बुधवार, 8 अप्रैल 2015

907-क्षणिकायें

क्षणिकायें
१-दोस्ती "
धीरे धीरे
गहरी होती है दोस्ती
सीप के भीतर
बरसों रहने के बाद ही
एक बून्द
बनती है मोती

२-चेहरा
एक चेहरा तेरा मुझे याद रहता है हमेशा सलोना
जिसे मेरी स्मृति नहीं चाहती है कभी भी खोना

३-ख्याल
रूबरू मिलने से होता नहीं फायदा
एक दूसरे के ख्याल यदि मिल जाएँ
तो जीने में मजा आता है ज्यादा

४--हक़
मुझ पर तेरा है हक़
इसीलिए तो मेरा मन
तेरी और जाता है बहक

५-याद
जागते हुऐ वो हमें हमेशा भूल जाते हैं
ख्वाब में जिन्हे हम याद खूब आते हैं

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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