मंगलवार, 4 नवंबर 2014

852-चिंगारी"

चिंगारी"

प्यार की राह के अंतिम छोर तक हम आ गये हैं
पर्वत की चोटियों सा आकाश तक हम आ गये हैं

तन से मन ,मन से रूह तक का यह सफ़र अच्छा रहा
हमारे साथ रहने कहीं कोहरा कही शबनम आ गये हैं

राख के ढेर में छुपी रहती है इश्क की जलती चिंगारी
उन्हें फिर से सुलगाने बहारों के कई मौसम आ गये हैं

हर अहसास को मिल ही जाता है उसका आशिक
रूठे प्रेमी को मनाने देखो उनके सनम आ गये हैं

बिना परीक्षा दिए होता नही कुछ भी हासिल
प्रेम पर ज़ुल्म ढाने देखो सितम आ गये हैं

किशोर कुमार खोरेंद्र

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