रविवार, 26 अक्तूबर 2014

841-"गुस्ताख़ी "

"गुस्ताख़ी "
आज पन्ना है सहमा हुआ 
डरा स्याही का क़तरा हुआ

गम ए इश्क़ आ सीने से लग जा ज़रा 
दिल को आघात बहुत गहरा हुआ

प्यार का महासागर सूख गया है 
दूर दूर तक मंज़र अब सहरा हुआ

उन्हें इस बात की खबर ही नहीं हैं
बोलने का रूखा उनका लहज़ा हुआ

सजदा करने जाउँ तो किधर जाउँ
रुख़ उन्होने अब है अपना फेरा हुआ

फिर से अपना ले मुझे ऐ पाक नदी
साहिल पर तेरे हूँ अभी मैं ठहरा हुआ

गुस्ताख़ी हुई है मुझसे ज़रूर कोई न कोई
मान लो गुनाह मुझसे आज यह पहला हुआ

चाँद से रूठ गयी है चाँदनी फिर से
मालूम नही रौशन कब सवेरा हुआ

किशोर कुमार खोरेंद्र

(सहरा =रेगिस्तान ,रुख़ =चेहरा ,सजदा =माथा टेकना साहिल =किनारा गुस्ताख़ी = ग़लती )

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (28-10-2014) को "माँ का आँचल प्यार भरा" (चर्चा मंच-1780) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
छठ पूजा की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

आशीष अवस्थी ने कहा…

बहुत ही सुंदर , सर धन्यवाद !
I.A.S.I.H - ( हिंदी में समस्त प्रकार की जानकारियाँ )

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

shukriya mayank ji

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

shukriya ashish awasthi ji