शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

900-तेरे इश्क़ में....

तेरे इश्क़ में....
तेरे इश्क़ में हसरत ए परवाज अभी बाकी है
गमे हिज्र में हूँ ,वस्ल का आगाज़ अभी बाकी है

तेरी ख़ामोशी ने जो कहा उसे मैंने सुन लिया है
मेरे सीने में दफ़न वो एक राज अभी बाकी है
मेरे बिना न तुम रह सकते हो न तेरे बिना मैं
मेरे ख्याल में तेरे जीने का अंदाज़ अभी बाकी है
अभी तक निगाहों से निगाहें ही टकराई हैं बस
दोनों की रूह के निकाह का रिवाज़ अभी बाकी है
तन्हाई में तुझे ही याद करके तो मैं जी रहा हूँ
विसाल का तेरा असहनीय लिहाज़ अभी बाकी है
ख़्वाब में अक्सर यूँ तो हम दोनों रोज मिलते हैं
रूबरू होने पर सिलसिला ए नियाज़ अभी बाकी है
किशोर कुमार खोरेन्द्र
{हसरत ए परवाज़ = उड़ने की अभिलाषा ,आगाज़ =प्रारंभ
अंदाज़ =ढंग ,विसाल =दो प्रेमियों का मिलन
लिहाज -लाज ,संकोच ,नियाज़ =परिचय}

4 टिप्‍पणियां:

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 8-2-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1883 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Digamber Naswa ने कहा…

वाह .. बहुत लाजवाब शेरोन से सजी ग़ज़ल ...

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

shukriya onkar ji
shukriya dilbag virk ji
shukriya digambar naswa ji