शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

902-तेरे हुस्न से...

तेरे हुस्न से...
तेरे हुस्न से पिरोया अशआर हूँ मैं
तेरी ही चाहत का हूबहू इजहार हूँ मैं

मुझे यूँ ही भूला देना आसान नहीं हैं
तुझ पर इतना ज्यादा निसार हूँ मैं
दीदह ओ दिल में तुम्ही समाये रहते हो
इश्क़ में जिस्म ओ जाँ से सरशार हूँ मैं
तुम लौट कर ज़रूर आओगे एक दिन
बेकरारॆ हिज्र सा दर ओ दीवार हूँ मैं
जिसे तुम याद करके सिसकते हो
वो गलियाँ वो सड़कें वह दयार हूँ मैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र
(अशआर =छंद ,इजहार =प्रगट होना ,निसार =कुर्बान
दीदह ओ दिल=, आँख और दिल ,सरशार =मस्त
बेकरार हिज्र =वियोग की बेचैनी ,दयार =शहर )

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (15-02-2015) को "कुछ गीत अधूरे रहने दो..." (चर्चा अंक-1890) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
पाश्चात्य प्रेमदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (15-02-2015) को "कुछ गीत अधूरे रहने दो..." (चर्चा अंक-1890) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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पाश्चात्य प्रेमदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

shukriya mayank ji

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

shukriya mayank ji