शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

905-तुम मेरे बेताब मन का


तुम मेरे बेताब मन का

तुम मेरे बेताब मन का दूसरा हिस्सा बन गये  हो 
जिसे सुनता रहूँ  प्रेम का  वही किस्सा बन गये हो 

हर तरफ तेरे सिवाय  मुझे अब कुछ नजर आता नहीं  
दो जिस्म पर एक जान सा अटूट रिश्ता बन गये  हो 

माह ओ अंजुम  से घिर कर भी खुद को भुला न था 
सिवाय तेरे  कुछ याद नहीं ऐसा करिश्मा बन गये हो 

रेत  कणों  सा चूर चूर होकर तन्हा सहरा बन  गया  हूँ 
तेरी बाट जोहती मेरी  आँखों की प्रतीक्षा बन गये  हो 

जिसके प्यार में मैं अब जीना  और मरना  चाहता हूँ 
होम होने के लिए तुम मेरी  वही निष्ठा बन गये हो 

इब्दिता से अंजाम तक तुमसे भेंट होगी नहीं कभी 
मेरी रूह के लिए तुम आदिम मृगतृष्णा  बन गये हो 

दांव पर लगा दिया हूँ अपने वजूद को मैं तेरी खातिर 
अब हारुँ या जीतूं  तुम तो मेरी प्रतिष्ठा बन गये  हो 

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

904-डाल डाल फूल महके

डाल डाल फूल महके
सरसों का पीला रंग देखकर
मन बहके
टेसू के पुष्पों सा

उमंग दहके
फुनगियों पर चिड़िया चहके
बिना बादलों के
नीले आसमान से
कुछ कहना चाहूँ
मौन रहके
मधुप सुनते नहीं
अपनी धुन में ही
बस रहते
सारे रंग झर रहे
उड़ती हुई
तितलियों के पर से
जिसे तुमने
छुवा था वह सागौन का 
भूरा पत्ता आया है
मुझ तक उड़के 
शायद तुमने भेजा हो 
कोई अनलिखा सन्देश 
उसकी नसों में लिख के 
बंद हथेलियों में आओगे तुम 
प्यार के सातों रंग लेके 
मुस्कुराओगे फिर 
अचानक
मेरे गालोँ पर
गुलाल मल के

किशोर कुमार खोरेन्द्र

रविवार, 15 फ़रवरी 2015

903-न जाने कितने जन्मों जन्म से

न जाने कितने जन्मों जन्म से....


न जाने कितने जन्मों जन्म से फुरकत में जी रहा हूँ मैं 
न जाने कबसे तेरी जुदाई के  वुसअत में  जी रहा  हूँ  मैं 


तुम  ही खड़े हुऐ से नजर आते हो हर जगह हर मोड़ पर 
निगाहों में बसी तेरी तस्वीर की सोहबत में जी रहा हूँ मैं 


मरकर  भी  न खत्म होगा अहसास का यह सिलसिला 
तेरे बगैर इबादत ए उल्फ़त के  अजमत में जी रहा हूँ मैं  


मानता था  यह जहां रंगमंच है  और हम सभी किरदार हैं  
लेकिन  अब तो तेरे वजूद की सदाक़त में जी रहा हूँ  मैं 


जान लो मेरी जुबाँ पर तो तेरा नाम आयेगा ही  नहीं कभी 
सिवा तेरे कोई नहीं जानता की तेरी क़ुरबत में जी रहा हूँ मैं 


आजकल लोगों की क्या अपनी नज़रों से  छुपकर रहता हूँ 
वस्ल ए ख्वाबो ख्याल को    ऐसी फितरत में जी रहा हूँ मैं 


किशोर कुमार खोरेन्द्र 

(फ़ुरकत - जुदाई ,वुसअत -विस्तार ,सोहबत -संसर्ग 
इबादत ए उल्फत -प्रेम उपासना ,
अज़मत -ऊंचाई ,प्रतिष्ठा बड़प्पन 
वजूद -अस्तित्व ,सदाक़त -सच्चाई ,क़ुरबत -समीपता 
वस्ल ए ख्वाबो ख्याल -ख्वाब और ख्याल के मिलन 

फितरत -आदत )

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

902-तेरे हुस्न से...

तेरे हुस्न से...
तेरे हुस्न से पिरोया अशआर हूँ मैं
तेरी ही चाहत का हूबहू इजहार हूँ मैं

मुझे यूँ ही भूला देना आसान नहीं हैं
तुझ पर इतना ज्यादा निसार हूँ मैं
दीदह ओ दिल में तुम्ही समाये रहते हो
इश्क़ में जिस्म ओ जाँ से सरशार हूँ मैं
तुम लौट कर ज़रूर आओगे एक दिन
बेकरारॆ हिज्र सा दर ओ दीवार हूँ मैं
जिसे तुम याद करके सिसकते हो
वो गलियाँ वो सड़कें वह दयार हूँ मैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र
(अशआर =छंद ,इजहार =प्रगट होना ,निसार =कुर्बान
दीदह ओ दिल=, आँख और दिल ,सरशार =मस्त
बेकरार हिज्र =वियोग की बेचैनी ,दयार =शहर )

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

901-मैंने किया था ...

मैंने किया था ...
मैंने किया था तुम्हें फोन मगर तुमने सुना नहीं
अपने ख्यालों में मुझे तुमने आज बुना नहीं

तुझे भेजा था जो खत वो उदास हो लौट आया है
मेरे मन की तरह किसी का मन आज सूना नहीं

उल्फ़त में तुमने अजीब सी एक शर्त रखी है
देखना जीभर मगर कहा कभी मुझे छूना नहीं

रोज रोज एक तारे सा टूट्कर मैं गिरता रहा हूँ
तेरे मन के आकाश में मेरे लिए कोई कोना नहीं

न जाने क्यों तुम मुझे देखकर मुस्कुराते रहे हो
मुझे मालूम न था निगाहों में मैं तेरी खिलौना नहीं

मेरी जिंदगी की नदी तेरी ओर ही बहती रहेगी
मैं जानता हूँ तुझसे पर कभी संगम होना नहीं

किशोर कुमार खोरेन्द्र

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

900-तेरे इश्क़ में....

तेरे इश्क़ में....
तेरे इश्क़ में हसरत ए परवाज अभी बाकी है
गमे हिज्र में हूँ ,वस्ल का आगाज़ अभी बाकी है

तेरी ख़ामोशी ने जो कहा उसे मैंने सुन लिया है
मेरे सीने में दफ़न वो एक राज अभी बाकी है
मेरे बिना न तुम रह सकते हो न तेरे बिना मैं
मेरे ख्याल में तेरे जीने का अंदाज़ अभी बाकी है
अभी तक निगाहों से निगाहें ही टकराई हैं बस
दोनों की रूह के निकाह का रिवाज़ अभी बाकी है
तन्हाई में तुझे ही याद करके तो मैं जी रहा हूँ
विसाल का तेरा असहनीय लिहाज़ अभी बाकी है
ख़्वाब में अक्सर यूँ तो हम दोनों रोज मिलते हैं
रूबरू होने पर सिलसिला ए नियाज़ अभी बाकी है
किशोर कुमार खोरेन्द्र
{हसरत ए परवाज़ = उड़ने की अभिलाषा ,आगाज़ =प्रारंभ
अंदाज़ =ढंग ,विसाल =दो प्रेमियों का मिलन
लिहाज -लाज ,संकोच ,नियाज़ =परिचय}