गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

904-डाल डाल फूल महके

डाल डाल फूल महके
सरसों का पीला रंग देखकर
मन बहके
टेसू के पुष्पों सा

उमंग दहके
फुनगियों पर चिड़िया चहके
बिना बादलों के
नीले आसमान से
कुछ कहना चाहूँ
मौन रहके
मधुप सुनते नहीं
अपनी धुन में ही
बस रहते
सारे रंग झर रहे
उड़ती हुई
तितलियों के पर से
जिसे तुमने
छुवा था वह सागौन का 
भूरा पत्ता आया है
मुझ तक उड़के 
शायद तुमने भेजा हो 
कोई अनलिखा सन्देश 
उसकी नसों में लिख के 
बंद हथेलियों में आओगे तुम 
प्यार के सातों रंग लेके 
मुस्कुराओगे फिर 
अचानक
मेरे गालोँ पर
गुलाल मल के

किशोर कुमार खोरेन्द्र

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (28-02-2015) को "फाग वेदना..." (चर्चा अंक-1903) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

shukriya mayank ji

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

shukriya mayank ji