सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

842-"मोहब्बत "

"मोहब्बत "
ये प्यार है या कोई इबादत
तुम्हें न भूलने की मुझे है आदत
रास्तों के काँटों को चुनता हूँ
हसरत है तुम सदा रहो सलामत
तुम्हारी सोहबत मिली नहीं कभी
ख्वाब मे ही आओ यही है मेरी चाहत
गर्दिश के आकाश का एक तारा हूँ
तेरी दुआ करती है मेरी हिफ़ाज़त
सीने मे एक काँटे सा चुभ गये हो
ये मोहब्बत है या कोई अदावत
किशोर कुमार खोरेंद्र

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