शनिवार, 23 मई 2015

942-जबसे तेरे मेरे दरम्यां.....

जबसे तेरे मेरे दरम्यां.....
जबसे तेरे मेरे दरम्यां और फ़ासिला बढ़ गया
तबसे तुझसे मिलने के लिए हौसला बढ़ गया
मेरे लिये तेरे बगैर जीना अब आसान नहीं है
रहे तन्हाई में मेरे दर्द का काफिला बढ़ गया
जुदा न कर पायेगा सारा जहां तुझे मुझसे
मन में प्यार का अटूट सिलसिला बढ़ गया
एक चिंगारी सी उड़ी जब आँखें टकरायी
शोलों की लपटों से घिरा हूँ मामला बढ़ गया
किशोर कुमार खोरेन्द्र

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (25-05-2015) को "जरूरी कितना जरूरी और कितनी मजबूरी" {चर्चा - 1986} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

रचना दीक्षित ने कहा…

बस यूँ ही मामला बढ़ाते रहें
दूरियां कम होने की उम्मीदें जगाते रहें
आभार

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

thank u rachna dixit ji ,rupchandra shastri mayank ji