शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

848-शायद "

शायद "

ऐसा रोज क्यों लगता है 
की
मैं तुमसे आज पहली बार मिला हूँ 
तुम आज सुबह सुबह ही फूल बन कर खिली हो 
मैं आज ही भँवरा बना हूँ 
और शाम होने के पहले 
पूरे दिन में 
हम दोनो को एक दूसरे को पा लेना है

तुम मुझे हर क्षण नयी नयी सी क्यों लगती हो
कभी सागर से निकलते सूरज की तरह
कभी पहाड़ के पीछे
गुम हो जाती अंतिम किरण की तरह
कभी सितारों से घिरे
उस चमकते चाँद की तरह

शायद यह सोचकर की
कही आज का दिन आखरी न हो
तुमसे दुबारा मिलने का फिर
अवसर मिले न मिले

किशोर कुमार खोरेंद्र

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