बुधवार, 22 अप्रैल 2015

915-गुलमोहर के खिले हुए फूल

गुलमोहर के खिले हुए फूल

गुलमोहर के खिले हुए फूल मुरझाने से पहले तुम्हें देखना चाहते है गिरती हुई पंखुरियाँ तुम्हारे बालों में
उलझन चाहती हैं
शाखों की आड़ी तिरछी परछाईयाँ
मिलकर
हूबहू तुम्हारी तस्वीर बनाना चाहती हैं
जड़ें तुम्हे बिठाना चाहती हैं अपने करीब
ताकि तुम तने की पीठ पर
लिख सको फिर से मेरा नाम
सुन सको
मुझे छूकर तुम तक पहुंची
पुरवाई का कहना
अपने अपने अकेलेपन में
कुछ भी तो नहीं ना मना
आकार सहित मैं रहूँ या न रहूँ
असली बात तो यह है
यादों में, ख्यालों में ,सपनों में
एक दूसरे के रहना ही होता है
वास्तव में जीना

किशोर कुमार खोरेन्द्र
कवि किशोर कुमार खोरेंद्र's photo.

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बृहस्पतिवार (23-04-2015) को "विश्व पृथ्वी दिवस" (चर्चा अंक-1954) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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विश्व पृथ्वी दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

shukriya mayank ji