बुधवार, 11 मार्च 2015

906-न तेरे पास जवाब है

न तेरे पास जवाब है
न तेरे पास जवाब है ,न मेरे पास सवाल है 
मेरे पास तेरा ख्वाब है तेरे पास मेरा ख्याल है
एक किनारा तू है और एक किनारा मैं हूँ 
नदी सी खामोश दरमियान हमारे हयात है

अंजुम की पहुँच तो बस तेरे हुस्न तक ही है 
जो तेरे दिल को छूले मुझमे ऐसी कोई बात है

मैं पागल सा ,और दीवाना सा हो चुका हूँ 
तेरे नूर ए रुख से रोशन मेरी तो हर रात है

उस जहाँ इस जहाँ से अलग एक और जहाँ है 
जहां पर होती रोज तुमसे मेरी मुलाकात है

किशोर कुमार खोरेन्द्र
अंजुम =नज्म का बहुवचन,हयात=jivan

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (13-03-2015) को "नीड़ का निर्माण फिर-फिर..." (चर्चा अंक - 1916) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar ने कहा…

सुन्दर पंक्तियाँ

JEEWANTIPS ने कहा…

Very-2 fine post..