बुधवार, 6 मई 2015

932-क्षणिकायें

क्षणिकायें
१-बात
तुमसे मेरी बात हुई थी
जब मैं और तुम चुप हो गए थे
२-दरकिनार
कही तुझसे दरकिनार न हो जाऊँ
सिर्फ मैं तेरा इंतज़ार न हो जाऊँ
३-मित्र
हर महफ़िल में मैं तेरा ही जिक्र करता हूँ
बस तुझ एक को ही अपना मित्र कहता हूँ
४-तस्वीर
तेरी तस्वीर को देखते हुये गया समय बीत
बरसों हो गए मैं तुमसे नहीं पाया मिल
५-सुरूर
जामे मय सी है तेरी निगाहें
तेरी आँखों से सुरूर छलक आये
६-भ्रमण
तुमसे पल भर को भी
जुदा होना चाहता नहीं मन
तेरे आसपास ही भंवरे सा
करता रहता भ्रमण
७-जुबाँ
लब खामोश हैं तो क्या हुआ
रोम रोम तेरे
मेरे लिए जुबान बने हुये हैं

kishor kumar khorendra

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