सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

843-प्रणय कथा.....

प्रणय कथा.....

तेरी हँसी की गूँज मेरे मन मे है बसी 
जैसे झरने की सदा वन में है बसी

तेरे मुस्कुराते ही खिल उठते हैं सारे उपवन 
तेरे हुश्न की हर अदा मेरे नयन में है बसी

मेरी यादों में तुम खुश्बू सा छाए रहते हो 
मेरी हर संगीन खता तेरे दामन में है बसी

तुम्हें भूल सकता हूँ यह सोच भी नही सकता
हमारी प्रणय कथा मेरी धड़कन में है बसी

अटूट होता है प्रेम का यह अद्र्श्य सरस बंधन
प्यार की उमड़ आई घटा मधुर चिंतन में है बसी

किशोर कुमार खोरेंद्र

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