रविवार, 14 दिसंबर 2014

869-वो मेरे रूह....

वो मेरे रूह....

वो मेरे रूह समेत हो गये 
दो दिल आज एक हो गये 

आँखों ने आँखों को पढा
अब इरादे भी नेक हो गये 

वो बर्फ से नदी बन गयी 
हम पहाड़ से रेत हो गये 

वो कविता , मैं काव्य हूँ
रेखांकित उल्लेख हो गये

एक दूजे की आँखों मे हैं
आँखों के उन्मेष हो गये

किशोर कुमार खोरेंद्र

कोई टिप्पणी नहीं: