंबर 2009

मुझे तुमसे प्यार है


मुझे तुमसे है प्यार


यह कहना है अपराध


प्यार मे मित्रता


या


मित्रता मे प्यार


शामिल हो जाए


तो उसे भूल कर भी न बताना


यही है जीवन का सार


न चाहते हुवे भी


ऐसा लेकिन

हो जाता है


हर कोई किसी न किसी को


चाहने लग जाता है


यह चाहत -एक बहुत उची है दीवार


या


एक है गहरी खाई


और हम सभी को


जाना है उस पार


पूजा पत्थरो की करते रहो


जीवन व्यतीत करने का


यह तरीका है सबसे आसान


मनुष्यों से प्रेम की


उम्मीद करना है बेकार


मुझे तुमसे है प्यार


यह कहना है अपराध


किशोर




कविताओ पर एक कविता

तुम कहाँ गए
हम तनहा है
वक्त मिले न मिले

आओ मेरे पास पास
ये बस मेरा मन है
नज्म तुम्हारी बनते है

जब भी मै तनहा ख़ुद को पाती हू
बीती यादें


आँखों मे नमी तेरी है

मेरी कविता तुम ही तो हो
नेह निमंत्रण बिसरा गए
आँखों मे इश्क भर क्यो नही देते हो


आखीर क्यू
मुमकीन नही है
कोई बात बने
अनाम प्रेम कहानी
न तुम भूले..न भूली जेनी
जिन्दगी एक बेशब्द किताब है

काश कोई जंजीर न होती
काश हम जंजीर बने न होते

लिखूंगी मै रोज एक ख़त
पैगाम चाँद को सुना जाना


संकलन -जेन्नी जी की कविताओ के शीर्षकों से बनायी गयी एक कविता
उन्के जन्म दिन १६-११-०९ के शुभ अवसर पर

किशोर
हम तनहा है
वक्त मिले मिले
आओ मेरे पास पास

मै इंसान हू
आजमाया हम को
थक गयी मै

तुम कहाँ गए
मेरी आजमाईश करते हो
ये बस मेरा मन है
नज्म तुम्हारी बनते है

आँखों मे नमी तेरी है
जिन्दगी एक बेशब्द किताब है

जब भी मै तनहा ख़ुद को पाती हू
वक्त मिले मिले
लिखूंगी मै रोज एक ख़त



मेरी जिन्दगी
ख़ुद पर कैसे लिखू
रिश्तो का लिबास सहेजना होगा
बीती यादें
ये बस मेरा मन है

मेरी कविता तुम ही तो हो



आँखों मे इश्क भर क्यो नही देते हो
नेह निमंत्रण बिसरा गए
आखीर क्यू
मुमकीन नही है
कोई बात बने
अनाम प्रेम कहानी

पैगाम चाँद को सुना जाना

उसका आखरी कलाम है

काश हम जंजीर बने होते
मेरी आँखों मे नमी तेरी है
काश कोई जंजीर होती

मेरी कविता मे तुम ही तो हो

तुम भूले.. भूली मै

हम दुनियादारी निभा रहे
तुम्हारी अतियों से डरती हू



























शनिवार, 14 नवंबर 2009

केवल तुम्हारे लिए


मन्दिर की सीढियों ने
हमेशा मेरा स्वागत किया
मूर्तियों ने -
मुझे
कभी नही कहा कि-

उन्हें मै प्रणाम करू
उसके
प्रांगन ने अपने एकांत मे मुझे बिठाकर रखा
बदले
मे मै उनकी मुस्कानों की तरह खुश हुवा

और उन्के हाथो के आर्शीवाद के समक्ष एक दिये सा ....जला भी
लेकिन
तुम
हमेशा
अदृश्य सी रहती हो
हमेशा
कहती हो - तुम्हारे पास वक्त नही है

मै तुम्हे एक लंबे ख़त की तरह बस...... जीवन भर पढ़ता रहा हू
वे
मुर्तिया ...
पाषाण
होकर भी कोमल महान सहिर्दय है
और
तुम ...
सहिर्दया
होकर भी कठोर पहाड़ बनी हुवी हो
मेरे
प्रेम की निगाहें तुम्हे -
देखना
चाहती है
आराधना
करना चाहती है तुम्हारी
तुम्हारे
मन के आँगन मे बैठकर -
मेरी
आत्मा तुम्हारे निश्छल सूनेपन मे
निष्कपट ध्यान मग्न हो जाना चाहती है
बदले
मे
हो
सकता है तुम मुझे - पुनर्जीवित कर सकोगी
मेरी मूक व्यथा को दूर कर
अपनी
स्नेह की आँखों की दिव्यता के मृदुल प्रकाश से
मुझे आलोकित कर ...सकोगी ...
पर तुम कहती हो तुम्हे
अपने
कार्य से फुरसत नही है


