शनिवार, 23 मई 2015

938-खुश था ,हूँ....

खुश था ,हूँ....
खुश था ,हूँ
तुम्हें पाकर
खालीपन के नमकीन जल से
भरा लगता है
तुम बिन अब यह महासागर
बतलाओ मिलोगे तुम कब
मुझसे आकर

हम दोनों के बीच
उमड़ कर नहीं आयेंगें अब
कभी क्या सावन के रसीले बादर
बहार रह जायेगी
क्या सदा के लिए
पतझड़ के बाहर

खुश था ,हूँ
तुम्हें पाकर
खालीपन के नमकीन जल से
भरा लगता है
तुम बिन अब यह महासागर
बतलाओ मिलोगे तुम कब
मुझसे आकर

मेरी उंगलियाँ
तुम्हारी नरम उँगलियों को
छू न पायेगी
तुम्हारी आँखों को मेरी आँखें
न पाएंगी निहार
दूर हो गए हम दोनों
केवल
प्यार की कसमों को खाकर
बस एक बार
गीत मिलन के गाकर

खुश था ,हूँ
तुम्हें पाकर
खालीपन के नमकीन जल से
भरा लगता है
तुम बिन अब यह महासागर
बतलाओ मिलोगे तुम कब
मुझसे आकर

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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