शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

892-न जाने क्यों....

न जाने क्यों....

न जाने क्यों तुम हरदम रहते बेजुबान से हो 
अब तक न सुनी न कही गयी दास्तान से हो 

अफ़सोस तेरे बारे में जान न पाया कुछ भी 
पर तुम तो मेरे प्रणय गीत के उन्वान से हो 

टूटे तारे सा जमीं पर बिखर गया हूँ तो क्या 
तुम लगते मुझे , इंद्रधनुषी आसमान से हो 

ताउम्र जीकर भी समझ में नहीं आई जिंदगी
मेरे लिए तुम भी तो सवाल कहाँ आसान से हो

न कुछ खोया न कुछ पाया इस जहाँ में आकर
जाते जाते बचे हुए मेरे अंतिम अरमान से हो

किशोर कुमार खोरेन्द्र

(दास्तान =कहानी ,उन्वान =शीर्षक ,अरमान =इच्छा )

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