शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

922-क्षणिकायें...

क्षणिकायें...
1-क्या तुम....
क्या तुम मृगतृष्णा हो या माया हो
या
आईने के भीतर की
कभी न पकड़ आनेवाली छाया हो

2-खलिश.....
जाते जाते
छोड़ जाते हो
सीने में खलिश
तब
घेर लेता है मुझे
इश्क़ का आतिश
(खलिश =चुभन ,आतिश =अग्नि )
3-लब...
होता होगा
कुछ तो मतलब
जिसे कह नहीं पाये
आज तक तेरे लब

4-हिलमिल...
तेरी कविता और मेरे काव्य के दिल
एक दूसरे से गये हैं हिलमिल

5-रात..
बीच में ये आती है क्यों रात
तुमसे
हो नहीं पाती है मुलाकात

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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