रविवार, 25 जनवरी 2015

895-जुनूने इश्क़ में....

जुनूने इश्क़ में....

जुनूने इश्क़ में गुफ्तगू सख्त मना है 
हर्फ़े सुकूत को बस पढ़ना समझना है 

रूपोश हो भी तो हम दोनों कहाँ जाये 
फलक में सितारें दीवारों में आईना है 

अपने साये से भी तुम सहम जाते हो 
कह दूँ निगाहों से ,जो तुमसे कहना है 

आज तक तेरी तस्वीर ही देख पाया हूँ
वस्ले जानां तो केवल एक कल्पना है

खुदा की तरह तुम अप्राप्य अदृश्य हो
तन्हां आये है आफाक में तन्हा रहना है

किशोर कुमार खोरेन्द्र

(जुनूने इश्क =प्रेम उन्माद ,गुफ्तगू =बातचीत
हर्फ़े सुकूत =ख़ामोशी के अक्षर
रूपोश =मुंह छुपाना ,भाग जाना ,फलक =आकाश
वस्ले जानां =प्रिय से मिलन ,तन्हा =अकेले ,
आफाक =संसार ),

5 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (26-01-2015) को "गणतन्त्र पर्व" (चर्चा-1870) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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गणतन्त्रदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

shukriya mayank ji

राजेंद्र कुमार ने कहा…

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाये।

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

shukriya rajendrs kumar ji
onkar ji shukriya