शनिवार, 31 जनवरी 2015

898-वृक्षों तले छाँव भी...

वृक्षों तले छाँव भी...
वृक्षों तले छाँव भी रह रहे किराये से, लगने लगे हैं
शहर में लोग कुछ ज्यादा ही पराये से ,लगने लगे है

मनुष्य होने के अलावा लोग न जाने क्या हो गए हैं
आडम्बर वे कुछ ज्यादा ही अपनाये से,लगने लगे हैं
बरसों पुराने मील के पत्थरों से अब कौन मिले
तन्हाई से घिरे रस्ते भी घबराये से ,लगने लगे हैं
जहाँ में सच कहने पर सजा ए मौत मिलती है
आईने के भीतर हम सुरक्षित साये से रहने लगे हैं
ढके चेहरों के भीतर कितना आतंक छुपा है कौन जाने
प्यार की जगह मानव, बम लगाए से ,लगने लगे हैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (02-02-2015) को "डोरबैल पर अपनी अँगुली" (चर्चा मंच अंक-1877) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

सटीक सुन्दर प्रस्तुति
newpost कहानी -विजयी सैनिक
: रिश्तेदार सारे !

Pratibha Verma ने कहा…

बहुत सुन्दर...

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

shukriya mayank ji
shukriya kali pad prasaad ji
shukriya pratibha verma ji