मंगलवार, 4 नवंबर 2014

851-"उड़ान "

"उड़ान "

अजनबी हो फिर भी मुझसे एक रिश्ता है 
तेरे मेरे बीच अनाम सा एक रिश्ता है

मुहब्बत ,प्यार ,वफ़ा ए इश्क हो यदि 
तो कतरे में सागर भी आ बसता है

इस जहाँ का मकसद मैने जान लिया 
कुर्वत के लिए इर्फान भी तरसता है

वो एक शख़्स क्यों रोज रोज लिखता है
चाहत की झील मे आब ए हर्फ रीसता है

जंगल में खामोशी की चिड़ियाँ चुपचाप बैठी है
उड़ान भी आकाश सी तन्हाई को समझता है

किशोर कुमार खोरेंद्र

(कुर्वत= सामीप्य ,इर्फान=विवेक ,ज्ञान ,मकसद =उद्देश्य ,आब =जल हरफ़ =अक्षर ,कतरा =बूँद
वफ़ा=वफ़ादारी )

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