बुधवार, 8 अप्रैल 2015

909-बेगाने कभी कभी ....

बेगाने कभी कभी ....
बेगाने कभी कभी हो अपने जाते हैं
अपने कभी कभी हो बेगाने जाते हैं
इस दुनियां का दस्तूर समझ न पाया मैं
ख्वाब सच ,सच कभी हो अफ़साने जाते हैं
पूरी शिद्दत से चाहता हूँ मैं उन्हें आरंभ से
कह नहीं पाता जब वो आ सामने जाते हैं
आजकल मुझे देखते ही वो छुपने से लगे हैं
प्यार करने वाले इसी तरह अजमाये जाते हैं
कई जन्मों तक साथ जीने की तमन्ना थी मेरी
पर तोड़ने के लिए नाता गढ़े कई बहाने जाते हैं
परछाइयों से मोहब्बत करने से क्या होगा
एक न एक दिन चूर हो सारे आईने जाते हैं
धीरे धीरे हम हाशिये तक पहुँच ही जाते है
जब जहाँ में रिश्तों के बदल मायने जाते है
किशोर कुमार खोरेन्द्र

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