बुधवार, 14 जनवरी 2015

884-लिए अपनी सांसों में ....

लिए अपनी सांसों में ....

लिए अपनी सांसों में मोंगरे सी महक आ जाया करो
तुम यूँ ही कभी कभार इधर अचानक आ जाया करो

न जाने कितने अरमान जगने लगे है मन के भीतर मेरे
तुम लिए सतरंगी चूड़ियों की मधुर खनक आ जाया करो

खिलने लगे है पलाश दूर दूर तक अब तो जंगल में
तुम लिए मौसम ए बहार सी रौनक आ जाया करो

न कोई सुर न कोई ताल अब अच्छा लगता है मुझे
तुम लिए अपने पायल की मीठी झनक आ जाय करो

तुम्हारे ध्यान में मैं ,रहता आ रहा हूँ सतत निमग्न
लगा कर मेरे दुनियाँ में होने की भनक आ जाय करो

पृथ्वी ,जल अग्नि वायु आकाश सब बेजान से लग रहे हैं
फागुनी बयार सी जगाने उनमे उमंग बेशक आ जाय करो

किशोर कुमार खोरेन्द्र

3 टिप्‍पणियां:

इंतज़ार ने कहा…

किशोर जी बहुत सुंदर भाव हैं इस रचना में दिल को छूने वाले .....बधाई

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

intazaar ji shukriya

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

intazaar ji shukriya