शनिवार, 11 अप्रैल 2015

912-दूर तुमसे.....

दूर तुमसे.....
दूर तुमसे मैं तो रह नहीं पाता
बात तुमसे यह कह नहीं पाता
बिखरा बिखरा सा अब रहता हूँ
जुदाई तुम्हारी सह नहीं पाता
विरह की ईटों से बना मीनार हूँ
तेरी दुआ साथ हैं ढह नहीं पाता
तेरी याद में बर्फ सा जम गया हूँ
तेरे विपरीत मैं बह नहीं पाता
किशोर कुमार खोरेन्द्र

3 टिप्‍पणियां:

Digamber Naswa ने कहा…

गहरा एहसास इए शब्द ...

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

naswa ji aur onkar ji shukriya