शनिवार, 29 नवंबर 2014

863-भटकाव"

भटकाव"

आख़िर मैं 
पहुँच ही गया 
जहाँ पर 
राह ख़त्म हो ज़ाती है 
यहाँ पर 
न शहर है न गाँव है 
आकाश का धरती की ओर 
बस कुछ झुकाव है
यहाँ से 
एक नदी शुरू होती है
उसकी सतह पर एक नाव तैरती है
उस पार घना जंगल है
वहाँ पर
कहीं धूप है
वहाँ पर
कहीं छाँव है
फिर से
नये पथ को खोजूँगा
बिना मंज़िल को
जाने चलूँगा
जीवन बस
एक भटकाव है


किशोर कुमार खोरेंद्र

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (01-12-2014) को "ना रही बुलबुल, ना उसका तराना" (चर्चा-1814) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'