मंगलवार, 4 नवंबर 2014

850-"मुक़द्दर "

"मुक़द्दर "

मुनासिब नहीं है की पहुँच जाउँ अब तेरे दर पर 
गुलाब की जगह काँटों का पहरा है तेरे दर पर

ख्यालों में ही तुझे बुनता रहा हूँ जीवन भर 
बुलाया नहीं तूने कभी मुझे अपने घर पर

टिमटिमाते तारो और अंधेरों के बीच चाँद सा रहा बेदार 
तेरी यादों के उजलों के सिवा कोई न मिला इस सफ़र पर

रेल सा गुज़रते हुए दूर से देखा तूने मेरा शहर
पल भर को कहाँ ठहरी मुझपे तेरी नज़र पर

कश्ती के दर्द को कौन महसूस कर पाया है
ध्यान रहता है साहिल का आती जाती लहर पर

गंगा के तट के मुकद्दस मंदिर सा मैने माना तुम्हें
मालूम नही मेरी दुआ का तुझपे कितना हुआ असर पर

तूने अपनी पाक रूह को मुझे सौप दिया है
खुशनसीब हूँ मुझे गर्व है अपने मुक़द्दर पर

किशोर कुमार खोरेंद्र

(मुनासिब =संभव ,बेदार =जागृत,साहिल =किनारा ,मुकद्दस =पवित्र ,}

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