लेकिन मै भी पराजित नही होउंगा
मै तुम्हारे मन के शाश्वत मौन का संगीत हू
मै
तुम्हारी अंतरात्मा की ही तरह -
व्यापक

प्रेम के इन्तजार मे लीन

उदगम से समुद्र तक
फैली
महानदी सा एक विस्तृत
वक्त
हू ...तुम्हारे लिए ...हां केवल तुम्हारे लिए

किशोर

चिर वियोग का क्षितिज


चिर वियोग का क्षितिज
तुम बनी रहना चिर वियोग का क्षितिज
चलता रहूँगा राह सा मै अंतहीन
ठहरूंगा नही किंचित
आजीवन
तुम्हें पाने के लीये
मै
बन एक पथिक
दर्दो कों शुलो सा सह जाऊँगा
ज़हर कों मधु -बूंदों सा पी जाउंगा
यादों के तेरे पाक -सुमनों कों चढा
हर मन्दिर
सीढियों से उतर फीर
जीता रहूँगा
बन एक गर्दिश
तुम यथार्थ और स्वप्न भी
तुम अन्नत दूरी और हो मेरे बहुत समीप
तुम खुश्बू मेरी
मै चन्दन सा वृक्ष
बाहुपाश मे तुम्हारे होने समाहित
मै भट्कुंगा-जन्मो तक
जान यह कि -तुम्हें पाना है
असंभवऔर कठिन
किशोर

तु मुझे -

गुनगुना
रहे हो

या


तुम्हारी
लिखी हुवी

किसी
एक कहानी को

मै
जी रहा हू

या


अव्यक्त शब्दों की तरह

तुम्हारे
मन मे अभिव्यक्त हुवी

भावनाओं मे अपने लिए

एक
भावना तलाश रहा हू

पता
नही तुम कौन हो ...?

जिसके
इंतजार मे मेरी नींद ...

जगी
हुवी है

मुझे देख कर किसी ने

कुछ
कहा नही

अब
तक सिवा कुछ मनुष्यों के -

जिन्हें
मेरी जरुरत थी

अब
मै किससे पुछू की -

मै
कौन हू

आकाश
नदी वृक्ष और प्रकाश

बाहर मे ,भीतर मे एक जैसे है

चारो
ओर केवल मौन है

उसके
पदचापों की आवाज है

मै
घूम -फ़िर कर स्वयं को

कटघरे
मे खडा हुवा क्यो पा रहा हू

मै
क्यो चाह रहा हू -

की
तुम आओ

मुझे
-

निष्पाप
होने का दंड दो

मै
हू इसलिए तुम ...? भी हो

किशोर

सचमुच जीना सीखो


वह रह गयी है अकेली
देकर
मुझे तुम्हारे पास
क्यो
नही करते विशवास
तुम्हे
चाहिए थी मै ...
उसकी आत्मा की -
की
थी तुम्ही ने तो आश

फ़िर
इन तुम्हारे नयनो मे
जागती
क्यो है
मेरे
उस आकार को
पाने
की प्यास
तुम
हो दर्पण उसका
मै
तुम्हारे हिरदय मे समायी
बनकर धड़कन आज

वह केवल देह है मात्र
उसे
कर लेने दो
उम्र भर ...
इस
दुनिया के काज
सौप
गयी वह मुझे
तुम्हारे
साथ
अब तुम्हारी परछाई हू
वह
नही ...
मै
हू तुम्हारी ख़ास


उसे तो तुमसे
बात
तक करने की फुरसत नही
वो
क्या जाने प्यार का मधुर राज


मै उसकी आत्मा ही -
तुम्हारे
सपनो का हू रंग
तुम्हारे
गीतों का हू छंद

निराकार की सूनी बांहों मे
सचमुच
जीना सीखो
छोड़
साकार महानगर का
आकर्षक
संग
किशोर