गुरुवार, 22 जनवरी 2015

886-मेरी खामोश जुबां...

मेरी खामोश जुबां...
मेरी खामोश जुबां पर तुम्हारा कभी नाम न होगा
मेरा ऐतबार करो तुझ पर कभी इल्जाम न हो
गा
तेरे शहर के किनारे नदी सा चुपचाप बहता रहूँगा
मेरे तनहा इश्क का ,और कभी अंजाम न होगा
एक दिन लहरों संग कश्ती सा दूर चला जाऊँगा
तेरे लिए आखिर तक पर ,कोई पयाम न होगा
मेरी इस पाक मोहब्बत में न शब्द है न कलाम है
कोहरे सा अग्रसर दबे पांवों में पर विराम न होगा
तेरे रूह की देह,तेरे रूह के मन से अटूट नाता है मेरा
इस शाश्वत प्रेम के लिए ,कहीं कोई मकाम न होगा
मेरा शरीर जन्मा है तो मृत्यु भी तो निश्चित ही है
पर मेरा प्यार तेरे ह्रदय में रहकर .गुमनाम न होगा
किशोर कुमार खोरेन्द्र
(ऐतबार =भरोसा ,इल्जाम =दोष ,अंजाम =अंत ,पयाम =सन्देश
कलाम=वार्तालाप ,मकाम =ठहरने का स्थान ,गुमनाम =अज्ञात
)

कोई टिप्पणी नहीं: