रविवार, 14 दिसंबर 2014

865-"चुभन "

"चुभन "

झरते हैं तो क्या हुआ 
रोज तो खिलते है सुमन 
काँटों को देखकर 
महसूस न करों चुभन 
मन बहता ही रहता है 
गति ही है जीवन 
हालाँ की यह सच नहीं है 
फिर भी मान लो 
क्षितिज पर
ज़मीं से मिल रहा है गगन
आती हुई लहर
जाती हुई लहर के क्र्म सा
है जनम और मरण
सपन सा लगता है जागरण
नींद में वही
जागरण बन जाता है सपन

किशोर कुमार खोरेंद्र

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