बुधवार, 22 अप्रैल 2015

916-क्षणिकायें...

क्षणिकायें...


1-मुझे छेड़ो
मैं साज हूँ
सुनो एकांत में
मैं तुम्हारे ही
दिल की आवाज हूँ


2-मन रोज लिखता है अपनी आत्म कथा
लिख लिख कर
मिटाना चाहता हैं अपनी कहानी से वह
अपना दर्द अपनी व्यथा


3- बंदगी
एक दूसरे की कविताओं को
पढ़ते हुऐ
बीत रही है जिंदगी
तुम कहती हो इसे
सिलसिला ए मुहब्बत
मैं कहता हूँ इसे
तेरी बंदगी

4- नज़र
तेरी मुस्कराहट को देखूं
या
तेरे गेसूओं को
तेरी नशीली आँखों से
नजर हटती ही नहीं है

5- खुश्बू...
मन ने
पहले की तेरी आरजू
फिर शुरू हुई तेरी जुस्तजू

तू कही न कही
इस जहाँ में है जरूर
तभी तो
मेरे आसपास है तेरी खुश्बू


6- सपना...
किसे कहूँ मैं अपना
लोग ही कह देते हैं
यह जीवन है एक सपना

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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