सोमवार, 15 दिसंबर 2014

872-वो जब भी....

वो जब भी....

वो जब भी मुझसे मिलता है दीवाने की तरह 
उसमें फ़ना होने की चाह है परवाने की तरह

उसे नजर अंदाज करूँ भी तो किस तरह करूँ 
मैं नज़र बंद हूँ उसकी आँखें हैं आईने की तरह

उसके लिए मेरी रुसवाई भी हो जाये तो गम नहीं 
इस जहाँ में मिला है मुझे वह नजराने की तरह

अब बहार के फूल खिंजा के काँटों से लगने लगे है
उसके बिना शहर भी लगता है मुझे वीराने की तरह

मुझ पर लिखी उसकी शायरी से मुझे सुकून मिलता है
बाकि दुनियाँदारी लगती हैं मुझे अफ़साने की तरह

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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